शशिकांत गुप्ते
गहन अध्ययन के बाद पता चला।राजनीति का अहम मुद्दा कूड़े के ढेर। कूड़े के ढेर यह वाक्य बहुवचन में है।
एक कहावत है बारह वर्ष में तो घूरे के दिन भी बदलतें हैं। अभी तो आठ वर्ष ही हुए हैं। “आप” को भी सात वर्ष ही हुएं हैं।
उक्त कहावत से यह स्पष्ट नहीं होता है कि घूरे के दिन बारह वर्ष पूर्ण होने पर बदलतें हैं,या बाहर वर्ष में धीरे धीरे बदलतें हैं।
यह असमंजस है। मतलब Confusion है। Confusion का हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है उलझन। सच में यह मानासिक उलझन ही है।
अहम मुद्दा ही उलझन भरा है।
जिनके हाथों में झाड़ू है वे कूड़े के ढेर पर खड़े होकर दूसरों को दोष दे रहें हैं। दूसरें जो हैं वे भी कम नहीं हैं सारा दोष झाड़ू पर ही ढोल रहें हैं।
वैसे दोनों ही कमोबेश दोषारोपण करने में माहिर हैं। “रास्ते अलग अलग दोनों के उद्देश्य एक है। पाना दोनों को कुर्सी तो एक है”
कूड़े के ढेर हो या समस्याओं का अंबार हम जीतेंगे बार बार।
हम दोनों में कोई भी जीते, कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम तीसरे को जीतने नहीं देंगे यह बात अंदरखाने तय है।
दोनों ही सबल है। वादें करने में प्रबल हैं। वादे निभाने में निर्बल है ऐसा विरोधियों का आरोप है?
एक तो दावे के साथ यह कहतें हैं।
हम फिर जीतेंगे। हमकों हरा सके किसी विरोधी में दम नहीं,सारे महकमें हमारे पास, दौलत भी कम नहीं
“आप” तो आप हैं। आप का भी प्राथमिक कर्म,धर्म से जुड़ा है।
वो मंदिर बनातें हैं। हजारों करोड़ रूपयें खर्च कर मंदिरों को दिव्यभव्य स्वरूप प्रदान करतें हैं
आप तो रुपयों पर ही भगवान के दर्शन करवाने की अतिधार्मिक योजना बनाने के लिए बड़े भाई से निवेदन करतें हैं।
बड़े भाई के द्वारा जैसे रामभगवान का मंदिर निर्मित होगा, छोटा भाई इंद्रप्रस्थ के वासियों को मुफ्त में रामजी के मंदिर के दर्शन करवाएगा।
यह वाद है। मुफ्त की नीति बनाने तो “आप” जैसा दूसरा कोई है ही नहीं।
दोनों में एक समानता और भी है। दोनों ही आजीवन मुखिया बनने के लिए कृतसंकल्पित है।
अब दोनों ही उस जगह मशक्कत कर रहें हैं। जो जगह विकास के मॉडल के रूप में प्रचारित की गई।
प्रचारित करना और वास्तव में होने में बहुत फर्क है।
बारह वर्ष में घूरे के भी दिन बदलतें हैं। इसतरह बारह वर्ष की अवधि पर प्रश्न उपस्थित करती एक कहावत यह भी है।
श्वान की पूछ ………,?
स्वच्छ भारत की घोषणा को अभी आठ और सात वर्ष ही हुएं हैं।
गंगानदी भी स्वच्छ होगी और यमुना भी प्रदूषण मुक्त होगी।
फिलहालमुक्त मुफ्त और मुक्त इन राजनैतिक शब्दों का लुफ्फ उठाइए।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





