मंजुल भारद्वाज
क्या अर्थ है तमसो मा ज्योतिर्गमय का? अंधेरे से उजाले की ओर .. अंधेरा मतलब ? उजाला मतलब?
क्या अंधेरे का अर्थ कालेपन से है? और उजाले का अर्थ रोशनी से.. जैसे रात और दिन ?
दिन में सूर्य की रोशनी भौतिक प्रकाश बिखेरती है, भौतिक रूप से आंखों को दिखाई देता है पर क्या अंधेरा दूर होता है?
वैसे ही क्या रात वाकई अंधेरी होती है या उसमें भी दिखाई देता है, रात भी चमकती है, रात में भी दिखाई देता है…
क्या वाकई में भौतिक रूप से पृथ्वी पर अंधेरा होता है या रोशनी होती है? या पृथ्वी पर ना अंधेरा होता है और ना उजियारा . … सारा फ़र्क आंखों से भौतिक जग को देखने का नहीं दृष्टि आलोकित होने का है !
क्या दृष्टि अंधेरे से उपजती है? या अंधेरा दृष्टि को आलोकित करता है?
18-20 दिसंबर,2022 को हुई तीन दिवसीय (आवासीय) थियेटर ऑफ़ रेलेवंस कार्यशाला में सहभागियों ने अंधेरे -उजाले के खेल के रहस्य को भेदा।
रात को 10 बजे अंधेरे में सहभागी बिजली की लाइटों से दूर अंधेरे में चलने लगे ! पहले अंधेरे में बैठकर मिट्टी को देखा , रेत,पत्थर दिखाई दिए पर भय था सांप का क्योंकि कार्यशाला स्थल जंगल हैं या कहें सापों के बसेरे में कार्यशाला हो रही थी !
अंधेरे में ज़मीन के रेत,मिट्टी और पत्थरों को जब आंख देखने लगी तो सभी सहभागियों ने आसमां को देखा । घने पेड़ों की ऊंचाई के पार चमकते सितारों ने मन मोह लिया और सांप के भय को भुलाते हुए सभी को रोमांच से भर दिया!
अंधेरे में आगे बढ़ते हुए एक अभ्यास किया सहभागियों ने, सहभागी भारतीय ,यूरोपियन ( इंग्लैंड, जर्मनी और स्वीडन) के निवासी थे ! सब अपनी अलग भौगोलिक ,सांस्कृतिक ,सामाजिक ,वैज्ञानिक समझ से अंधेरे – उजाले को समझ रहे थे !
उत्प्रेरक ने सभी सहभागियों को कहा को एक अभ्यास दिया। सभी सहभागियों को कहीं दूर से आती रोशनी या सितारों से चमकती रात की पेड़ों से छन कर आती रोशनी में घने पेड़ों की तरफ़ एक और देखते हुए 10- 15 कदम चलने को कहा ।
सभी सहभागियों को चलते हुए यह देखना था की क्या घने पेड़ों में उनके साथ साथ कोई और भी चल रहा हैं ?
सभी सहभागियों को आत्माओं के भय ने घेर लिया सब को अलग अलग आकृति अपने साथ चलती हुई दिखाई दी ।
अंधेरा है तो दिखाई कैसे दिया? क्या अंधेरे ने उनके अंदर रोशनी भर दी । या अंधेरे ने उनकी कल्पना शक्ति को जगा दिया और सभी की कल्पना शक्ति उनके सांस्कृतिक सामाजिक और भौगोलिक परिवेश से उड़ान भर कर अलग अलग आकृति गढ़ने लगी ।
10मिनट के इस आकृति गढ़ने की उड़ान को सभी ने एक दूसरे को बांटा कहीं मनुष्य की आत्माएं पेड़ों पर टंगी हुई थी ,कहीं बड़ी बिल्ली की एक आंख दिख रही थी,कहीं भूत नहीं होते की दिलासा मन को समझा रही थी ,कहीं विज्ञान के कई सिद्धांतों को अंधेरे – उजाले की कसौटी पर परखा जा रहा था।
सभी की आपबीती सुनने के बाद उत्प्रेरक सहभागियों को उन घने पेड़ों के बीच ले गया जहां यह आकृतियां दिखाई दे रही थीं। 10 मिनट घने पेड़ों के बीच रहते हुए हर किसी को यकीन हो गया की भूत नहीं होते। थोड़ी देर पहले इन पेड़ों में जो आकृतियां दिखाई दे रहीं थीं वो उनके दिमाग में उड़ती हुई कल्पनाओं का कमाल था।
सभी सहभागी कलाकार थे इसलिए उत्प्रेरक ने घने पेड़ों के बीच अलग छिद्रों से झरती हुई रोशनी से लाइट डिजाइनिंग पर प्रकाश डाला। क्या कलाकारों को दिखाना है नाटक के लक्ष्य को साधने के लिए। लाइट कितनी मंद या तीव्र होगी या किस ऊंचाई या तल से एंगल से आएगी का अनोखा अभ्यास किया।
घने पेड़ों से निकलते हुए सभी सहभागी ट्यूब लाइटों की रोशनी वाले मिट्टी के रंगमंच पर आ गए । यानी उजाले में आ गए।
रूटीन या जड़ परिस्थिति हज़ारों सूर्य रोशन होने के बाद भी अंधेरे में डूबाती है और बदलती हुई या अनजानी परिस्थिति स्याह रातों में भी उज्ज्वलित हो उठती है। उजाला रात या दिन नहीं दृष्टि का आलोकित होना है। कलाकार दृष्टि आलोकित करता है। अनजानी ,अनदेखी ,अनसुनी परिस्थितियों को साध दुनिया को जड़ता से मुक्त करता है !
कलाकार का शारीरिक जन्म यौनिक क्रिया से होता है पर कलाकार दुनिया में घटने वाली अनदेखी, अनसुनी प्रक्रियाओं को साधने से जन्मतें हैं!





