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नींव विभाजन की – नारा अखंड भारत का

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डॉ. अभिजित वैद्य

दूसरा महायुद्ध भड़क उठा था l हिटलर नामक वंशद्वेश का दावानल एक के बाद एक राष्ट्र को निगलकर
दूसरी ओर लाखों ज्यू लोगों का वंशच्छेद करके आगे बढ़ रहा था l जल्द ही यह दावाग्नि रशिया एवं इंगलैंड
को भी ध्वस्थ करेगा ऐसी स्थिति निर्माण हुई थी l ब्रिटिश साम्राज्य का कभी न डुबनेवाला सूरज शायद
डुबनेवाला है ऐसा दिखाई दे रहा था l ‘ब्रिटिशों को घेरे में लेकर स्वातंत्र्य प्राप्त करने का यही समय है’ इस
बात को मद्देनजर रखते हुए महात्मा गांधीजी के नेतृत्त्व में कॉंग्रेस ने ८ अगस्त १९४२ को ‘छोड़ो भारत’,
‘क्विट इंडिया’ का नारा दिया और पूरा देश धधक उठा l दुसरे महायुद्ध में भारतीय सैनिकों को ब्रिटिशोंकी
सहायता के लिए भेजना कांग्रेस शासन ने मना तो किया ही अपितु कांग्रेस के सभी प्रादेशिक मंत्रिमंडल के
सदस्यों ने १९३९ में ही इस्तिफें दे दिए l उस वक्त किए हुए अपने भाषण में महात्मा गांधीजी ने – देश के
मुस्लिमों को दुय्यम समझनेवाले हिंदुत्ववादी नेताओं का निषेध करते हुए डँटकर कहा था कि, ‘यह देश
जितना हिंदूओं का है उतनाही यहाँ रहनेवाले मुसलमानों का भी है l’ इस सभा से दुसरे ही दिन गांधी जी,
नेहरु, पटेल तथा हजारों स्वतंत्रता सेनानी कों अंग्रेज सरकार ने गिरफ्तार किया l उन्हें रखने के लिए
कारागृह पर्याप्त नहीं थे l
करोडो भारतीय जिस ‘छोड़ो भारत’ आंदोलन में जान की बाजी लगाकर सहभागी हुए थे उस आंदोलन को
कम्युनिस्ट, मुस्लिम लीग तथा हिंदू महासभा के गुटों द्वारा विरोध किया गया l इनमें से कम्युनिस्ट लोगों का
कहना इन दो गुटों से अलग किस्म का था l हिंदू महासभा ने देश के युवाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में
सहभागी होने की अपेक्षा ब्रिटिश फ़ौज में दाखिल होना उचित है ऐसा आवाहन करके सावरकर के नेतृत्व में
ब्रिटिशों की फ़ौज भरती की मुहीम खोल दी l १९४२ में कानपूर में हुए अधिवेशन में कांग्रेस का यह
राष्ट्रवाद झूठा है ऐसा कहकर ब्रिटिशों की सहायता करने की अपनी नीति है ऐसा सावरकर ने अपने भाषण
में कहा था l ब्रिटिशों की माफ़ी माँगकर मुक्त होनेवाले तथा उस वक्त के जिलाधिकारीयों के वेतन से दुगना
निवृत्ती वेतन लेनेवाली व्यक्ति से अन्य कौनसी अपेक्षा करेंगे ? दूसरी ओर इन्हीं हिंदुत्ववादियों का आदर्श
था, ज्यू लोगों का वंशच्छेद करनेवाला, आर्यवंश श्रेष्ठता की गर्जना करनेवाला मनोरुग्न हिटलर l मुसोलिनी
तथा हिटलर की नाझी संघटनाओं के बलबुते पर डॉ. मुंजे तथा अन्य लोगों ने आर.एस.एस. का निर्माण
किया था l भले ही हिटलर एवं जापान की मदद लेकर ब्रिटिशों के विरोध में आझाद हिंद सेना निर्माण
करनेवाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी की सेना में भरती न होकर हिटलर के यह अनुयायी हिटलर के विरोध
में उतर गए थे l
हिंदू महासभा १९४१ में बेंगॉल में मुस्लिम लीग के फझलुल हक़ के नेतृत्व में सरकार में दाखिल हुई l हिंदू
महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस मंत्रिमंडल में अर्थमंत्री के रूप में नियुक्त हुए l एक साल पूर्व इसी
फझलुल हक ने पाकिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र करनेवाली माँग का प्रस्ताव किया था l इसके लिए कांग्रेस ने उनकी
कड़ी आलोचना की थी l २६ जुलाई १९४२ को श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा अंग्रेज सरकार को लिखे हुए पत्र
में लिखा था की, ‘ ब्रिटिशों के विरोध में ‘छोड़ो भारत’ का जो आंदोलन है वह बेंगॉल प्रांत में अयशस्वी होने

