शशिकांत गुप्ते
अपना देश महान है।
गीतकार राजेंद्रकृष्ण जी रचित गीत की निम्न पंक्तियां सुनने पर गर्व का अनुभव होता है।
जहाँ डाल-डाल पर
सोने की चिड़ियां करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का
पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा
इसी तरह गीतकार इंदिवरजी रचित गीत की पंक्तियां सुनकर मन भावविभोर हो जाता है।
काले गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है।
है प्रीत जहां की रीत सदा,मै गीत वहां के गाता हूं
हर एक भारतीय की पहचान उक्त पंक्तियों में निहित भावार्थ अनुरूप होनी चाहिए।
दुर्भाग्य से भारतीय की पहचान अपने देश में भारतीय होने के पूर्व धर्म,समाज,जाति,उपजाति,या अगड़े पिछड़े से होती है।
भारत का नागरिक सिर्फ विदेश में भारतीय होता है।
इनदिनों अपने ही देश में कुछ लोगों की पहचान बहुत अगल अंदाज में हो रही है।
रसूखदार लोगों की पहचान, उनकी योग्यता, गुणवत्ता,से नहीं होती है,बल्कि गले में लटकने वाले दुपट्टे से होती है।
दुपट्टे,एक रंगी, दू रंगी और तीन रंगी क्रमशः ऐसे होते हैं।
इन दिनों एक विशेष रंग के दुपट्टे का समाज में बहुत मान,सम्मान है।
इस दुपट्टे की सबसे बड़ी विशेषता है, यह दुपट्टा,पहनने पूर्व किए गए सभी संचित पाप कर्मों को दुपट्टा धारण करने के बाद पुण्य में बदल देता है। नौ सौ चूहे खाने वाली बिल्ली…. वाली कहावत को यह दुपट्टा चरितार्थ करते हुए ना सिर्फ तीर्थ यात्रा ही करवाता है,बल्कि पूर्व किए गए अपराधों को भी धो डालता है।
इस दुपट्टे को कुछ शरारती तत्व वाशिंग मशीन कहते हैं।?
ऐसा कह कर दुपट्टे की आलोचना नहीं करनी चाहिए,वर्ना दुपट्टे की आज्ञाकारी सारी जांच एंजेसियां सक्रिय हो कर जांच करना शुरू कर देगी*
चाहे लाख करों तुम घोटाले
दुराचार करों हजार
एक बार दुपट्टा गले लटका लिया तो सारे कानून बेकार
अंत में इतना ही कहना पर्याप्त है।
दुपट्टे के चमत्कार को नमस्कार
शशिकांत गुप्ते इंदौर





