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खानपान..अथ चाट पुराण

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मोनिका ठाकुर (नरसिंहपुर)

Agarwal Chaat Bhandar, Purana Sahar, Jhansi
 _क्या आप जानते हैं दुनिया की पहली चाट कौन सी है? भारत में क्रिकेट और सिनेमा को कोई एक चीज लोकप्रियता में टक्कर दे सकती है तो वो है “चाट”।_
     आँख से देखने भर से जीभ को स्वाद दे जाए ऐसी सुंदर सलोनी चाट अपने नाम के अनुसार चटखारेदार होती है। हर बाजार में चाट की दुकान पर लगी भीड़ हो या शादी के reception में छप्पन भोग से पहले चाट के स्टाल पर प्लेट लेकर लोलुप निगाहों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे लोगों की लाइन, सब चाट को भोजन का अश्वमेध विजेता साबित करती है।
 _आज चाट की चटखारेदार कहानी जानते हैं :_
 आखिर चाट तो चाट क्यों कहते हैं? इस सवाल का जवाब जितना आसान है उतना ही मुश्किल। 
    कुछ विद्वानों का मानना है कि चाट शब्द की उत्पत्ति इसके शाब्दिक अर्थ 'चाटना' से हुई है। चाट होती भी इतनी स्वादिष्ट है कि लोग अपनी उँगलियाँ और कभी कभी तो पत्तों से बनी कटोरी जिसे दोना कहा चाट कर इसे हजम कर जाते थे।
  _हालांकि, दूसरा दावा है कि इसके स्वाद की वजह से ये नाम दिया गया. बताया जाता है कि चाट का स्वाद अपने आप चटपटा था. इस वजह से इसे चाट कहा गया._ 
     लेकिन एक बात तय है कि इसको खाने से चटकारा तो निकलता है। अजीत वडनेरकर अपनी किताब शब्दों के सफर में लिखते हैं कि चटकारा का मतलब होता है किसी चरपरी, चटपटी चीज़ को खाने के वक्त जीभ और तालु से टकराने से उत्पन्न ध्वनि।
 _मोनियर विलियम्स के अनुसार संस्कृत की चट् धातु में तोड़ना, छिटकना जैसे भाव शामिल हैं। जीभ के तालु को स्पर्श करने और फिर पूर्वावस्था में आने से यह स्पष्ट हो रहा है। इस तरह चटकारकः का अर्थ हुआ चट् की ध्वनि करना।_
     हिन्दी में इसका रूप हुआ चटकारा या चटखारा। इससे जुड़ा हुआ मुहावरा है चटकारे भरना यानी पसंदीदा चीज़ को रस ले लेकर खाना, चाट-चाटकर खाना। खाते समय उंगलियां और होठ चाटना। 
  इसी तरह चाट को पसंद करने वाले और खाने की चीज़ो पर लार टपकाने वाले व्यक्ति को चटोरा कहा जाता है, जो चट् धातु से ही बना है। 
   _ये तो हुई चाट शब्द की बात। अब बात करते हैं चाट के इतिहास की :_

चाट का इतिहास भी खुद चाट की ही तरह घालमेल वाला है। अगर भोजन इतिहास के प्रख्यात विद्वान के टी अचैया की बात मानें तो सबसे दुनिया की पहली चाट का तमगा “दही वड़ा” को मिलेगा। उन्होंने अपनी किताब “ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड” में दही वड़ों का मसालेदार वर्णन किया है।
वो कहते हैं कि 500 ईसा पूर्व सूत्र साहित्य में सबसे पहले वड़ों का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 12वीं सदी के सोमेश्वर तृतीय द्वारा लिखित संस्कृत ग्रन्थ मानसोल्लास में “क्षीरवटा” के नाम से दही वड़े का उल्लेख है. मानसोल्लास में वड़ों को दूध, चावल के पानी या दही में भिगोने का उल्लेख है।
दही का उल्लेख वेदों में भी किया गया है, और कहा जाता है कि दही को तमिल साहित्य में काली मिर्च, दालचीनी और अदरक के साथ मसालेदार बनाए जाने का वर्णन मिलता है।
इसलिए पूरी संभावना है कि वड़े में दही मिलाकर विभिन्न चटनी और अनारदाना मसाला के साथ परोसना ही पहली चाट है। अब तो इसका स्वाद उत्तर से दक्षिण भारत में अलग अलग है। उर्दू में दही बड़े, पंजाबी में दही भल्ला, तमिल में थायिर वड़ाई, मलयालम में थायरु वड़ा और तेलुगू में पेरुगु वड़े इसके कुछ लोकप्रिय नाम हैं।
दही भल्ला दही बड़ा से थोड़ा सा अलग होता है। भल्लों में पपड़ी, तले आलू और चने का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं दही वड़े को दही और मिर्च-मसाले के साथ परोसा और खाया जाता है.

