कर्नाटक में राज्यपाल ने राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण के 11 पैराग्राफ पढ़ने से मना कर दिया. केवल तीन लाइनें पढ़कर सदन से चले गए. केरल और तमिलनाडु में गर्वनर्स ने यही किया है. ये टकराव आखिर क्या कहता है. संविधान में इस बारे में क्या व्यवस्था है. ऐसे में राज्य सरकारों के सामने क्या विकल्प है. क्या संवैधानिक संकट की स्थिति बढ़ेगी और संघीय ढांचा कमजोर होगा.
कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानसभा सत्र में पूरा अभिभाषण पढ़ने से मना दिया. सदन से वॉकआउट कर गए. केवल कर्नाटक ही क्यों इसी तरह के मामले तमिलनाडु, केरल और दूसरे राज्यों में भी सामने आए हैं. आखिर गर्वनर अपनी ही राज्य सरकारों के कामकाज से जुड़े अभिभाषण को पढ़ने से मना कर रहे हैं. वो केंद्र सरकार के अंग के तौर पर ज्यादा काम करते नजर आ रहे हैं. ऐसे में संविधान क्या कहता है. राज्य सरकारें इस पर क्या कर सकती हैं.
हालिया विवाद कर्नाटक विधानसभा में हुआ. अभिभाषण में कर्नाटक सरकार ने केंद्र पर टैक्स और फंड के बंटवारे में भेदभाव करने का आरोप लगाया था. राज्यपाल ने इसे और उन्हें आपत्तिजनक लग रहे 11 पैराग्राफ्स पढ़ने से मना कर दिया. सत्र की शुरुआत में राज्यपाल ने केवल तीन लाइनें पढ़ीं. इसके बाद उन्होंने बाकी भाषण पढ़ने से मना कर दिया. सदन से बाहर चले गए.
“मैं आप सभी का स्वागत करता हूं. मुझे खुशी है कि मैं एक बार फिर कर्नाटक विधानमंडल को संबोधित कर रहा हूं. मेरी सरकार राज्य के आर्थिक, सामाजिक और भौतिक विकास की गति को दोगुना करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. जय हिंद, जय कर्नाटक.”
कर्नाटक के राज्यपाल ने अभिभाषण के जिन 11 पैराग्राफ को भाषण से डिलीट कर दिया, उस पर उन्होंने कड़ा ऐतराज जताया था. इन पैराग्राफों में केंद्र सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना की गई थी. राज्यपाल का तर्क था कि वे एक संवैधानिक पद पर हैं. केंद्र सरकार के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियां पढ़ना उनके लिए उचित नहीं है.
विवाद की सबसे बड़ी जड़ केंद्र का नया कानून ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB-G RAM G है. राज्य सरकार ने अपने भाषण में इस नए कानून की आलोचना की थी. इसे मनरेगा को खत्म करने की साजिश बताया था. राज्यपाल का कहना था कि चूंकि यह कानून संसद द्वारा पारित हो चुका है, इसलिए इसके खिलाफ बोलना असंवैधानिक होगा. उन्होंने इन हिस्सों को ‘सरकारी प्रोपेगेंडा’ करार दिया.

कहां राज्य सरकारों और राज्यपालों में तनातनी
जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां राज्य सरकारों और राज्यपाल के बीच हर बात को लेकर कामकाजी तनाव नजर आ रहा है.वहीं सत्ताधारी दल से जुड़ी सरकारों में ये एकदम नहीं है. जब तक दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी, तब तक यहां उप राज्यपाल सरकार के हर काम को रोकते नजर आ रहे थे. रोज सुर्खियों में होते थे. अब जब से दिल्ली में बीजेपी की सरकार बनी है, तब ये एकदम खत्म हो चुका है.
हालांकि अब राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच अभिभाषण को लेकर विवाद मुख्य रूप से 3 राज्यों में सबसे ज्यादा नजर आया. तमिलनाडु में राज्यपाल और मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बीच विवाद सबसे पुराना और तीखा है.
राज्यपाल आर.एन. रवि ने कई बार सरकार द्वारा तैयार भाषण को पूरा पढ़ने से मना कर दिया. उन्होंने भाषण के उन हिस्सों को छोड़ दिया जिनमें ‘द्रविड़ मॉडल’ या कुछ खास राजनीतिक विचारधाराओं का जिक्र था. हाल ही में उन्होंने यह आरोप लगाते हुए सदन से वॉकआउट किया कि राष्ट्रगान का अपमान किया गया. उनका माइक बार-बार बंद किया गया.
केरल में राज्यपाल और वामपंथी सरकार के बीच ‘अभिभाषण’ और ‘विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों’ को लेकर लंबा विवाद चल रहा है. जनवरी 2026 के सत्र में राज्यपाल ने कैबिनेट द्वारा पास किए गए भाषण के उन हिस्सों को छोड़ दिया जो केंद्र सरकार की वित्तीय नीतियों की आलोचना कर रहे थे. मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इसे ‘असंवैधानिक’ करार दिया.
विवाद की मुख्य वजह
1. इन राज्यों का आरोप है कि राज्यपाल ‘केंद्र के एजेंट’ के रूप में काम कर रहे हैं और राज्य सरकार के कामकाज में बाधा डाल रहे हैं.
2. केवल भाषण ही नहीं, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में राज्यपालों ने विधानसभा द्वारा पास किए गए कई बिलों को लंबे समय तक रोके रखा है, जिसे लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है.
3. राज्यपालों का तर्क है कि वे ‘रबर स्टैम्प’ नहीं हैं. गलत या भ्रामक तथ्यों को पढ़ने के लिए बाध्य नहीं हैं. वहीं राज्य सरकारों का कहना है कि संविधान के अनुसार राज्यपाल को कैबिनेट की ‘सलाह और सहायता’ पर ही काम करना चाहिए.
क्या राज्यपाल को अभिभाषण पढ़ना जरूरी
भारत के संविधान के अनुच्छेद 176(1) के तहत, राज्यपाल के लिए साल के पहले सत्र में कैबिनेट द्वारा तैयार किया गया अभिभाषण पढ़ना अनिवार्य होता है. कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसे संविधान का अपमान बताया और कहा कि राज्यपाल कैबिनेट द्वारा स्वीकृत भाषण को बदलने या छोड़ने का अधिकार नहीं रखते. वहीं राज्यपाल ने अपने विवेकाधिकार का हवाला देते हुए कहा कि वे ऐसे दावों को नहीं पढ़ सकते जो तथ्यों से परे हों.
ये घटनाएं संघीय ढांचे में राज्यपाल बनाम राज्य सरकार के बीच राजनीतिक टकराव को दिखाती हैं. जिसमें राज्यपाल केंद्र के प्रति ज्यादा जवाबदेह दीख रहे हैं.
संविधान क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय में पहले भी कहा है कि “राज्यपाल को सामान्यतः कैबिनेट द्वारा तैयार किए गए भाषण को ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि वह सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है, राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का नहीं.”
भारतीय संविधान में राज्यपाल के अभिभाषण का प्रावधान अनुच्छेद 176 में है. अनुच्छेद 176(1) कहता है कि राज्यपाल को विधान सभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के बाद पहले सत्र के शुरू में और हर साल के पहले सत्र के शुरू में विधान सभा (या विधान परिषद वाले राज्य में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक) में अभिभाषण करना होता है.
अनुच्छेद 175 राज्यपाल को विधानमंडल के सदन या सदनों में अभिभाषण करने और संदेश भेजने का सामान्य अधिकार देता है.
