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फेमिनिज्म! भारत में फेमिनिज्म के नाम पर जो होता है वह दरअसल मिजैन्ड्री

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बरून मिश्रा

भारत में अपने प्रचलित अर्थों से इतर फेमिनिज्म दरअसल वह विचार है जो लैंगिक आधार पर बिना भेदभाव के पुरुष और स्त्री दोनों को आर्थिक, सामाजिक , राजनैतिक, व्यक्तिगत और भावनात्मक स्तर पर समान अवसर उपलब्ध कराने की बात करता है। इसे आप ऐसे समझें कि मेरे पिताश्री ने अपने जीवन में मुझे और मेरी बहनों को एक स्कूल में पढ़ाया और आगे पढ़ने-बढ़ने के लिए समान अवसर दिया और अच्छी बडे कालेजो में भेजा, तो वे अघोषित रूप से कट्टर फेमिनिस्ट हैं। मै या आप अपनी बहन या बेटी की पढ़ाई या उसके उज्ज्वल भविष्य और स्वतंत्र जीवन के राह में आने वाली दिक्कतों को दूर करते हैं, तो आप भी कट्टर फेमिनिस्ट हैं। और इस प्रकार यह भी सच है कि आज के समय में भारत के आधे से अधिक पुरुष जाने अनजाने में कट्टर फेमिनिस्ट हैं।
अब आप सोचेंगे कि भारत में फेमिनिज्म के नाम पर जो देखते हैं, वह क्या है? कोई स्त्री यदि अपनी हर कविता, हर लेख में पुरुषों को गाली ही दे रही है, तो क्या वह फेमिनिज्म है? तो उत्तर है, नहीं। वह फेमिनिज्म नहीं है। अंग्रेजी में एक शब्द होता है-मिज़ैन्ड्री! अर्थात पुरुष जाति से घृणा का भाव… इसके ठीक विपरीत अर्थ वाला शब्द भी है, मिसोजिनी! अर्थात स्त्री जाति से घृणा का भाव! तो भारत में फेमिनिज्म के नाम पर जो होता है वह दरअसल मिजैन्ड्री है।

  अब प्रश्न यह है कि भारत में फेमिनिज्म का इस तरह अपहरण क्यों हो गया। फेमिनिज्म मिज़ैन्ड्री में कैसे बदल गया? तो इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि भारत में फेमिनिज्म को कोई लड़ाई लड़नी ही नहीं पड़ी।
  तनिक भारत से बाहर झांकिए। इंग्लैंड में कम्पनियों की ओर से पुरुषों के बराबर तनख्वाह और सुविधाएं पाने के लिए महिलाओं ने 1837 से 1850 तक लड़ाई लड़ी, तब यह अधिकार मिला। पर क्या भारत मे इसके लिए किसी फेमिनिस्ट को लड़ना पड़ा? नहीं।  अमेरिका में महिलाओं को मत देने का अधिकार दिलाने के लिये फेमिनिस्टों ने 1830 से आंदोलन शुरू किया और उन्हें यह अधिकार पाने में 72 वर्ष लगे। भारत में यह अधिकार भी 1947 में एक ही साथ पुरुषों और स्त्रियों दोनों को मिल गया।
  अमेरिका में स्त्रियों के पास सम्पत्ति रखने का अधिकार नहीं था। सिविल वॉर समाप्त होने के बाद युद्ध क्षेत्र में काम कर चुकी नर्सों और स्वयंसेवकों ने 1865 के आसपास से इसके लिए आंदोलन प्रारम्भ किया और बीस बर्ष बाद उन्हें "मैरिड वीमेन प्रोपर्टी एक्ट 1884" द्वारा पति से अलग अपने नाम से सम्पत्ति बना सकने का अधिकार मिला। और तो और, गल्फ कंट्रीज में कुछ वर्ष पूर्व तक स्त्रियों के पास गाड़ी चला सकने का अधिकार नहीं था, और दुनिया के असंख्य देशों में अभी भी स्त्रियां बिना नकाब के बाहर निकल सकने के लिए संघर्ष  कर रही हैं। 
 पर क्या भारत में फेमिनिस्टों ने इतना संघर्ष किया? नहीं। यहाँ तो अधिकांश मुद्दे स्वतः हल हो गए। अब ऐसा भी नहीं कि भारत में फेमिनिस्टों के लिए करने को कुछ है ही नहीं। स्त्रियों के लिए यहाँ भी बहुत लड़ाइयां लड़ी जानी बाकी हैं। नियोजित तरीके से मुद्दों से भटका देना, डेटिंग साइट्स से आंकड़े उठा कर उलूल जुलूल बयान देना, ऐसा माहौल बना देना कि नई पीढ़ी नारीवाद का सही अर्थ ही न समझ सके, ऐसी बातों विरुद्ध आवाज उठाने और लम्बी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है। भारतीय फेमिनिस्टों को तो बैठे बैठे मलाई चाटने की लत लग गयी है। फेमिनिज्म के नाम पर दुनिया के सभ्य समाज की ओर से आने वाले चंदे की राशि लूटनी है तो किसी भी तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी जाती है। कुकुरमुत्ते की तरह हर महीने उपजने वाले किस ऑफ लव, 70-30, मेरा देह मेरी मर्जी टाइप आंदोलन वही उपस्थिति दर्ज कराने की नौटंकी है।
 अब मुद्दा बचता है मिज़ैन्ड्री! पुरुषों के प्रति घृणा का भाव... इसके पीछे के कारणों पर चर्चा अगली पोस्ट में। मिलते हैं... और हाँ। पढियेगा जरूर, क्योंकि नट्टिन टोले में चर्चा है कि दक्षिणपंथी अनपढ़ होते हैं।

बरून मिश्रा

Ramswaroop Mantri

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