अचैया आगे कहते हैं कि 12वीं शताब्दी में मानसोल्लास में पापड़ी का उल्लेख पुरिका के रूप में किया गया है। उनके वर्णन के हिसाब से यही पुरीका आज की पापड़ी चाट की पापड़ी है, जो चने के आटे, मैदा या गेहूं के आटे में जीरा और अजवाइन मिला कर कुरकुरी तली हुई होती हैं।
चाट को अक्सर सेंधा नमक या काला नामक के साथ परोसा जाता है। के टी अचाया के अनुसार, महाभारत में सेंधा नमक, और काला नमक के उपयोग का उल्लेख है। इसका उल्लेख चरक और बौद्ध विनय पिटक में भी मिलता है।
इमली, जो आज पानीपुरी का मुख्य आधार है, भारत में प्रागैतिहासिक काल में उगाई जाती थी। अरबों ने इसे तामार-उल-हिंदी, या “भारत का फल” कहा, और मार्को पोलो ने इसे 1298 ईस्वी में इमली के रूप में संदर्भित किया। केटी अचैया ने भारतीय भोजन में बौद्ध युग से सादावा का उल्लेख किया है जो वर्णन के अनुसार या तो एक मसालेदार फल की चाट या मसालेदार फल पेय जैसा लगता है।
बौद्ध काल के दौरान अदरक, जीरा और लौंग का प्रयोग आम था। आर्यकाल में काली मिर्च (मरीच) और हींग (हिंग) का उल्लेख है। पानी के स्वाद के लिए इमली और फलों का इस्तेमाल आम था।
तो कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वज भी काफी चटोरे थे और चाट का स्वाद उन्हें पता था।

अब चाट के जन्म की एक और कहानी :
भोजन विद्वान कुरुश दलाल के अनुसार, चाट की उत्पत्ति 17 वीं शताब्दी के अंत में मुगल सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान उत्तरी भारत (अब उत्तर प्रदेश) में हुई थी।
कहते हैं कि बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान, १६वीं शताब्दी में, हैजा का प्रकोप हुआ था। बहुत कोशिश की गई लेकिन ये बीमारी काबू में नहीं या रही थी। ऐसे में कहा जाता है कि उस समय के दरबारी चिकित्सकों ने सुझाव दिया कि बहुत सारे विशेष मसालों के साथ भोजन बनाया जाए ताकि यह बैक्टरिया को मारने में मदद कर सके।
इसके बाद ही इमली, लाल मिर्च, धनिया और पुदीना जैसे मसालों से एक खास व्‍यंजन (Spicy Chaat) को तैयार किया गया. आलू तो जहांगीर के समय में ही भारत में प्रवेश पा चुका था। फिर क्या था चटोरों की चाँदी हो गई।
एक दूसरी कहानी चाट के आविष्कार का श्रेय शाहजहाँ के ही हकीम अली नामक दरबारी चिकित्सक को देती है, जिन्होंने मुगल राजधानी दिल्ली के लोगों को मसालेदार और तले हुए स्नैक्स के साथ-साथ दही का सेवन करने की सलाह दी।
माना जाता है कि यमुना नदी का पानी भारी हुआ करता, पचने में मुश्क़िल था तो उन्होंने कहा कि व्यंजनों में पानी की जगह दही का प्रयोग किया जाए। यही प्रयोग बाद में चाट के आविष्कार का कारण बना।

खैर! चाट जिसने भी बनाई हो उसका मानव जाति पर बड़ा एहसान है। अनेकानेक लोगों की लपलपाती जीभ को शांति देने का पवित्र कार्य करने के लिए चाट निर्माता का नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित होना चाहिए।
अब जाते जाते विभिन्न प्रकार की चाट का नाम जपते हैं। आलू टिक्की, गोलगप्पा, पालक चाट, आलू चाट, कटोरी चाट, राजकचोरी, बास्केट चाट, भेक पूरी, सेव पूरी, मटर चाट, दही बड़ा, दही भल्ला, कांजी वड़ा, समोसा चाट और नया जाने कितने सुस्वादु अवतार लेकर चाट आम जनता को परम सुख की अनुभूति करवा रही है।
बनारस की टमाटर चाट और मुरादाबाद की दाल मुरादाबादी थोड़ी अलग किस्म की चाट है। इसका स्वाद एक बार तो लेना बनता है।

चाट एक बहुरूपिया भोज्य पदार्थ है। इसके अनगिनत रूप हैं लेकिन कमाल ये है कि चाट कोई भी हो जीभ और आत्मा को एक तरह से ही परमानन्द देती है।
अभी फिलहाल आप मन में ही मीठी, खट्टी, तीखी, मसालेदार, गरमागरम और कुरकुरी चाट का आनंद लें।
🍃चेतना विकास मिशन

Ramswaroop Mantri

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