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*ध्यान : किस पर? किसी पर भी नहीं, मर जाओ !*

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        प्रस्तुति : डॉ. विकास मानव

ध्यान का अर्थ समझा जाता है : किसी केंद्र पर ध्यान करना या किसी का ध्यान करना। यह ध्यान नहीं है. आमतौर से समझा जाता है, ध्यान का मतलब है किसी पर ध्यान करना–कृष्ण पर, राम पर, बुद्ध पर, महावीर आदि पर : किसी नाम पर, किसी मंत्र पर, किसी रूप पर, किसी आकार पर. ये कोई भी ध्यान नहीं है।

       ये सबके सब विचार हैं। विचार की ही एकाग्र स्थितियां हैं। ध्यान किसी पर नहीं करना होता. ध्यान की मेरी परिभाषा है : जब आपके चित्त में कोई नहीं होता है तो आप ध्यान में होते हो। राम भी नहीं, कृष्ण भी नहीं, संसार भी नहीं, दुकान भी नहीं, मंदिर भी नहीं, कोई शास्त्र भी नहीं, कोई भजन, कुछ भी नहीं. जब कुछ भी नहीं होता है, आप ही अकेले रह जाते हो, तो वह जो स्टेट ऑफ माइंड है, वह ध्यान है।

किस भांति आप अपने भीतर बिलकुल अकेले रह जाओ कि वहां कोई भी न रहे आपके सिवाय, कोई पड़ोसी न रह जाए, तो आप ध्यान में हो। जब तक कोई पड़ोसी भीतर है तब तक आप ध्यान में नहीं हो। क्योंकि जब तक पड़ोसी भीतर है, तब तक आपका ध्यान उस पड़ोसी पर रहेगा। जब तक कोई भी चीज आपके भीतर है, तब तक आपका ध्यान उस चीज पर रहेगा, उस ऑब्जेक्ट पर रहेगा।

     जब तक किसी चीज पर ध्यान रहेगा, तब तक स्वयं पर नहीं रहेगा। ध्यान एक ही तरफ रह सकता है।

     अगर आप यहां बैठे हैं, और आपका ध्यान मेरी तरफ है, फिर आपका ध्यान आपकी तरफ नहीं रह जाएगा। ठीक ही है। ध्यान की दिशा एक ही तरफ होती है।

      तो अगर स्वयं पर जाना है और स्वयं की सत्ता और जीवन को देखना है, पहचानना है कि कौन है वहां, क्या है, तो सब तरफ से ध्यान-शून्य हो जाना चाहिए।

आमतौर से लोग कहेंगे, यह तो ठीक है, सब तरफ से ध्यान-शून्य हो जाएं, तो हम उसे कहां लगाएं? बस आपने लगाने का पूछा कि आप फिर किसी तरफ लगाने की बात पूछने लगे।

       मैं कह रहा हूं, सब तरफ से; तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यह तो ठीक है, आप कहे रहे हैं, लेकिन हम उसे कहां लगाएं? जब आपने पूछा, कहां लगाएं, फिर आप पूछने लगे कि फिर, फिर वह, फिर कोई चीज आप चाहते हैं जिस पर लगाया जाए।

      नहीं; मैं कहता हूं, ध्यान को कहीं न लगाएं, तो आप ध्यान में हो जाएंगे। इसे थोड़ा सा समझ लें, फिर प्रयोग हम करेंगे, उससे थोड़ा अनुभव शायद होगा कि ऐसी स्थिति है जब कि ध्यान कहीं न लगा हो। क्योंकि ध्यान तो ताकत है।

     मैं यहां बैठा हूं, अभी नहीं दौड़ रहा हूं, तो भी दौड़ना मेरे भीतर है। दौड़ने की शक्ति के लिए दौड़ना जरूरी नहीं है। नहीं तो फिर जो बैठे हैं वे कभी दौड़ ही नहीं सकेंगे। फिर जो दौड़ रहे हैं, वे कभी बैठ ही नहीं सकेंगे। दौड़ने की शक्ति मेरे भीतर इस क्षण भी है, जब कि मैं नहीं दौड़ रहा हूं। जब आपका ध्यान किसी चीज पर नहीं है तब भी ध्यान की शक्ति आपके भीतर होती है।

