अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

फिल्मी सियासत लगातार….

Share

शशिकांत गुप्ते इंदौर

जब भी यह गीत सुनाई देता है। या हर कोई गुनगुनाता है,या गुनगुनाने का मन करता है।तब बहुत से व्यवहारिक प्रश्न,जहन में उपस्थित होतें हैं?गाने के बोल हैं, *दुःख भरे दिन बीते रे भैय्या अब सुख आयो से ……

फिल्मों में मात्र तीन घण्टों में जीवन की पूर्ण कहानी दर्शाई जाती है।फिल्मों में सब कल्पनातित होता है।उक्त गीत फ़िल्म *मदर इंडिया* में फिल्माया है।इस फ़िल्म की विशेषता यह है कि, फ़िल्म में  mother का किरदार जिस अभिनेत्री ने अदा किया है, वही अभिनेत्री व्यवहारिक जीवन में  फ़िल्म में उसी के  Son का अभिनय करने वाले कलाकार की Wife  बनी है।फ़िल्म में कुछ भी असम्भव नहीं है।गेंद के टप्पे के नीच ऊपर होते हुए,या सिलाई मशीन का चक्र जिस गति से घूमता है,उसी रफ्तार से छोटा सा बालक कलाकार, मिनिटों में युवा अभीनेता बन जाता है।फिल्मों में बेरोजगार का किरदार निभाने वाला अभिनेता फ़िल्म निर्माता से अभिनय का अनुबंध करतें समय ही मानधन( लाखों रुपयों में) तय कर लेता है।तय मानधन में से कुछ प्रतिशत पेशगी रकम प्राप्त करने के बाद फ़िल्म में अभिनय करता है।फ़िल्म अभिनेता के लिए निर्माता विभिन्न लोकेशन पर  Novacancy की सूचना पट्टिका लगा देता है। फ़िल्म की कहानी में तय  जगह अभिनेता को नोकरी मिल जाती है।अभिनेता को मिलने वाले पहले ही वेतन में अभिनेता परिवार के हर एक सदस्य के लिए उपहार लाता है

।यह दृश्य अर्थ व्यवस्था के चुनौती है?उपर्युक्त सारी स्थिति वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में वस्तुतः दृष्टि गोचर हो रही है।दुःख भरे दिन बीतेंगे और अच्छेदिन आएंगे यह फिल्मी स्टाइल का स्लोगन सन 2014 के चुनाव अभियान में बहुत प्रचलित किया गया था।पूर्व में फ़िल्म की पब्लिसिटी ठेला गाड़, तांगे में या ऑटो रिक्शा में की जाती थी।फिल्मी पोस्टरों का जुलूस भी निकाला जाता है।बहुत सी जगह बाकायदा माइक में बोलकर भोंपू के माध्यम प्रचार होता था।प्रचार के संवाद वही घिस-पिटे होतें थे।हर एक फ़िल्म के लिए एक जैसे संवाद बोले जातें थे।”महान सामाजिक,धार्मिक मारधाड़ से भरपूर फ़िल्म। यदि कोई सस्पेंस फ़िल्म होती थी तो, उसके लिए विज्ञापन के साथ एक सूचना होती थी,यह फ़िल्म  कमजोर दिल वाले ना देखें।

एक फ़िल्म के विज्ञापन के साथ एक सूचना होती थी,फ़िल्म का अंत ( The end) किसी को भी न बताए।यही सारी स्थिति आज वर्तमान राजनीति में देखने को मिल रही है।एक फ़िल्म में जो खलनायक का किरदार अदा करता है वो ही कलाकर दुसरें फ़िल्म में सभ्य, सज्जन व्यक्ति का रोल अदा करता है।फिल्मी क्षेत्र की एक खास बात जो राजनीति में हूबहू लागू होती है। वह है,फ़िल्म के क्षेत्र में “खलनायक को चरित्र अभिनेता संबोधित किया जाता है।”देश भक्ति की फ़िल्म में क्रांतिकारियों  का अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियां चना जोर गरम जैसे गीत भी गाते हुए दर्शाए जातें हैं।गीत के चनों में जमाल गोटा मिला होता है।राजनीति के संवादों में जुमले मिले होतें है।आश्चर्य तो इस बात का होता है कि,देश के भावुक नागरिक, कल्पनातित फिल्में और जुमले वाली राजनीति को बर्दाश्त करने का भरपूर माद्दा रखतें हैं।फिल्मों के सिर्फ नामों में ही भिन्नता होती है।फ़िल्म की कहानी, संवाद, दृश्य भले ही  भिन्न प्रकार से दर्शाए जातें हों, लेकिन हर एक कहानी में मसाला एक जैसा ही होता है।खलनायक का वही अत्याचार, अभिनेता की बहन या प्रेमिका के साथ दुष्कर्म ,वही पुलिस की खलनायक के साथ साठगांठ।राजनेताओं का किरदार निभाने वाले अभिनेताओं के भ्रष्ट्र आचरण और कानून के साथ खिलवाड़,प्रशासनिक व्यवस्था में दखलंदाजी आदि।यह देखकर लगता है कि,फिल्मी क्षेत्र और राजनीति का आपसी समन्वय है।भावुक दर्शक फ़िल्म बाकायदा टिकिट खरीद कर देखतें हैं और राजनेताओं को वोट देखर विजयी करतें हैं।बीते हुए दिन बरकरार रहतें है।मन ही मन यही कहना पड़ता है।अब पछताए क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत।इस तरह की चूक हर बार हो रही है।अब की बार अब की बार के चक्कर में।जागो ग्राहक जागो के साथ यह भी कहना पड़ेगा जगो नागरिकों जागो।

विकल्प? विपक्ष?मोर्चा?