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के लिए हिंदू महासभा तथा उनकी सरकार सारे प्रयास करेंगी’ l सिंध प्रांत की विधानसभा ने भी पाकिस्तान
निर्मिती का समर्थन देनेवाला प्रस्ताव किया था l इसी सिंध प्रांत में हिंदू महासभा ने जीना एवं मुस्लिम लीग
के साथ मिलीभगत करके गुलाम हुसेन हिदायतुल्ला के नेतृत्व में सरकार स्थापित की थी l इसी तरह की
सरकार हिंदू महासभा ने फिर एक बार १९४३ में ईशान्य प्रांत में सरदार औरंगझेब के नेतृत्व में स्थापित
की थी I इसका मतलब, देश स्वतंत्रता संग्राम लड रहा था, हजारों आम जनता उसमें बलिदान दे रही थी
तब मुस्लिम लीग एवं हिंदू महासभा हाथ में हाथ मिलाकर भारत के विभाजन की नींव ठंडे दिमाख से डाल
रहे थे l वजह स्पष्ट थी l दोनों की वैचारिक नीति सामान थी l एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा, एक दुश्मन,
धर्मनिरपेक्षता का इनकार, विविधता का इनकार ! दोनों का भी दविराष्ट्र्वाद के सिधांत पर दृढ़ विश्वास l
लाहोर में पाकिस्तान निर्मिती का प्रस्ताव करने से मुस्लिम लीग द्वारा तीन साल पूर्व अहमदाबाद के
अधिवेशन में सावरकर ने अपने भाषण में कहा था, ‘भारत एक संघ राष्ट्र नहीं है l भारत दो राष्ट्र हैं, एक हिंदू
एवं एक मुस्लिम’ l उनका यह पूरा भाषण मुस्लिमों की इर्ष्या से पूरी तरह से भरा हुआ था l इसी
सावरकरजी ने आगे चलकर मुस्लिम लीग से दोस्ती की l इस्लाम जिसे निषिद्ध मानता है वह सुअर का
गोश्त भक्षण करनेवाले, शराब पीनेवाले तथा विदेशी पोशाक करनेवाले जीना ने मुसलमानों का समर्थन
पाने हेतु १९३६ से ही ‘इस्लाम खतरे में है’ ऐसा नारा देना आरंभ किया था l गाय एक उपयुक्त पशु है ऐसा
कहकर गोमांस भक्षण करने का समर्थन करनेवाले सावरकरजी के समर्थकों ने बाद में ‘ हिंदू खतरे में है’ ऐसी
घोषणा की l ‘धर्म खतरे में’ कभी नहीं होता l उस धर्म पर राजनीति एवं धंधा करनेवाले ‘खतरे में’ होते है
तब ‘धर्म खतरे में है’ ऐसा नारा दिया जाता है l बाद में मुस्लिम लीग एवं हिंदू महासभा का स्थानीय
चुनाओं में दारुण पराजय होते गए l जनता ने उन्हें खुलेआम इनकार दिया था l मुस्लिम लीग मुस्लिमों का
समर्थन करनेवाला तथा हिंदू महासभा हिंदूओं का प्रतिनिधित्व करनेवाला पक्ष ऐसा मानकर जनता ने उन्हें
दुतकार दिया था l भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व करनेवाला पक्ष मानकर कांग्रेस को जनता ने स्वीकृत
किया था l सावरकरजी को लोकमान्य तिलकजी की कांग्रेस अपेक्षित थी, मुसलमानों की खुशामद
करनेवाली गांधीजी की कांग्रेस नहीं चाहिए थी यह दावा कितना झूठा है यह इसमें से दिखाई देता है l
गांधीजी को नेतृत्व की पगडंडी तिलक एवं गोखले जी ने डाल दी थी l मुस्लिमों की खुशामद करने के कारण
नथुराम ने गांधीजी की हत्या की ऐसा कहना भी गलत है l म. गांधीजी जब अपने जीवन में जातिअंत तक
पहुँच गए और दलित-सवर्ण विवाहों का समर्थन करने लगे तब उनके दौरे में संघ एवं हिंदुत्ववादी संघटनाओं
ने हर स्थान पर निदर्शन करना आरंभ कर दिया l इसलिए १९३२ में नथुराम ने गांघीजी की हत्या करने का
पहला असफल प्रयास किया था l एक वैष्णव, तृतीय वर्ण की व्यक्ति स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व ब्राम्हणों
के हाथों से अपने हाथ में लेता है, उस स्वतंत्रता आंदोलन में सभी जाती-धर्म के लोगों को खींचकर लाता है,
आगे चलकर जातिव्यवस्था का इनकार करता है, अस्पृश्य लोगों के लिए स्वतंत्र मंदिर न रखकर बल्कि सभी
मंदिरों में प्रवेश करने की उन्हें खुली कर देता है, दलित एवं सवर्ण विवाह पर आग्रही रहता है, भारत सभी
जाती-धर्म का देश है ऐसा प्रचार करता है इसीलिए गांधीजी की हत्या की गई l भारत स्वतंत्र होने के बाद
उसे हिंदूराष्ट्र बनाने का उनका हिंदुत्ववादीयोंका सपना गांधीजी के कारण भंग हुआ था l वास्तव में यह
हिंदुराष्ट्र का ही सपना नहीं था अपितु मनुवादी व्यवस्था फिरसे जारी करने का सपना था l अपना सपना
भंग होने का यह गुस्सा था l
सावरकर ने अस्पृश्यता का विरोध किया और समरसता की रचना कर के स्नेह भोजन आयोजित किए ऐसा
कहा जाता है l उन्होंने डा.बाबासाहब आंबेडकरजी के ‘चवदार तळे’ के आंदोलन का समर्थन किया था ऐसा
भी कहा जाता है l समरसता एवं जातिअंत इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है l समरसता का अर्थ है सभी प्रकार