ध्यान की शक्ति अलग बात है और किसी चीज पर ध्यान होना उसका प्रयोग है। दौड़ने की शक्ति अलग बात है, दौड़ना उसका प्रयोग है, इंप्लिमेंटेशन है। वह तो उसका उपयोग है।

     तो अभी हम जो कर रहे हैं, वह ध्यान का उपयोग कर रहे हैं। अगर उपयोग छोड़ दें, तो शुद्ध ध्यान रह जाएगा। अगर सब उपयोग छूट जाए, तो ध्यान की शक्ति मात्र रह जाएगी। वह जो ध्यान की शक्ति मात्र है, उसको मैं ध्यान कह रहा हूं। उस क्षण में जब आप कुछ भी नहीं जान रहे हैं, स्वयं का जानना शुरू होता है। जब आपके ज्ञान में कुछ भी नहीं आ रहा है, तब आप अपने ज्ञान में आने प्रारंभ हो जाते हैं।

       जब तक आपके ज्ञान का कोई उपयोग हो रहा है, कहीं न कहीं कोई चीज उससे आ रही है, तब तक आपका ज्ञान उसे पकड़े रहता है और अपने पर आने में असमर्थ होता है।

       ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं है कि किसी एक चीज पर उसे लगा देना है। ध्यान का अर्थ है: चित्त कहीं न लगा हो, कहीं भी न लगा हो, नो व्हेयर, वह जो नो व्हेयर की, कहीं भी न होने की स्थिति है, वह स्वयं में होने की स्थिति है। जब आप कहीं भी नहीं होते, तब आप स्वयं में होते हैं। और जब आप कहीं भी होते हैं, तब आप स्वयं में नहीं होते। यह जो स्थिति है कहीं भी न होने की, यह आत्म-स्थिति है। और कहीं भी होने की स्थिति मानसिक स्थिति है।

ध्यान आत्मिक दशा है। यह आत्मिक दशा बड़ी सहज है, अगर बात ठीक-ठीक अंडरस्टैंडिंग में और समझ में हो। अन्यथा इससे कठिन और कोई चीज नहीं है। यह दुनिया में फिर सबसे कठिन बात है। यह फिर सबसे कठिन बात है। फिर एवरेस्ट पर चढ़ना बहुत आसान है और चांद पर पहुंचना बहुत आसान है और स्वयं के भीतर जाना बहुत कठिन है।

      इसलिए जो लोग समुद्र की पांच-पांच मील की गहराइयों में उतर जाते हैं, उनसे भी कहो कि अपने भीतर उतरो, तो वे कहेंगे, बड़ा मुश्किल है, अपने भीतर कैसे उतरें? जो लोग एवरेस्ट चढ़ गए हैं, उनसे कहो, अपने भीतर, तो वे कहेंगे, बड़ा कठिन है। फिर यह जो अत्यंत निकट है यह कठिन है, अगर बात ठीक से बोध में न हो। और अगर बात बोध में हो, तो एक कदम उठा कर बाहर जाना बहुत कठिन बात है, भीतर आना बहुत सरल बात है। क्योंकि भीतर आने के लिए कहीं भी जाना नहीं है।

       जाने में तो कुछ कठिनाई हो सकती है, भीतर आने के लिए कहीं भी नहीं जाना है। कैसे यह सबसे सरल और सबसे कठिन बात संभव हो सकती है।

*निष्क्रिय साधना : मर जाओ*

       इस प्रयोग में मृत्यु के भय वाली कोई बात ही नहीं है। यह प्रयोग तो हमें मृत्यु के भय से बाहर ले आता है। और फिर हमारा संकल्प इतना गहरा नहीं है कि मृत्यु घटित हो जाए! “मैं मर रहा हूँ!” यह भाव करते ही हमारा शरीर शवासन में प्रवेश कर जाता है और शवासन में प्रवेश करते ही शरीर शव के जैसा शांत और शिथिल होने लग जाता है। 