विपक्षी एक साथ मिलकर मोर्चा बना रहें हैं।यह खबर पढ़ सुन कर  स्वप्नलोक में विचरण करने वालें कुछ लोगों को आंशिक राहत मिली है।पिछले चौरासी माह में तो राजनैतिक नक्शे से तो विपक्ष गायब ही हो गया था?विपक्ष की राजनीति को पश्चिम बंगाल में ऑक्सीजन मिली है।अधिकांश विपक्षियों का ममता के प्रति स्नेह जागृत हुआ है।विपक्ष बहुत जल्दीबाजी कर रहा है।विपक्ष को अभी लगभग चालीस+तीन वर्ष और इंतजार करना है। वर्तमान सत्तापक्ष को तो पूरे पचास वर्षो तक राज करना है।ऐसा सत्ता पक्ष का लक्ष्य भी है?विपक्षी एक हो भी जाएं तो विपक्ष के पास कोई चेहरा भी तो नहीं है?राजनीति में चेहरे की बहुत एहमियत हो गई है।विपक्षियों में कोई भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है, जिसने रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर चाय बेची हो? एक भी ऐसा नहीं है जिसका सीना छप्पन इंच का हो? विपक्ष में कोई ऐसा व्यक्ति भी नहीं है, जिसने साहस के साथ  अपनी भार्या का परित्याग किया हो?एक भी ऐसा नहीं है जो दावे के साथ कह सकें कि,ना तो मैं खुद खाऊंगा ना ही किसी को खाने दूंगा?विपक्ष ने देश में सत्तर साल कुछ भी किया नहीं है,तो विपक्ष अब जीत कर क्या कर लेगा? विपक्ष के पास ऐसी स्त्री नेत्रियां भी नहीं है,जो महंगाई को डायन कहतें हुए नांचते गातें रिक्त गैस सिलेंडर उठा कर विरोध प्रकट करें? विपक्ष के पास ऐसे नेता और नेत्रियां नहीं है, जो डीज़ल प्रेट्रोल के भाव बढ़ने पर साइकिल चलाकर मीडिया में के समक्ष विरोध दर्ज करा सकें?मीडिया के समक्ष साइकिल चलाने का विरोध प्रदर्शन की औपचारिकता जैसे ही समाप्त हो जाए तो, तुरंत स्वयं के कीमती चम चमाती वाहनों में अपने अपने गंतव्य की ओर रवाना हो सकें? विपक्ष के पास कोई ऐसा नेता है, जो कह सकें कि, देश के हर एक नागरिक को पन्द्रहलाख रुपये देंगे? देश के आंचल में रहनी वाली स्त्रियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए दिखावे के लिए सही कम से कम एक  बार ही सही,गैस सिलेंडर मुहैया करवा सकें? विपक्ष के पास है,कोई साहसी जो जो हिम्मत के साथ सिर्फ घोषणा कर सकें कि प्रति वर्ष दो करोड़ रोजगार उपलब्ध करने कराएंगे?विपक्ष के पास कोई रसायन शास्त्र का ज्ञाता है?जो नाली (गटर ) से निकलने वाली गैस से ईंधन की खोज कर स्वरोजगार के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकें?विपक्ष को मोर्चा बनाने के पूर्व उपर्युक्त योग्यताओं वाला कोई व्यक्ति नहीं चेहरा ढूंढना चाहिए? ततपश्चात मोर्चा बनाना चाहिए।एक खास योग्यता विपक्ष के पास यह भी होनी चाहिए,यदि सत्ता प्राप्त करने के लिए संख्या कम पड़ जाए तो हॉर्स ट्रेडिंग करते आना चाहिए?विपक्ष के पास कोई वाशिंग मशीन भी नहीं है,जो खाने वालों का हाजमा ठीक कर सके और पूर्व में लगे भ्रष्ट्राचार के आरोपो को निराधार साबित कर दूध का धुला कर सकें? राजनैतिक वाशिंग मशीन में यही तो गुणवत्ता है। इस मशीन में कोई कितना ही भ्रष्ट आचरण से मटमैला हो गया हो,वह गारंटी के साथ दूध का धुला हो जाता है?विपक्ष को समझना चाहिए, अभी चालीस + तीन वर्ष और इंतजार करना है।अभी तो जुम्मा जुम्मा चौरासी माह ही हुए हैं।विपक्ष के कोई भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है जिसमें सादगी दर्शाने के लिए दिन भर में चार बार कीमती परिधान पहनने की कूबत हो?विपक्ष के पास है कोई व्यक्ति जो महज दाढ़ी बढाकर रवींद्रनाथ टैगोर बनने की योग्यता रखता हो?यदि विपक्ष के पास उक्त सारी गुणवत्ता हो तो ही विपक्ष को मोर्चा बनाने पहल करनी चाहिए।एक अहम प्रश्न है? जो अमृतपान कर के अवतरित होतें हैं, वे ही हिम्मत के साथ प्रश्न पूछ ने की योग्यता रखतें हैं कि है कोई *विकल्प*विपक्ष के पास वंश परंपरा है।सत्ता के पास अविवाहितों का एक विशाल परिवार है।विपक्षियों को धैर्य रख कर मोर्चा बनाने की पहल करनी चाहिए।लेखक कोई प्रशांत हो है नहीं ना ही लेखक की आयु किशोर है।लेखक का सामान्य ज्ञान है वही लेखन ने प्रकट किया है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें