जनार्दन सिंह बलिया
वित्तीय पूंजी (साम्राज्यवाद) कृषि क्षेत्र में घुसकर कैसे उसे अपने ऊपर निर्भर बना लेती है, उस पर प्रभुत्व कायम कर लेती है,और फिर कब्जा करती है—— इसका उदाहरण क्रमश: हरित क्रांति डंकल प्रस्ताव व कांन्ट्रैक्ट फार्मिंग है
आप पुरानी पीढ़ियों के लोगों से पता कर लीजिए की कृषि में हरित क्रांति (और फिर सफेद क्रांति) लागू होने से पहले कृषि आत्मनिर्भर थी। गांव से ही कृषि संसाधन—– बीज, कुआँ, तालाब, नदी से सिंचाई, राख की कीटनाशक, हल बैल प्राप्त हो जाते थे, इन्हीं संसाधनों व वर्षा द्वारा कृषि उत्पादन होता था, उत्पादन कम था, अत: खाने पीने की समस्या थी, खेती पिछड़ी हुई थी, लेकिन आत्मनिर्भर थी।
अतः कृषि विकास हेतु साम्राज्यवादी सरकारों उनके विश्व बैंक व भारतीय सरकार द्वारा हरित क्रांति और सफेद क्रांति शुरू की गई, हरित क्रांति के तहत आधुनिक बीज, खाद, ट्यूबेल, ट्रैक्टर व रासायनिक दवाओं से खेती की जाने लगी, यह सारे संसाधन गांव की जगह शहरों बाजारों में मिलते हैं, और वह भी नगद, फलत: हरित क्रांति के नाम से आई आधुनिक बाजारों उद्योगों व बैंकों पर निर्भर होती गई, उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन लाभ मिला कृषि लागत के सामानों व उपभोक्ता सामान बनाने व बेचने वाले देशी-विदेशी पूंजीपतियों को; किसान घाटे का शिकार होकर गरीबी, फटेहाली, झेलता टूटन का शिकार बनता गया।
दरअसल यह हरित (व सफेद) क्रांतियां किसानों को कृषि लागत सामग्री की, एवं उपभोक्ता सामानों की, एवं कर्जे की मंडी (अर्थात वित्तीय पूंजी हरित क्रांति से किसानों की समृद्धि के प्राचारी दावों के विपरीत किसानों को संकटग्रस्त होना ही था, और वही हुआ भी (उदाहरण हरित क्रांति का लक्ष्य था शहरों में कार्यरत कारखानों के मजदूरों कर्मचारियों व मध्यम वर्गीय तबकों को संस्था व भरपूर खाद्यान्न की आपूर्ति करना इससे उद्योगपतियों वित्तपतियों को सस्ते श्रम फलत: ज्यादा मुनाफे व सूद की प्राप्ति हो जानी थी, सो हुआ भी, इसी उद्देश्य हेतु साम्राज्य देशों व उनके दलाल अरब देशों को खाद्यान्न फल, सब्जी, गोश्त, दूध आदि की जरूरतों व औद्योगिक कच्चे मालों की आपूर्ति हेतु ही हरित क्रांति की योजना लागू की गई थी।
किसान पुनः पुरानी खेती की ओर अब लौट नहीं सकते, क्योंकि पुराने बीज, खाद, हल बैल जैसे संसाधन कृषि क्षेत्र से गायब हो चुके हैं, शुरू शुरू में कृषि विकास हेतु सस्ती लागत सामग्री सिंचाई सस्ते कर्ज देकर 40 से 50 वर्षों से साम्राज्यवाद ने कृषि को अपने ऊपर निर्भर बनाने का लक्ष्य पूरा कर चुका है, अतः अब कृषि एवं सिंचाई हेतु सहायतायें इत्यादि देना कम या बंद कर दिया गया।
अपने चारित्रिक गुणों के अनुसार साम्राज्यी जानते थे कि किसान नई खाद बीज खरीदने के, इसके लिए कर्ज लेने और अपने उत्पादन बाजारों में खरीदने बेचने के आदी बन जाएंगे, तो किसानों को ज्यादा सूद वाले कर्जे देकर, और अत्यधिक लाभ लेने वाले लागत उपभोक्ता माल बेचकर, तथा कृषि उत्पाद को कम मूल्य पर खरीद कर, पहले से उठाए गये घाटे को, (कम सूद वाले कर्जे व सस्ती कृषि लागत, उपभोक्ता सामान को) कई गुना लाभ पर सालों साल वसूल किया जा सकता है, और आज यही हो रहा है।