शरीर शिथिल होने के साथ ही विचार और श्वास भी धीरे-धीरे शांत और शिथिल होने लगती है तो हमारे शरीर की स्थिति और मृत व्यक्ति के शरीर की स्थिति एक समान हो जाती है। सिर्फ एक ही फर्क होता है, मृत व्यक्ति शरीर के बाहर होता है और हम शरीर के भीतर होते हैं। हम शरीर के बाहर नहीं जा पाएंगे और मृत व्यक्ति शरीर के भीतर नहीं जा पाएगा। बाहर से हमारा शरीर, मृत शरीर के समान होगा और भीतर हमारा मन पूरी तरह से जागा हुआ होगा,  यह है ध्यान वाली स्थिती।

        इस स्थिति में जितनी देर हम रह सकें रह सकते हैं फिर दो चार गहरी श्वास लेकर प्रयोग के बाहर आ सकते हैं। 

———————-

       ‌मन सदा सक्रिय है। लेकिन सक्रिय रहते हुए ध्यान असंभव है। ध्यान का अर्थ है, गहन निष्‍क्रियता। तुम अपने को तभी जान सकते हो जब सब कुछ अचल, शांत और मौन हो जाता है। उस मौन में ही तुम अपना साक्षात्कार कर सकते हो।

‌       ‌सक्रियता में, जब तुम किसी न किसी चीज में व्यस्त हो, तुम्हें अपनी उपस्थिति का एहसास नहीं हो सकता; तुम अपना विस्मरण किए रहते हो। तुम सतत किसी न किसी बात में उलझे रहकर अपने को भूले रहते हो। सक्रियता का अर्थ है, अपने से बाहर किसी चीज से संबंधित होना।

       तुम जब सक्रिय होते हो तो तुम अपने से बाहर किसी चीज से संबंधित होते हो। कर्म बाहर होता है। निष्‍क्रियता का अर्थ है कि तुम घर लौट आए; अब तुम कुछ कर नहीं रहे।

      तुम्हें पूरी तरह निष्‍क्रिय, सभी तरह निष्‍क्रिय होना पड़ेगा। तुम्हें सिर्फ होना है; कुछ करना नहीं है। सभी लहरें शांत हो जानी चाहिए सभी काम—काज विदा हो जाने चाहिए। तुम हो, सिर्फ तुम हो। उस क्षण में ही तुम पहली बार अपनी प्रेजेंस के प्रति, अपने होने के प्रति बोध से भरते हो। क्यों?

यह उपस्थिति ही इतनी सूक्ष्म है। ऐसी सूक्ष्म उपस्थिति के प्रति स्थूल विषयों से घिरे रहकर, स्थूल काम—काज में व्यस्त रहकर तुम बोधपूर्ण नहीं हो सकते। तुम्हारी उपस्थिति बहुत ही मौन संगीत है; और तुम इतने शोरगुल से भरे हो, हर तरह के शोरगुल से भरे हो, कि तुम अंतस की इस मौन, सूक्ष्म ध्वनि को नहीं सुन सकते।

     तो बाहर के शोरगुल और सक्रियता से मुक्त होओ। तभी तुम पहली बार उस मौन, शांत नाद को सुन सकोगे; तभी तुम उस अनाहत नाद को, उस निशब्द संगीत को महसूस कर सकोगे। तब तुम स्थूल को छोड़कर सूक्ष्म में प्रवेश करते हो। सक्रियता स्थूल है; निष्‍क्रियता सूक्ष्म है। और तुम्हारी उपस्थिति, तुम्हारा होना जगत में सूक्ष्मतम चीज है।

       उसकी प्रतीति के लिए तुम्हें नहीं हो जाना होगा, तुम्हें सब जगह से अनुपस्थित हो जाना होगा। तभी तुम्हारी समग्र उपस्‍थिति घटित होगी और तुम अपना साक्षात्कार कर सकोगे।

      यही कारण है कि अनेक विधियों में शरीर को मृतवत करने के लिए कहा गया है। इसका इतना ही अर्थ है कि मृत व्यक्ति की तरह निष्‍क्रिय हो जाओ। ध्यान करते समय शरीर को मृत्यु में प्रवेश करने दो। यह कल्पना ही होगी; लेकिन कल्पना भी सहयोगी होगी। यह मत पूछो कि कल्पना कैसे सहयोगी हो सकती है। कल्पना का अपना ही काम करने का ढंग है।

अब तो वैज्ञानिक प्रयोग उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, तुम बैठे हो और एक डाक्टर तुम्हारी नाड़ी देख रहा है। तुम अपने भीतर क्रोध पैदा करो। सिर्फ कल्पना करो कि तुम क्रोध में हो, लड़ रहे हो। और तुम्हारी नाड़ी की गति तुरंत बढ़ जाएगी। फिर दूसरा प्रयोग करो। भीतर कल्पना करो कि तुम मर रहे हो, तुम अभी मरने जा रहे हो। शांत हो जाओ और भाव करो कि तुम पर मृत्यु उतर रही है।

      तुम्हारी नाड़ी की गति कम हो जाएगी। नाडी की गति सर्वथा शारीरिक बात है और तुम महज कल्पना कर रहे थे। लेकिन कल्पना बिलकुल झूठ ही नहीं है, उसकी अपनी सच्चाई है। अगर तुम सच में कल्पना कर सको, भाव कर सको, तो सच्ची मृत्यु भी घटित हो सकती है। भाव से भौतिक चीजें भी प्रभावित की जा सकती।

       यह कल्पना की करामात है। जिन्होंने मनुष्य के मन को गहराई में देखा है वे कहते हैं कि कल्पना वैसी ही सच है जैसी कोई भी चीज। कल्पना महज कल्पना नहीं है; क्योंकि वह यथार्थ बन जाती है।

तो यह प्रयोग करो।

     जमीन पर लेट जाओ और भाव करो कि मैं मर रहा हूं मेरा शरीर मृतवत हो रहा है। धीरे— धीरे तुम्हें शरीर में एक भारीपन महसूस होगा; सारा शरीर बोझिल हो जाएगा। तब अपने को यह सुझाव दो कि अगर मैं अपना हाथ उठाना चाहूं तो वह उठने वाला नहीं है। और तब तुम कोशिश करके भी अपने हाथ को उसकी जगह से नहीं हटा पाओगे। अब भाव काम करने लगा है।

      इस स्थिति में, जब तुम्हारा शरीर मृतवत हो जाए, तुम अपने को कर्म के जगत से आसानी से अलग कर सकते हो। यही कारण है कि मृतवत होने को कहा जाता है। तुम अब निष्‍क्रिय हो सकते हो; क्योंकि तुम मर गए हो। अब तुम समझते हो कि सब कुछ मर गया है और तुम्हारे और संसार के बीच का सेतु टूट गया है। शरीर वह सेतु है। जब शरीर ही मर गया तो तुम कुछ नहीं कर सकते। क्या तुम शरीर के बिना कुछ कर सकते हो? कुछ नहीं कर सकते।

        सब कर्म शरीर से ही होता है। मन सोच—विचार कर सकता है और कुछ नहीं कर सकता। शरीर के मृतवत होते ही तुम निर्बल हो गए; अब तुम कुछ भी नहीं कर सकते। तुम भीतर चले गए; संसार बाहर पड़ा रह गया, वाहन ही न रहा, सेतु टूट गया।

       इस हालत में तुम्हारी ऊर्जा भीतर की ओर बहने लगेगी, क्योंकि उसके बाहर जाने का उपाय न रहा। बाहर का मार्ग अवरुद्ध हो गया, बंद हो गया। इसलिए अब भीतर सरक जाओ।

      भीतर जाकर तुम अपने को हृदय—केंद्र पर खड़ा पाओगे। अब तुम भीतर से अपने पूरे शरीर को विस्तार से देखो। और जब तुम पहली बार अपने ही शरीर को भीतर से देखोगे तो तुम्हें अजीब—अजीब अनुभव होंगे।

         तंत्र, योग, आयुर्वेद, जो भी प्राचीन शरीर—विज्ञान हैं, उनके बड़े से बड़े सिद्धात ऐसी ही आंतरिक ध्यान—विधियों के जरिए उपलब्ध हुए थे। आधुनिक शरीर—विज्ञान चीर—फाड़ के जरिए जाना गया है; लेकिन प्राचीन शरीर—विज्ञान ध्यान के जरिए जाना गया था। अब तो चिकित्सा—जगत में ऐसे विचारकों का समूह आगे आ रहा है जो कहता है कि जब तुम किसी शरीर को चीर—फाड़कर कुछ जानते हो तो वह जानना मृत शरीर के बाबत खबर देता है। और जो भी मृत शरीर से जाना जाता है वह जीवित शरीर के लिए प्रासंगिक नहीं हो सकता।

