सुधा सिंह
नसों में उसकी, वही सत्व बहता है. और सत्य भी, इसलिए सत्य का आग्रह भीतर हिलोरें मारता है।
नमक सत्याग्रह जिसे आप कहते हैं, वो बेजा टैक्स के खिलाफ मार्च था। सदियों से नमक जो आम हिंदुस्तानी, समुद्री जल को सुखाकर बना लेता था, सरकारी संपत्ति हो गया।
तो हुआ ये कि रायसीना में नई राजधानी बन रही थी। साहब बहादुर की सरकार को अपने खर्चों के लिए और ज्यादा पैसे की जरूरत थी। टैक्स लगाना था, तो किस पर लगायें।
आज का दौर होता तो दूध- घी- छाछ-आटे-तेल पर जीएसटी लगाते। लेकिन 1930 के दशक में नमक ही था, जो गरीब से अमीर तक, सबकी रसोई का हिस्सा था। तो नमक बनाना बैन हो गया।
सरकार बनाएगी, सरकारी ठेकेदार बनाएंगे। मनमाफिक दाम पर बेचेंगे। सरकार, ठेकेदार औऱ पब्लिक दोनों से जमकर टैक्स वसूलेगी।
गरीब की थाली पर डकैती, गांधी को नागवार गुजरी। कहाँ पूर्ण स्वराज पर आंख टिकी थी, और कहाँ तो देश के पेट पर ही डाका डाला जा रहा था।
तो दांडी, सिविल नाफरमानी का पहला तीर्थ बना।
असल मे पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव के बाद जब रावी तट पर तिरंगा फहरा, तो इसके बाद सरकार को सरकार ही न मानने का विचार ठहरा। सरकार, जो तानाशाह है, क्रूर दमन से सत्ता में है, उसके दमन का इम्तहान लिया जाएगा। उसके हर हुक्म को तोड़ा जाएगा।
कांग्रेस कार्यसमिति ने ने गांधी को जिम्मा दिया था, सबसे पहले हुक्मउदूली करने का। गांधी गिरफ्तार होते, तो लाखों लाख जनता भी साथ जेल जाती। इस नाफरमानी के लिये गांधी ने देश के नमक को चुना। नमक कानून को चुना।
तय हुआ कि गांधी सहित 78 लोग मार्च करेंगे। इन सबको गांधी ने खुद चुना था। हर जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र, भाषा के प्रतिनिधि थे। ये सब दांडी जाएंगे।
पाँव पाँव जाएंगे, गांव गांव होकर जाएंगे। साबरमती से दांडी का तट, 385 किलोमीटर .. सत्तर साल के वृद्ध की चाल देखते बनती थी।
उस पर मुग्ध हिंदुस्तान भी, उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। सागर तट पर मुट्ठी भर नमकीन रेत उठाकर ने रेजीम को सीधी चुनौती दे दी। पीछे पीछे सारे हिंदुस्तान ने भी यही किया। अंग्रेजी सत्ता की चूलें हिल गयी।
जलियावाला में गोली बरसाने वालो को, झुककर बातचीत की गोलमेज पर बैठना पड़ा। समझौते औऱ पैक्ट हुए। एक नया, भारत शासन अधिनियम आया। भारतीयों को प्रांतीय सरकारें सौप दी गयी। आधा स्वराज्य आ गया।
उस गांधी की यात्रा समुद्र तट से समाप्त हुई थी। इस गांधी की यात्रा समुद्र तट से शुरू हुई है। मानो यह उस यात्रा का अगला चरण है।
और में ऐसा है भी। मोहन गोरे टैक्सखोरो के खिलाफ चले थे, राहुल काले टैक्सखोरो के खिलाफ चल रहे हैं। लेकिन देश जरा उलझन में है। वह गांधी के कदमो की दिशा देखना चाहता है,उसे गांधी के जूते दिखाए जा रहे हैं।
वह राहुल किरदार को परखना चाहता है, लेकिन कुर्ते की कीमत की ओर भटका दिया जाता है। अंग्रेजो के बहकावे को समझना आसान था, अपनों के बहकावे से निकलना जरा कठिन होता है। इसलिए राहुल की चिंता होती है।
उनकी यात्रा बेहद मुश्किल है, लम्बी है, बेहद खतरनाक भी। क्योकि उनकी राह में, उनके साथ मे वे तो होंगे ही जिन्होंने देश का नमक चखा है। छुपकर उनके बीच वे आदमख़ोर भी होंगे… जिन्होंने देश का खून चखा है.





