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किसानों को उनकी फसलों की लागत मूल्य का भी न मिलना उनकी खुदकुशी के लिए सीधे जिम्मेदार कारक है !

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 – निर्मल कुमार शर्मा, 

कितने शर्म की बात है कि किसानों की खुदकुशी के आँकड़े को मोदी सरकार ने प्रदर्शित करने से छिपाने के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यरो को यह गुप्त आदेश दे रखा है कि किसानों की खुदकुशी का आँकड़ा वह प्रकाशित न करे ! लेकिन अभी संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा में एक विपक्षी दल के एक नेता के इस प्रश्न पर कि ‘क्या यह सच है कि आर्थिक तंगी के कारण इस देश में अभी भी लोग आत्महत्या कर रहे हैं ? अगर हाँ तो पिछले 3 साल में कितने लोग आत्महत्या किए हैं ? और इस समस्या के समाधान के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है ? ‘
इस गंभीर और विचलित कर देनेवाले प्रश्न के उत्तर में इस देश के गृह राज्य मंत्री ने लिखित में यह बात स्वीकार किया है कि 2018,2019 और 2020 में 16091 किसानों ने आत्महत्या की है !एक साल से अधिक समय तक चले किसान आंदोलन के गतिरोध को तोड़ने के लिए मोदीजी ने सदा की तरह फिर झूठ बोलकर कि ‘हम किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून बनवाने के लिए शीघ्र ही एक समिति का गठन करेंगे ‘लेकिन इस देश की आवाम, मजदूरों और किसानों के एहसान-फरामोश मोदीजी और उनकी सरकार इस सम्बंध में अभी तक एक ईंच भी आगे नहीं बढ़ी है ! इस देश के अधिकांश किसानों की वास्तविक स्थिति यह है कि वे अपनी फसल कर्ज लेकर इस उम्मीद में बोते हैं कि फसल बेचकर कर्ज चुका देंगे,लेकिन प्रतिकूल मौसम या किसी अन्य वजह से फसल बर्बाद होने पर उसकी मदद न फसल बीमा करती है न सरकारें करतीं हैं ! इस निराशाजनक परिस्थिति में वह सब तरह से थक-हारकर अंततः अपने उद्धार के लिए खुदकुशी का रास्ता अपनाने का फैसला ले लेता है ! लेकिन कितनी हतप्रभ और दुःखी करने वाली बात है कि इस देश में लाखों किसानों के खुदकुशी कर लेने के बावजूद भी चंद पूँजीपतियों के गोद में खेल रहे सत्ता के कर्णधारों के माथे पर एक शिकन तक नहीं पड़ती है !