        ये विचारक सही हो सकते हैं। अगर तुम मेरा खून निकाल लो और उसकी जांच करो तो तुम मरे हुए खून की जांच करोगे। यह वही खून नहीं रहा जो मेरे भीतर प्रवाहित था। ऊपरी तौर से तो यह वही है; लेकिन यह यथार्थत: वही नहीं है। मेरे भीतर वह जीवंत प्रवाह था, वह जीवित था, जैविक इकाई का अंग था; बाहर आते ही वह मृत हो गया।

      यह ऐसा ही है कि तुम पहले मेरी आंखें निकाल लो और तब उनकी जांच करो। जब वे आंखें मेरे साथ थीं, तब मैं उनके पीछे था, मैं उनमें था; अब वे मृत पत्थर हैं। और तुम उनके संबंध में जो भी जानोगे मेरी आंखों की बाबत नहीं जानोगे। क्योंकि उनका बुनियादी अंश, सारभूत अंश उनमें नहीं रहा—मैं उनमें नहीं रहा। वे आंखें एक बड़े पूर्ण का अंग भर थीं।

       उनकी गुणवत्‍ता ही बड़े पूर्ण का अंग होने में थी। अब वे अलग है, किसी का अंग नहीं हैं। संबंध टूट गया है; जीवंत संपर्क टूट गया है।

योग और तंत्र की सब परंपराएं कहती हैं कि जब तक तुम जीवित शरीर को नहीं जानते तब तक तुम्हारा ज्ञान झूठा है। लेकिन जीवित शरीर को कैसे जाना जाए? उसका एक ही उपाय है कि तुम अपने भीतर प्रवेश करो और वहां से शरीर को विस्तार से देखो। इन विधियों के जरिए एक भिन्न जगत का, एक जीवंत जगत का उदघाटन हुआ है।

 पहली बात है कि अपने हृदय में स्थित होओ, वहां से अपने शरीर को सब तरफ से देखो। इससे दो चीजें घटित होंगी। एक, अब तुम्हें यह नहीं लगेगा कि मैं शरीर हूं। अब तुम्हें अनुभव होगा कि मैं द्रष्टा हूं सजग हूं देखने वाला हूं। अब तुम दृश्य न रहे।

      पहली बार तुम्हारा शरीर आवरण बन जाएगा और तुम उससे पृथक हो जाओगे। और दूसरी चीज यह होगी कि तुम तुरंत जानोगे कि मैं मर नहीं सकता।

      यह अजीब लगेगा कि एक काल्पनिक विधि के प्रयोग से, मृत्यु की कल्पना की विधि के प्रयोग से, कोई अमृत बिंदु को पहुंच जाए, कोई अचानक यह जान जाए कि मैं नहीं मर सकता।

     तुमने औरों को मरते देखा है। उन्हें क्या हुआ? उनके शरीर मृत हो गए और उससे ही तुमने अनुमान लगाया कि वे मर गए। लेकिन अब तुम देख सकते हो कि पूरा शरीर मृत पड़ा है और तुम जीवित हो। शरीर की मृत्यु तुम्हारी मृत्यु नहीं है। शरीर मर जाता है और तुम आगे बढ़ जाते हो।

      अगर तुम इस विधि का सतत प्रयोग करते रहे तो वह समय दूर नहीं है जब तुम अपने शरीर से बाहर आकर और बाहर खड़े रहकर देख सकते हो कि तुम्हारा शरीर तुम्हारे सामने मृत पड़ा है। यह बहुत कठिन नहीं है।

       एक बार तुम्हें इसका अनुभव हो जाए तो तुम फिर वही आदमी नहीं रहोगे। तुम्हारा दोबारा जन्म हो जाएगा, तुम द्विज हो जाओगे। अब एक नया जीवन शुरू होता है।

     मृत्यु को सघन ध्यान के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, क्योंकि उससे तुम निष्‍क्रिय हो जाते हो। तब ऊर्जा संसार से मुक्त हो जाती है और वह अंतर्यात्रा पर निकल सकती है। यही कारण है कि शवासन का सुझाव दिया जाता है।

      जीवन और मृत्यु दोनों का उपयोग उसे खोजने के लिए करो जो दोनों के पार है।

Ramswaroop Mantri

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