कौन ये अभिभाषण तैयार करता है
अभिभाषण राज्य सरकार द्वारा तैयार किया जाता है. राज्यपाल इसे पढ़ते हैं. राज्यपाल इसमें अपने व्यक्तिगत विचार नहीं जोड़ सकते या बदलाव नहीं कर सकते. यह सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का बयान होता है. अगर राज्यपाल इसे पढ़ने से मना करते हैं या बदलाव करते हैं, तो यह संवैधानिक परंपरा का उल्लंघन माना जा सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यपाल का ऐसा न करना संविधान के खिलाफ है, लेकिन इसे बदलने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत है. संविधान राज्यपाल को अभिभाषण करने का दायित्व देता है, लेकिन अगर वे सरकार के तैयार भाषण से असहमत हैं तो वे पढ़ने से मना कर सकते हैं, जो मौजूदा समय में राजनीतिक विवाद का कारण बन रहा है. यह मुद्दा दक्षिणी राज्यों में केंद्र-राज्य संबंधों की खराबी को उजागर करता है.
ऐसे में राज्य सरकारें क्या कर सकती हैं
1. सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में जा सकती हैं – राज्य सरकारें राज्यपाल के फैसले को चुनौती दे सकती हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा है कि राज्यपाल की कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के अधीन है. यदि राज्यपाल थावरचंद गहलोत अभिभाषण पढ़ने से इनकार करते, तो कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के पास जाने की योजना बना रही है. राज्यपाल का इनकार अनुच्छेद 176 का उल्लंघन है, जो अभिभाषण को अनिवार्य बनाता है. तमिलनाडु में भी राज्य सरकार कोर्ट में जाने का मन बना रही है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में कहा गया है कि राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह पर चलना चाहिए. हालांकि कुछ विशेषज्ञ (जैसे कलकत्ता HC का 1966 फैसला) कहते हैं कि राज्यपाल अप्रासंगिक हिस्सों को हटा सकते हैं, लेकिन पूरी तरह मना नहीं कर सकते.
2. अभिभाषण परंपरा को चुनौती दी जा सकती है – राज्य सरकारें अनुच्छेद 176 को बदलने या अभिभाषण की परंपरा को खत्म करने के लिए संसद में संशोधन की मांग कर सकती हैं. तमि.नाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने 21 जनवरी 2026 को कहा कि DMK समान विचार वाले दलों के साथ मिलकर संशोधन लाएगी, क्योंकि यह “ब्रिटिश अवशेष” है और विपक्षी राज्यों में दुरुपयोग होता है. पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने भी इसे “बेकार औपचारिकता” कहा था. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य भी इसी तरह की मांग कर सकते हैं.
3. विधानसभा में रेजोल्यूशन पास करना – राज्य सरकारें अभिभाषण को “पढ़ा हुआ” मानकर रेजोल्यूशन पास कर सकती हैं. कार्यवाही जारी रख सकती हैं. जैसे तमिलनाडु ने किया. 20 जनवरी 2026 को राज्यपाल के वॉकआउट के बाद तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से रेजोल्यूशन पास किया कि सरकार का मूल भाषण ही रिकॉर्ड में रहेगा. हालांकि ये बात भी विवाद बढ़ा सकती है.
4. राजनीतिक दबाव और गठबंधन – विपक्षी राज्य सरकारें अन्य राज्यों के साथ मिलकर केंद्र पर दबाव बना सकती हैं. सरकारी आंकड़ों से राज्यपाल के दावों को चुनौती दे सकती हैं.
संवैधानिक प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?
अनुच्छेद 176 के अनुसार, अभिभाषण जरूरी है लेकिन यदि राज्यपाल इनकार करते हैं, तो विधानसभा की कार्यवाही रुकती नहीं. राज्यपाल भाषण टेबल पर रखकर जा सकते हैं, और सदन जारी रहता है. यदि ऐसा बार बार होता रहा तो “संवैधानिक संकट” हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्स पर (अनुच्छेद 200) समय सीमा तय की है, जो अभिभाषण पर लागू हो सकती है. हालांकि राज्यपालों का ये व्यवहार संघीय ढांचे को कमजोर करता है.