हर 9 घंटे में एक किसान आत्महत्या! - Mandal News


गाँधी जी अक्सर कहा करते थे कि ‘भारत की आत्मा गाँवों में बसती है,अगर किसी को भारत की असली छवि को सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करनी है,तो उसे भारतीय गाँवों में जाकर वहाँ की वास्तविक हालात को देखनी-परखनी चाहिए ‘, इसलिए छब्बीस जनवरी की कथित गणतंत्र के रंगारंग कार्यक्रम में इस देश के कथित गणतंत्र के तंत्र महोदयों या गणतंत्र के आयोजकों से मेरा विनम्र निवेदन है कि वे भारतीय संस्कृति और वास्तविक भारत की छवि को इस देश और समूची दुनिया को भारत की वास्तविकता को दिखाने के लिए इस देश के 70 प्रतिशत की बहुलता वाली भारतीय ग्राम्य संस्कृति,वहाँ के कृषक समाज और भारतीय गाँवों में रहनेवाले भारत के युवाओं की वास्तविक छवि को दर्शाने के लिए गणतंत्र परेड में विभिन्न राज्यों की रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झाँकियों के बाद अंत में एक झाँकी इस देश के करोड़ों बेरोजगार युवकों, किसानों और मजदूरों की व्यथा,कष्ट और वास्तविक स्थिति को दर्शाती और हकीकत को बयान करती एक झाँकी अवश्य निकालनी चाहिए,जिसमें दवा और ऑक्सीजन के अभाव में मरते नवजातशिशु ,बेरोजगारी से आत्महत्या करते युवा और अपने फसलों की लागत मूल्य तक भी नहीं मिलने से लाखों की संख्या में खुदकुशी कर चुके और मोदी शासन में 49 प्रतिशत और अधिक खुदकुशी कर रहे किसानों की भी मनहूस झाँकी भी इन तंत्र महोदयों और अभिजात्य वर्ग के भद्र लोगों और कथित अर्थशास्त्रियों को दिखाया जाना चाहिए,ताकि भारत की वास्तविक व कटुयथार्थ तथा कटुसच्चाई का इस देश के सभी लोगों और दुनियाभर को ये पता चले कि गणतंत्र दिवस में प्रस्तुत रंगारंग झाँकी के विपरीत भारत की आम जनता,मजदूरों,किसानों की इस देश की स्वतंत्रता के 74 वें साल बाद में भी कितनी दयनीय,दुःखद व हतप्रभ करनेवाली विकट स्थिति बनी हुई है !
वास्तविकता यह भी है कि भारत जैसे देशों में सुरसा की तरह बढ़ती आर्थिक असमानता को कम करने के लिए किसी जादू की छड़ी,मंदिर, मस्जिद,चर्च,भगवान,खुदा और गॉड के वरदान व आशीर्वाद की कतई जरूरत ही नहीं है ! अपितु चंद पूँजीपतियों के दलाल बने सत्ता के कर्णधार अपनी आमजनविरोधी और पूँजीपतिसमर्थक दुर्नीतियों में सुधार करें,वे इस देश के मजदूरों को उनके जीविकोपार्जन लायक मजदूरी देने तथा 90 करोड़ किसानों को उनके द्वारा उत्पादित फसलों का उचित मतलब उनकी लागत पर कुछ लाभांश रखकर देना सुनिश्चित करें,इसी एक कदम से भारत में सर्वत्र खुशहाली आ जाएगी,लेकिन वैसे भी मोदी जैसे असहिष्णु और बर्बर व्यक्ति के सत्ता में रहते इस तरह के सुधारात्मक कदम उठाना एक दिवास्वप्न सरीखा ही है !आज भारत में खेती एक घाटे का सौदा बनकर रह गई है ! खेती के लिए जरूरी सभी चीजें यथा खाद,पानी,बिजली, बीज,कीटनाशक,यूरिया, पेट्रोल,डीजल,ट्रैक्टर, आदि सभी कुछ बहुत मंहगे हैं,लेकिन किसान द्वारा उत्पादित फसल को बाजार में बिचौलियों द्वारा मिट्टी के मोल लूट लिया जाता है ! किसानों की भी मजबूरी है कि वे खेती न करें तो करें क्या ?यही सरकारें एकतरफ किसानों को उनके द्वारा उत्पादित फसलों की न्यायोचित मूल्य तक नहीं दे रहीं हैं,जिससे किसान लाखों की संख्या में खुदखुशी कर चुके हैं और अभी भी प्रति आधे घंटे में एक की दर से उनकी आत्महत्या करना जारी है ! दूसरी तरफ पिछले कुछ सालों से अब तक इन्हीं सरकारों के कर्णधार अमीरों के 110 खरब रुपयों को एनपीए के चोर दरवाजे से माफ कर चुके हैं ! वैसे भी मोदी जैसे असहिष्णु और बर्बर व्यक्ति के इस देश के सत्ता प्रतिष्ठान पर रहते इस देश में आमजन,किसानों, मजदूरों, बेरोजगारों के लिए कुछ अच्छा करना एक दिवास्वप्न सरीखा ही है ! किसानों को उनकी फसलों की जायज कीमत न देकर वर्तमानसमय की सरकारें इस देश के 90 करोड़ लोगों को जबर्दस्ती गरीबी के दलदल में डुबोकर रखी हुईं हैं !