कृपया ध्यान दें! हरित क्रांति से किसानों की महंगाई, बेकारी, गरीबी, व टूटन आदि समस्याएं बढ़ती गई, लेकिन यह प्रचार करके डंकल प्रस्ताव लागू किया गया था कि किसान अब नई खेती से लाभ ले रहा है, अतः लागत सामान—- बीज, खाद, कीटनाशक आदि मुहैया कराने वाली साम्राज्यवादी कंपनियों को भी उस लाभ में हिस्सा अर्थात लाभांश चाहिए, “डंकल प्रस्ताव” के तहत “बौद्धिक संपत्ति संबंधी व्यापार के अधिकार के नियम” के तहत खादों, बीजो इत्यादि को पेटेंट कानून के तहत लाकर उसे महंगा बेचकर भारी लाभ कमाया जाने लगा, इसके लिए पाठक कृपया जी. डी.सिंह (गुरदर्शन सिंह) द्वारा लिखित डंकल प्रस्ताव नामक बुक पढ़ सकते हैं।
हरित क्रांति द्वारा भारतीय कृषि का (राष्ट्रीय व) अंतरराष्ट्रीयकरण जो हुआ था उसे ही सुनिश्चित नियमबद्ध करने के लिए डंकल प्रस्ताव लाया गया था, फलत: टूटते किसानों पर डंकल प्रस्ताव (नई आर्थिक नीति) लागू करने के बाद सरकारी गोदामों, ब्लॉकों, सोसायटीयों से सस्ती व उत्तम किस्म के बीजों रासायनिक दवाओं की आपूर्ति व सरकारी सिंचाई, उत्तरोत्तर कम कर दी गई, बाजार से महंगे खाद बीज आदि खरीदना व निजी सिंचाई प्रबंध करना किसानों की जिम्मे में आ गया, लागत की बढ़ती महंगाई के कारण किसान कर्ज में फंस गया और कर्ज चुकता न कर पाने के कारण आत्महत्या करने लगा।
कृपया ध्यान दें, कि संकटग्रस्त होना व आत्महत्याएं करना यह सीमांत छोटे व मझोले किसानों की समस्याएं हैं, क्योंकि सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि या मौसमी बीमारियों समय पर सिंचाई ना हो पाने तथा खाद बीज दवाएं नकली होने से उत्पादन कम होने की, या उत्पादन का उन्हें उचित मूल्य नहीं मिलने पाने की समस्याएं इन्हीं की है ,इन्हें समर्थन मूल्य व अन्य सरकारी समाधान भी नहीं मिल पाता, लेकिन बड़ी खेतीयों के चंद धनी किसान लाभ प्राप्त कर लेता है, अत: वह जैसे पंजाब के आधुनिक बड़े किसानों जमीदार) हिंसक, विरोधी होने के बावजूद भी कृषि के अंतरराष्ट्रीयकरण वाले डंकल प्रस्ताव के समर्थन में आ गया था, कुल मतलब यह कि डंकल प्रस्ताव के बाद किसानों की सब्सिडी रियायतएं साम्राज्यवादियों के निर्देशानुसार काटी जाने लगी, अतः पहले की तरह किसानों को न तो सस्ते साधन मिलते हैं, नहीं ज्यादा सब्सिडी और ना ही कर्जे, व अन्य बकायों की माफिया।
पूंजीवादी प्रचार तंत्र कहता है कि किसानों के लिए दिए जाने वाले इन सारी रियासतों में राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था को नुकसान होगा। प्रश्न है – की पूंजीपतियों की छूटो, रियायतों व कर्जमाफी से क्या राष्ट्र की आर्थिक क्षति नहीं होती? बरहाल, डंकल प्रस्ताव के बाद अब वित्तीय पूंजी के तीसरे चरण अर्थात अब कब्बेदारी के रूप में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून बन गया है, इसे अब ठेका खेती के रूप में प्रचार किया जा रहा है, कि इससे किसान संकट मुक्त खुशहाल हो जाएंगे, लेकिन हकीकत यह है कि जिस तरह पहले अज्ञानतावस किसान हरित क्रांति में फंसा उसी तरह आप अज्ञानता वश संकट में किसान कांट्रैक्ट फार्मिंग में फंसता जा रहा है, जिस तरह उद्योग सेवा व्यापार में वित्तीय पूंजी यह कह कर घुसी कि हम विदेशी नहीं रह गए हैं अतः हमें भी भारती पूजीपतियों जैसा, व जितना अधिकार निजीकरण करके मिलना चाहिए, उसी तरह उनका कहना है कि खेती में लगने वाले खाद बीज दवाएं व कृषि यंत्र सब तो हमारा ही है, अतः हमें भी किसानी अधिकार