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*लोहिया और भगतसिंह के बताएं रास्ते से ही सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला संभव* 

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*लोहिया जयंती और भगत सिंह के शहादत दिवस पर हुआ विचार गोष्ठी का आयोजन*

इंदौर ।डॉ राम मनोहर लोहिया और शहीदे आजम भगतसिंह के विचार आज भी प्रासंगिक है और जब सांप्रदायिक राजनीति का खतरा बहुत बढ़ गया है तब इन दोनों नायकों की आदर्श और राजनीतिक विचार से ही सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला किया जा सकता है । डॉ लोहिया और भगतसह में कई समानताएं थीं जहां दोनों सोशलिस्ट थे वही सांप्रदायिकता के खिलाफ भी उन्होंने आजीवन संघर्ष किया जनता को जगाने के लिए जहां भगतसिंह ने असेंबली में बम फोड़ा वहीं डॉक्टर लोहिया ने आजादी के पहले और आजादी के बाद सतत संघर्ष करते हुए जेल यात्राएं की।

उक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी विचारक सुभाष रानाडे ने डॉक्टर लोहिया की जन्म जयंती और शहीद ए आजम भगत सिंह के शहादत दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी में व्यक्त किये। कार्यक्रम का सचालन रामस्वरूप मंत्री ने किया जबकि अध्यक्षता शशिकांत गुप्ते ने की।‌ 

श्री रानाडे ने कहा कि डा. लोहिया भीड़ के नेता नहीं थे. वे सिद्धान्तकार थे. ऐसे सिद्धान्तकार जो दो लाइन के नारे में अपनी बात बता और समझा देते थे। वे भारत की सर्व सुलभ भाषा के निर्माता थे. आत्मा से विद्रोही. नियम तोड़ना लोहिया ने गांधी से सीखा था.  गांधी और लोहिया  सविनय अवज्ञा और सिविल नाफ़रमानी पर  एक थे.  लोहिया  के पास हमारी राजनीतिक, सामाजिक, पौराणिक सभी जिज्ञासाओं का समाधान था । 

 लोहिया का चिन्तन राजनीति तक ही कभी सीमित नहीं रहा. मुद्दों पर व्यापक दृष्टिकोण, दूरदर्शिता उनकी चिन्तनधारा की विशेषता थी । राजनीति के साथ-साथ संस्कृति, दर्शन, साहित्य, इतिहास, भाषा आदि के बारे में भी उनके मौलिक विचार थे. सूत्र में बात करना लोहिया-विचार की विशेषता है, वे सूत्रों के ज़रिए अपनी बात समझाते हैं ।

डॉ लोहिया भारत में समाजवादी आन्दोलन के अलम्बरदार थे. विपक्ष क्या होता है?, उसकी ताक़त क्या होती है?भारतीय लोकतंत्र को पहली बार यह बताने वाले राम मनोहर लोहिया ही थे. लोहिया शासकों के लिए आतंक थे. ग़रीबों के लिए हौसला थे. गिरे हुए के लिए प्रेरणा थे. इसी तरह भगत सिंह आजादीक दीवाने युवाओं के लिए आदर्श है और उन्होंने जिस तरह से युवाओं की हौसलाब्जाई और मार्गदर्शन किया उसी ने देशको आजादी दलाई।

विचार गोष्ठी  में जीवन मंडलेचा, रामस्वरूप मंत्री, शशिकांत गुप्ते, हेमंत पन्नाहलकर, मुन्नालाल साहनी आदि ने भी विचार व्यक्त किए।अंत में पूर्व महधिवक्ता और कानून विद्द आनंद मोहन माथुर को श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई।

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