हकीकत यह है कि इस देश में अचानक लॉकडाउन लगाकर,जीएसटी लागूकर,अचानक नोटबंदी लगाकर,स्कूलों,अस्पतालों, रेलवे और अन्य बहुतेरे सार्वजनिक संस्थानों को बेचकर एक आम गरीब,आदिवासी,दलित और अन्यपिछड़े वर्ग के युवा को उसके जीवन निर्वाह के लिए मिलनेवाली नौकरी के अधिकार से जानबूझकर वंचित कर उसे आजीवन बेरोजगार कर गरीबी और अभावग्रस्त जीवन जीने को मजबूर किया है ! प्राइवेट स्कूलों की ऊँची फीस न दे पाने से उनके बच्चों को अशिक्षित करने तथा निजी अस्पतालों के मनमानी लूट-खसोट से उन्हें गरीबी के नरक में जबरन जाने की दुःस्थितियों को जानबूझकर पैदा किया है ! कितने दुःख और अफ़सोस की बात है कि मोदी की यह जनविरोधी सरकार जब कोरोना के भयावह काल में जब लोग अस्पतालों,बेडों, वेंटिलेटरों,दवाओं की कमी से त्राहि-त्राहि कर रहे थे,मर रहे थे,उस समय यह सरकार मेडिकल सेवाओं में सुधार करने के ठीक विपरीत कोरोनकाल में ही मेडिकल व्यवस्था में सुधार करने के ठीक उल्टा स्वास्थ्य बजट में 10 प्रतिशत की और कटौती कर दी थी ! शिक्षा के बजट में भी 6 प्रतिशत की तथा सामाजिक सुरक्षा के बजट को भी 1.5 प्रतिशत से घटाकर 0.6 प्रतिशत कर दी थी !
इस देश में कुछ सौ अमीरी की गगनचुंबी मीनारों को कदापि नहीं खड़ी करनी है,जिसके बगल में गरीबी के दलदल के अनन्त विस्तारित समुद्र में गरीब लोग कुपोषण,अशिक्षा,भूखमरी, बेरोजगारी से तिल-तिलकर मर रहे हों ! इस देश में मोदी ऐंड सरकार का यह कथित विकास का मॉडल कतई स्वीकार्य नहीं है ! हमें ऐसी जनहितैषी सरकारें और मानवीय प्रधानमंत्री चाहिए जो इस देश के अन्नदाताओं के दुःख को संजीदगी से सुनकर उनका मानवीय समाधान करें,कृषि में फसलों की लागत मूल्य कम करने के लिए उन्हें खाद,पानी,बिजली,डीजल,पेट्रोल, बीज,कीटनाशक,ट्रैक्टर आदि की कीमत न्यूनतम् रखी जाय,किसानों द्वारा उत्पादित फसलों की दलालों द्वारा लूटने पर उन्हें कठोरतम् दंड मिले, फसलों की कीमत न्यायोचित हो,जिससे किसान भी खुशहाल रहे,मजदूरों को भी इतनी मजदूरी मिले कि वे भी ठीक से अपने जीवन का निर्वाह कर सकें,शिक्षा रोजगारोन्मुखी हो,ताकि सभी को रोजगार मिल सके,कोई बेरोजगार युवा और किसान अपने जीवन से निराश होकर खुदकुशी करने को मजबूर न हो ! जातिवाद व धार्मिक प्रोपेगैंडा फैलाने वाले दरिंदों और नरपिशाचों पर कानूनी कार्यवाही करके उन्हें कठोरतम् दंड मिलना सुनिश्चित हो,ताकि धर्म और जातिवाद की वैमनस्यता फैलाने वाले मनुष्य के भेष में ये भेड़िए समाज में किसी भी सूरत में अमन और शांति को भंग न कर सकें ! हमें ऐसा विकास चाहिए कि धन का प्रवाह ज्यादे मानवीय हो,सभी के सर पर छत हो,सभी को दोनों वक्त की रोटी नसीब हो,सभी को मुफ्त शिक्षा मिल सके,किसी गरीब से गरीब बीमार व्यक्ति को भी सही समय पर बगैर किसी लूट-खसोट के समुचित और मुफ्त इलाज सुलभ हो,सभी लोग स्वस्थ्य व खुशहाल जीवन जी सकें,ऐसी व्यवस्था हो कि बगैर जातिगत व धार्मिक संकीर्णता के सभी जातियों,धर्मों और समुदायों के लोग भयमुक्त होकर शांतिपूर्वक इस देश में जी सकें ! यह देश सभी का है,जो यहाँ रहते हैं ! यह देश किसी भी ऐरे-गैरे की बपौती नहीं जो इसे अपनी मर्जी का नाम देकर उसी के अनुरूप इस राष्ट्र को बनाने का ख्वाब देखने लगे ! इस देश में अमन और शांति से रहनेवाले ही इस देश के वास्तविक देशभक्त हैं,इस देश के सुख-शांति और सौहार्दपूर्ण वातावरण में आग लगाने वाले दरिंदे किसी भी सूरत में देशभक्त नहीं हो सकते ! ऐसे गुँडों के समूहों को जो इस तरह की निंदनीय कुकृत्य करते हैं,उनको यथेष्ठ और कठोरतम् सजा मिलनी ही चाहिए ।

  • निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ‘, गाजियाबाद, उप्र,

Ramswaroop Mantri

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