करनूल से दीपक असीम
ऐसे शहर तो आपने बहुत देखे होंगे जिनमें देखने समझने लायक बहुत कुछ होता है मगर यहां कुछ भी देखने समझने लायक नहीं। अगर इंदौर को थोड़ा गंदा कर दिया जाए तो करनूल बन जाएगा या करनूल को साफ करके उसमें जाम लगा दिया जाए तो करनूल ही इंदौर बन जाएगा। एक दो मंदिर हर शहर में होते हैं। और एक किला भी होता है, जिसमें मुगलों से हारने या अंग्रेजों के आगे समर्पण करने से पहले पुराना राजा रहा करता था। एक म्यूजियम, सो भी हुआ तो। एक वाटर पार्क, एक दो नए बने मॉल, एकाध कोई पास से गुजरती नदी।
हैदराबाद से बल्लारी जाते हुए रास्ते में रात हो गई और हम यहीं रुक गए। वैसे भी बल्लारी में राहुल गांधी हमारा इंतजार नहीं कर रहे थे। बल्लारी आधी रात को पहुंचे या रात को 8:00 बजे करनूल रुक जाओ कि फर्क पैंदा ए? लोकल बस में हम बल्लारी जा रहे हैं। ये बस हाईवे से ना जाते हुए गांवों से जा रही है। हम आंध्र प्रदेश को एंजॉय कर रहे हैं।
कोई आसान चीज भी अगर मुश्किल से मिले तो उसका महत्व बढ़ जाता है। जैसे कहीं जाना है और आपको यह नहीं पता कि कौन से नंबर की बस जा रही है। हिंदी और अंग्रेजी में कहीं कुछ लिखा हो तो आप पढ़ लेते हैं। हिंदी अंग्रेजी लोग जानते हों तो आप पूछ लेते है। दक्षिण भारत के अंदरूनी इलाकों का हाल यही है कि यहां सब कुछ स्थानीय भाषा में लिखा होता है। बस स्टैंड पर भी सब नाम तेलुगु में हैं। कई जगह तो नंबर भी। ऐसे में जहां जाना है, वहां की बस का पता लगा लेने पर भी बड़ी कामयाबी का एहसास होता।
हफीज जालंधरी का शेर है हफीज अपनी बोली मोहब्बत की बोली ना हिंदी ना उर्दू ना हिंदोस्तानी। करनूल में हमने इस शेर को थोड़ा बदला है _ हफीज हम तो लिखेंगे कन्नड़ या तेलुगू ना हिंदी ना उर्दू ना हिंदोस्तानी…।