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की जाती-धर्म के लोगों ने इकठ्ठा व्यवहार करना l जातिअंत की भूमिका अपनाने के लिए आपको वर्ण
व्यवस्था का इनकार करना पड़ता है, और इसके लिए मनुस्मृति का धिक्कार करना पड़ता है l सावरकर इस
भूमिका के तहत कभी पहुँचे नहीं l उन्होंने ब्राम्हणों का डंका बजाय है l डा. बाबासाहब आंबेडकरजी का
उल्लेख ‘हिंदुद्वेश से माथा सटका हुआ आदमी’ ऐसा किया l बुद्ध को महान कहकर फिर राष्ट्रद्रोही कहा है l
‘मुस्लिम शत्रु की हाथ में आई हुई स्त्री की अप्रतिष्ठा न करते हुए सम्मान के साथ वापस भेजना ‘सद्गुण
विकृति’ है और इसलिए इतिहास के छह सुवर्ण पन्नों में छत्रपती शिवाजी महाराज को स्थान नहीं दिया l
महाराज के जिस गुण पर पूरी जनता ने बहुत प्यार किया वह गुण सावरकर को विकृत लगा l विजय प्राप्त
करने के बाद हिंदू सैनिकोंने मुस्लिमों की मस्जिदों को ध्वस्त करना चाहिए था ऐसा विचार सावरकर ने
रखा l विजयप्राप्ती के बाद एक भी मस्जिद को ध्वस्त न करनेवाले, अफझलखान की कबर बनानेवाले
शिवाजी महाराज, औरंगजेब की कबर बाँधने की अनुमति देनेवाली ताराराणी जैसी महाराष्ट्र की उदात्त
परंपरा उनकी दृष्टी से विकृत थी l ये सब पुरुषार्थ की रचना वे रत्नागिरी में ब्रिटिशों को लिखित रूप में
कुबूल की हुई राजकीय निवृत्ति, ब्रिटिशों ने उनपर सौंपी हुई स्थानबध्द्ता भोगकर और ब्रिटिशों से बड़ा
निवृत्ति वेतन लेकर कर रहे थे l १९२४ के बाद का कालावधि था l देश की स्वतंत्रता को करीबन २३ साल
शेष थे l सावरकर ब्रिटिशों का निवृत्ति वेतन लेकर और घर में बैठकर देश को आजाद करने का प्रयास कर
रहे थे और भारतीय इतिहास का विकृतीकरण कर रहे थे l ‘किसी हिंदू का धर्मांतर, मुस्लिम होने का अर्थ है
व्यक्ति का हैवान होना, किसी भगवान का दैत्य होना’ ऐसा कहनेवाले सावरकर प्रत्यक्षरूप में धर्मांध
मुस्लिमों के साथ हाथ में हाथ मिला रहे थे l यक्ष, किन्नर, दैत्य, दानव, राक्षस ये सब अनार्य इस देश के मूल
निवासी l आर्यों की यज्ञ संकृति, हिंसा का उन्होंने कडा विरोध किया l अनार्यों का इश्वर भगवान शंकर l
आर्य देवताओं का राजा इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति की पत्नीका जब हरण किया तब बृहस्पति मदद हेतु शंकर
भगावन के पास पहुँचे l तब शंकर भगवान ने इस फ़ौज को उनकी मदद के लिए भेजा था l आर्य ब्राम्हणों ने
इन शब्दों को पशुवत वर्तन को समांतर कर डाले l इसी परंपरा से सावरकर ने यही शब्द मुस्लिमों के लिए
किस तरह से इस्तेमाल किए यह बात देखने जैसी है l

