ये सरकार बसों के आगे बेबस क्यो है? मुसाफिरों को गंतव्य तक ले जाने वाली ये बसें टनों माल लादकर ट्रक क्यो बनी हुई है?? छतों पर 5 फ़ीट तक लदा हुआ माल क्या किसी जिम्मेदार को नजर नही आता?? 50 यात्री क्षमता वाली बसों में 70- 80 तक ठुंसी हुई सवारियां चौराहे चोराहे पर रसीद कट्टे लेकर खड़े ट्रैफिक पुलिस वालों को नजर नही आती??सीट की जगह बोनट पर बेठे मुसाफिर किसी को नजर आते है? क्या जिम्मेदारों की जवाबदेही परमिट फिटनेस ओर टेक्स वसूलने के बाद खत्म हो जाती है? क्यो इन बसों पर कोई निगरानी तंत्र अब तक विकसित नही हुआ? 15 साल से ज्यादा हुए रोडवेज पर तालाबंदी के लेकिन अब तक सरकारी बसों के फिर से संचालन की कोई पहल क्यो नही हुई? शहरों में एक सिस्टम बनाकर उसके अधीन सिटी बसों का संचालन हो सकता है तो सरकारी बसों के जरिये फिर से सफर की शुरुआत क्यो नही की जा रही है? जिन रूट्स पर घाटा बताकर सरकारी बसों को बन्द कर दिया, उन्ही मार्गो पर प्राइवेट बसे कैसे दौड़ रही है और कमाई कर रही है? यही नही ऑपरेटरों के बेड़े में एक के बाद एक कैसे नई बसे जुड़ रहीं है?? जो तंत्र चमचमाती लक्जरी वॉल्वो बसों के संचालन के लिए खड़ा किया गया वो कुछ चुनिदा मार्गो से आगे क्यो नही बढ़ता?? कोन रोक रहा है फिर से रोडवेज जैसा तंत्र खड़ा कर सरकारी बसों के संचालन से?? सरकार और नोकरशाह इन बसों के आगे क्यो बेबस है…???
इन सब सवालों का एक ही जवाब है-नेता। बसों की सब बेबसी के पीछे नेताओ के गठजोड़ से बना परिवहन माफिया है। इन्दोर से उज्जैन, भोपाल, खंडवा, सेंधवा, नेमावर, रतलाम, झाबुआ मार्ग में दौड़ रही बसों में अधिकांश नेताओ की है। मुसाफिरों के इस बेबस सफर के लिए कांग्रेस भाजपा दोनो दल के नेता जिम्मेदार है। सबने अपने अपने रुट बाट लिये। नेताओ के इस गठजोड़ से हटकर कोई भी शख्स बसों का संचालन नही कर सकता। उसे गठजोड़ से जुड़कर ही बसों का संचालन करना है। हैरत की बात है कि इंडोर से पड़ोसी प्रान्त के लिए नियमित सेकड़ो की संख्या में बसे चल रही है लेकिन सरकारी बस एक भी नही? क्या सरकार का काम केवल उन्हीं मुसाफिरों की चिंता।करना है जो मोटा पैसा देकर एसी बसों का सफर करते है? इनके लिए तो मेडिकल कॉलेज जैसे मध्य शहर में न केवल स्टैंड है, बल्कि पीने के पानी से लेकर पेपर तक की व्यवस्था है। लेकिन आम मुसाफिरों को नवलखा तीन इमली पालदा नाका क्यो फेंक दिया गया?? जहा रात के वक्त यात्रियों के लिए डरावना हो जाता है। जहां से शहर में आने के 100-200 रुपये खर्च हो जाते है। सामान्य बसों में यात्री कैसे सफर कर रहे है इसकी जांच का कोई निगरानी तंत्र भी नही। कोई ये जांचने वाला भी नही की इन बसों में ज्यादा यात्री ढोने के लिए सीटो के बीच फासला इतना कम क्यो की घुटने सामने सीट से टकराते रहते है? ड्राइवर में 12-15 सवारी बैठाने का ढांचा कैसे फिट हो गया??आरटीओ ट्रैफिक पुलिस और थानों पर तैनात अमले की नजरें केवल दो पहिया वाहनों की जांच तक ही सीमित है लेकिन ट्रांसपोर्टर के रूप में सवारी बसों में माल ढुलाई नजर नही आती। कब तक रिश्वत के दम पर इंदौर ओर प्रदेश में ये अराजक सफर चलता रहेगा? कब तक नेताओ की बसों के आगे सरकारें ओर अफसर बेबस रहेंगे?? कब तक मुसाफिर जान देते रहेंगे? ये सवाल सरकार अफसरों के साथ साथ नेताओ के उस हुजूम से भी है जो दुर्घटना के बाद एमवाय में घायलों की कथित मिजाजपुर्सी के लिए जुटा था। जवाब देने की हिम्मत है किसी।मे…???





