दिव्या गुप्ता
गौरी लंकेश ( 29 जनवरी 1960 – 5 सितम्बर 2017 ) का कल जन्मदिन था. गैर फांसीवादी लोग भी उनको याद नहीं किए. वह गोलियों से छलनी न कर दी गई होतीं, तो आज अपना 63 वां जन्मदिन मना रही होतीं. वह रहना चाहती थीं, उन्हें बहुत कुछ करना था, कहना था, लेकिन उन्हें उनके घर के सामने गोली दाग दी गई. एक जनतांत्रिक मुल्क में वह अपनी अभिव्यक्ति केलिए शहीद हुईं.
गौरी पत्रकार थीं. एक संघर्षशील पिता की संघर्षशील पुत्री. उनके पिता पी लंकेश प्रसिद्ध सोशलिस्ट थे. लोहिया के सहयोगी,जिन्होंने “लंकेश पत्रिके ” नाम से कन्नड़ में एक टेबलायड पत्रिका निकाली, जिसने विज्ञापन न लेने की प्रतिज्ञा ली थी. गौरी अपने पिता की राह चलीं . पत्रकार बनना तय किया. दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेसन से प्रशिक्षित होकर वह टाइम्स ऑफ़ इंडिया से जुडी और फिर कई पत्रिकाओं में काम करते हुए अपने पिता की कन्नड़ पत्रिका को संभाला.
लेकिन भाई से वैचारिक मतभेद हुए और उन्होंने लंकेश पत्रिके को “गौरी लंकेश पत्रिके” बना दिया. नए विचारों को लेकर वह उत्साहित रहती थीं और लिंगायतों की क्रांतिकारी धारा ,जिसकी जड़ें वासवा जैसे संत -विचारकों में हैं, का प्रतिनिधित्व करती थीं. उन्हें धमकियाँ मिलती रहती थीं. लेकिन वह बहादुर थीं, कभी डरीं नहीं.
बढ़ती हुई मजहबी कट्टरता के बीच वैज्ञानिक चेतना रखने वाले लोगों का जीना मुश्किल होता जा रहा है. अब तो कई तथाकथित सेकुलर-सोशलिस्ट भी धर्म -मजहब के मामले में दखल न देने की अपील करने लगे हैं. लेकिन नई दुनिया बनाने वालों को तो पुरानी दुनिया के खिलाफ बोलना ही होता है. यूरोप में बाइबिल और पादरियों पर सवालिया निशानों के साथ ही नवजागरण आया. बुद्ध ने अपने पूर्व के धर्म की आलोचना की और कबीर ने अपने समय के धर्मों की. समाज में जब वैज्ञानिक चेतना बढ़ेगी तब धार्मिक किताबों की कौन कहे, ईश्वर पर सवाल उठेंगे. उठे हैं.
पुराने ज़माने में भी चार्वाक ने वेद और ईश्वर को झूठा कहा. हर देश ,और हर दौर में ऐसे सवाल उठे हैं. मंसूर को आखिर क्यों मारा गया था? गैलेलियो जैसे वैज्ञानिक को चर्च ने किसलिए दण्डित किया था ? आज गैलेलियो सही है,या वे चर्च ? गुरु याज्ञवल्क से उनकी शिष्या गार्गी ने ब्रह्म पर सवाल उठाए थे. उस वक्त बन्दूक होती तो याज्ञवल्क उसे शायद गार्गी पर दाग देते. लेकिन,तब बन्दूक नहीं थी. गुरु ने जीभ काटने की धमकी देकर छोड़ दिया था.
गौरी लंकेश उसी महान परंपरा से जुड़ती हैं. नरेंद्र दाभोलकर , गोविन्द पानसरे , म म कलबुर्गी की शहादत वाली कतार में गौरी लंकेश भी चुपचाप लग गईं हैं. मेरे लिए उनका स्मरणीय महत्व यह भी है कि महिषासुर प्रकरण पर उन्होंने कन्नड़ में न केवल लिखा, बल्कि संघर्ष किया. हमारे ज्यादातर वामपंथी मित्र माइथोलॉजी को लेकर हुए विमर्श को निरर्थक मानते हैं . गौरी जी ने इसके महत्त्व को समझा था .
मैं बार -बार सोचती हूँ ये दाभोलकर , पानसरे ,कलबुर्गी और गौरी लंकेश ही क्यों मारे गए ? इन सबने क्या किया था . ये राजनीतिक लोग नहीं थे . ये सांस्कृतिक प्रतिरोध कर रहे थे कट्टरता और उस सनातनी संस्कृति का जो पाखंड और अवैज्ञानिक विचार फैला रहा है. हम महसूस करते हैं कि पूरे मुल्क में फासीवाद नई-नई शक्लों में उभर रहा है . हम इसके खिलाफ एक हों , गौरी लंकेश के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि शायद यही होगी. (चेतना विकास मिशन).