मनुवादियों ने देश का सामाजिक विभाजन हजारों वर्ष पूर्व कर रखा था l इस विभाजन के कारण देश
हजारों साल गुलामगिरी में ढकेल दिया गया l लेकिन देश के धर्म पर आधारित विभाजन का आरंभ भी
मनुवादियों ने किया था इस बात को भी हमें ध्यान में लेना चाहिए l लेकिन ऐसा होने पर भी वे ‘अखंड
भारत’ का नारा हमेशा क्यों करते हैं? जब देश स्वतंत्र होगा तब मुस्लिमों का पाकिस्तान राष्ट्र तथा हिंदूओं
का हिंदुस्तान राष्ट्र निर्माण होगा ऐसा उनका अंदाज गलत साबित हुआ I इस्लामधिष्ठित पाकिस्तान का
निर्माण हुआ, लेकिन दूसरी तरफ भारत नामक जनतंत्र, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र निर्माण हुआ जिसमें करोड़ो अन्य
धर्म के लोगों ने स्वेच्छा से रहने का निर्णय लिया l इस भारत के हिंदू समाज को राजकीय तौर पर अगर
इकठ्ठा करना है तो अखंड भारत के सपनों का गाजर दिखाकर उसी सपने में भारत सीधे तौर पर
अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका तथा ब्रम्हदेश के साथ भौगोलिक तौर पर जोड़ देने का और इस सभी
भूभाग पर जो समाज है वह आज ना कल हिंदू होगा ऐसा कहते रहना, याने एक सामर्थ्यशाली अखंड भारत
का खोखला सपना दिखाना इसका एकमात्र उद्देश यही है कि भूखा आदमी सामर्थ्य एवं संपन्नता के सपने
देखकर पेट की भूख भूल जाता है l नशा में चूर समाज सबकुछ भूलकर वोट बैंक बनेगा l और ऐसा होने पर
हिंदुराष्ट्र घोषित करके सामाजिक विषमता पर आधारित समाजव्यवस्था का निर्माण करना यही अंतिम

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मक्सद है l अन्य धर्म के लोगों को, खासतौर पर मुस्लिमों को, दुय्यम नागरिकत्व देने का और देश की
साधनसंपदा का चुटकीभर लोगोंद्वारा उपभोग लेते रहने का षडयंत्र याने फिर हजारों वर्षों की गुलामीके
कालखंड की यह शुरुआत हैं l

Ramswaroop Mantri

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