मिलना चाहिए, किसानों से भी कहते हैं कि कृषि के सारे संसाधन पूंजी पैसे तो मेरे पास है, तेरे पास क्या है केवल आत्महत्या करने के सिवा, हां तेरे पास जमीन है उसे ही हमारे साथ साझा करके आओ खेती करें, फिर जो उत्पादन होगा उसमें से अपने रकबे के अनुसार तुम्हें यानि किसान को हिस्सा मिल जाएगा, अब आफत का मारा किसान सोचेगा कि यही ठीक है, यह तो उत्पादन सुनिश्चित और फिर रकवे के हिसाब से हिस्सा भी मिल जाएगा, लेकिन वह यह नहीं जानता कि पूंजीवादी कंपनी मक्कारी, व चालाकी से उनकी जमीन भी हड़प लेगी, कैसे? दो एक साल लाभ दिखाते हुए शेयर धारी किसानों को उनका लाभ दे देगी, लेकिन जब घाटा हो या नकली घटा दिखाकर कंपनियां किसानों से कहेंगे कि जब लाभ से लाभ लेते रहे हो तो अब घाटे में भी हिस्सेदारी करो, क्या किसान यह बोझ उठा पाएगा? नहीं, फिर उसकी जमीन हमेशा के लिए छिन जाएगी, इसमें खास बात यह है कि साम्राज्यवादी कंपनी व पूंजीवादी कम्पनी खेती के साथ साथ खेत पर भी मुफ्त में कब्जा जमा लेगी, यह है वित्तीय पूंजी का चरित्र—-
हरित क्रांति के तहत कृषि संसाधन देकर खेती में घुसना फिर डंकल प्रताव व (हरित क्रांति) के तहत किसानों द्वारा अपनी ही जमीन पर कठोर श्रम करके कंपनियों को लाभ दर लाभ और शुद देना, इससे किसानों का टूटन व आत्महत्या तक बढ़ती रही। खेती पर पूरी तरह काबिज व एकाधिकार करने के बाद अब खेत पर भी कब्जा करने हेतु कांट्रैक्ट फार्मिंग है मतलब यह कि वित्तीय पूंजी कृषि को भी अपने अधीन कर लेती है, वह न तो किसान का विकास करती है, और ना ही उसे स्वतंत्रता देती है।
प्रश्न है कि किसान क्या करें? बहुत सारे वामपंथी दल व एनजीओ किसानों की भलाई के लिए कर्ज माफी और कृषि उत्पादों का समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करते हैं, यह किसानवादी नहीं, पूंजीवादी मांगे हैं, लेकिन कृषि लागत सामग्री व उपभोक्ता सामग्री तथा शिक्षा चिकित्सा को सस्ता करने की मांगें पूंजीवादी होते हुए भी पूंजीवाद साम्राज्यवाद विरोधी मांगे है क्योंकि इन मांगों की पूर्ति हेतु किसानों को नई आर्थिक नीति व डंकल प्रस्ताव का विरोध करना पड़ेगा , हालांकि पुराने आर्थिक नीतियां भी पूंजीवादी थी उससे ही निकल कर नई आर्थिक नीति आई फिर भी सरकारीकरण की पुरानी नीतियों की बहाली की मांग करते हुए पूरी सूची वादी व्यवस्था का ही विरोध करना होगा, इसके लिए (जैसाकि लेनिनवाद) कहता है कि किसानों को मजदूरों के नेतृत्व में उनके साथ मिलकर नई जनवादी या समाजवादी क्रांति करके नई व्यवस्था लानी होगी, तभी किसानों सहित सभी मेहनतकशों की मुक्ति होगी। लेकिन जब तक जाति धर्म की पुजवादी राजनीति से वह उसकी उपभोक्ता सांस्कृतिक से लड़ते हुए किसान मजदूर एकजुट नहीं होंगे, एकजुट होकर वर्ग संघर्ष नहीं करेंगे, तब तक उनकी समस्याओं का हल और उनकी मुक्ति संभव नहीं है।
इसके लिए मजदूरों किसानों को अपनी मुक्ति के सिद्धांत मार्क्सवाद लेनिनवाद को अपनाना होगा, और साथ ही इन सिद्धांतों में पूंजीवाद साम्राज्यवाद द्वारा किए गए सुधार संशोधन का भी विरोध करना होगा, अर्थात मुक्ति हेतु पूंजीवाद साम्राज्यवाद से क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष एक तरफ और दूसरी ओर भीतरघाती सुधारवादियों संशोधन वादियों से संघर्ष करना अनिवार्य है।
*जनार्दन सिंह बलिया





