अग्नि आलोक
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*नज़र का धोखा है

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शशिकांत गुप्ते

युवतियों या स्त्रियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटना घटित होने पर स्वयं को अति बुद्धिमान आस्थावान समझने वाले राजनेता पीड़िता के प्रति सहानुभति प्रकट करने बजाए, युवतियों के पहनावे पर कटाक्ष करतें हैं। यदि युवतियों का पहनावा उत्पीड़न का कारण बनता है तो हिज़ाब पर बवाल क्यों मचाया जाता है? हिजाब तो पूरे शरीर को ढांकता है।
उक्त वक्तव्य संकीर्ण मानसिकता के साथ पुरूष प्रधान मानसिकता के भी द्योतक हैं।
बांसी कढ़ी में उबाल वाली कहावत चरितार्थ करने के अपने बालों में खिजाब लगातें हैं।खिजाब मतलब सिर और दाढ़ी के बालों को काला करने की दवाई।इसे केशकल्प भी कहतें हैं। आधुनिक भाषा में इसे hair color कहतें हैं।
सम्भवतः ऐसा वक्तव्य देने वाले पुरुष भी खिजाब का इस्तेमाल करते होंगे?
स्त्रियों का पहनावा, श्रृंगार, और वेशभूषा को स्त्री के उत्पीडन का कारण कहना ना सिर्फ हास्यास्पद बल्कि स्त्रियों का अपमान भी है।
इस सदर्भ में एक प्रेरणादायक कथा का स्मरण होता है।
संत ज्ञानेश्वरजी की छोटी बहन का नाम मुक्ताबाई था।
संत ज्ञानेश्वर से शास्त्रार्थ करने के लिए चांगदेव नामक हठयोगी ने पहल की।
चांगदेव शास्त्रार्थ में असफल होने पर उसने ज्ञानेश्वरजी के चरणों मे समर्पण कर दिया। ज्ञानेश्वरजी ने चांगदेव से कहा तुम्हे आत्मबोध का ज्ञान मेरी बहन मुक्ताबाई से मिलेगा।
चांगदेव जब मुक्ताबाई से मिलने गया तब मुक्ताबाई नदी पर नहाने गई थी।
चांगदेव नदी किनारे आँखे बंद कर खड़ा हुआ। मुक्ताबाई जब नहाकर आई तब मुक्ताबाई ने पूछा तुमने आँखे क्यों बंद की।चांगदेव ने जवाब दिया मुक्ताबाई आप भले ही 5 वर्ष की हो लेकिन ही तो स्त्री*
यह सुन मुक्ताबाई ने पूछा हे चांगदेव तुमने इतने शास्त्रों का अध्ययन किया है और हटयोग में महारत हासिल प्राप्त करने के उपरांत भी तुम्हे स्त्री और पुरुष का भेद ही समझ नहीं आया। अरे चांगवेद सच्चा पुरूष वह होता जा जिसकी आँखे खुली होकर भी बंद हो मतलब उसकी नजर गलत न हो नजर में खोट ना हो। आँखे बंद करना मतलब अपराधबोध से ग्रस्त (Gilty) होना है।
पुरुषों में उपर्युक्त मानसिक परिवक्वता होनी चाहिए।
स्त्रियों के पहनावें पर और हिजाब पर सवाल उठाए जाएंगे तब सन 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म टैक्सी ड्राइवर के गीत ये पंक्तियां प्रासंगिक होंगी। इस गीत के गीतकार शाहिर लुधियानवी।
जाए तो जाए कहाँ
समझेगा, कौन यहाँ
दर्द भरे, दिल की ज़ुबां
जाएँ तो जाएँ कहाँ।

एक ओर बेटी पढाव, बेटी बचाव का स्लोगन प्रचारित किया जा रहा है। दूसरी ओर स्त्री के उत्पीड़न की घटनाएँ रुक नहीं रही है।
युग निर्माण योजना द्वारा प्रसारित और प्रचारित स्लोगन का स्मरण होता है। हम सुधरेंगे,युग सुधरेगा देश सुधरेगा तो युग के सुधरने की संभावना प्रबल होगी।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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