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परिवारवाद को लेकर हिंद रक्षक की पोस्ट को लेकर बवाल,बाद में पोस्ट डिलिट कर दी गई

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परिवारवाद को लेकर हिंद रक्षक नामक संगठन के सोशल मीडिया एकाउंट से हुई पोस्ट ने इंदौर की सियासत गर्मा दी है। हिंद रक्षक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक एकलव्यसिंह गौड़ हैं जो कि पूर्व मंत्री लक्ष्मणसिंह गौड़ और वर्तमान विधायक मालिनी गौड़ के बेटे हैं। हालांकि, गौड़ ने कहा है कि जिस सोशल मीडिया हैंडल से यह पोस्ट हुई है, वह हमारा अधिकृत पेज नहीं है। बाद में यह पोस्ट डिलिट कर दी गई। वायरल हो रहे मैसेज को लेकर पूरे मामले की पड़ताल की तो पता चला कि अंदरखाने इस पोस्ट को लेकर भाजपा में जमकर उठापटक हो रही है।

हिंद रक्षक संगठन के राष्ट्रीय संयोजक एकलव्य सिंह गौड़ का कहना है कि जिस फेसबुक पेज से यह पोस्ट की गई है। वह फर्जी पेज है इस पेज का हिंद रक्षक से कोई लेना देना नहीं है। हिंद रक्षक का ऑफिशियल पेज दूसरा है। शरारती तत्वों ने यह पेज बनाकर पोस्ट की है। इस पोस्ट पर हंगामा होने के कुछ देर बाद ही इसे हटा दिया गया। चार नंबर का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि यहां से मालिनी गौड़ विधायक हैं और बेटे एकलव्य भी अब दावेदार हैं।

पोस्ट में पिता-पुत्र के नाम ही गलत लिखे

हिंद रक्षक के जिस पेज से परिवारवाद पर सवाल उठाया गया है। उन सवालों में पिता व पुत्र के नाम ही गलत लिखे गए हैं। सावन सोनकर के पिता स्वर्गीय प्रकाश सोनकर लिखा गया है। इसी तरह गोलू शुक्ला पिता स्वर्गीय विष्णुप्रसाद शुक्ला लिखा गया है। बता दें कि दोनों ही जगह पिता लिखा गया है जो कि गलत है। दोनों ही पिता नहीं, चाचा हैं।

यदि अधिकृत एकाउंट नहीं तो यह उठ रहे सवाल-

1. यदि अधिकृत पेज नहीं है तो हिंद रक्षक के समर्थन में लगातार उस पर जो पोस्ट हुए, वह किसके इशारे पर किए गए।

2. विवाद सामने आने के बाद अब जिस पेज को हिंद रक्षक संगठन ने अपना अधिकृत पेज बताया है, उस पेज पर 2017 के बाद से कोई पोस्ट नहीं है।

जिस एकाउंट से पोस्ट की गई थी, उसके कवर पेज पर लक्ष्मणसिंह गौड़ का फोटो लगा है।

जिस एकाउंट से पोस्ट की गई थी, उसके कवर पेज पर लक्ष्मणसिंह गौड़ का फोटो लगा है।

अब जानिए इंदौर की राजनीति में पिता-पुत्रों और रिश्तेदारों का कनेक्शन

इंदौर में परिवारवाद की शुरुआत 1998 में हुई

राजनीति विशेषज्ञों की मानें तो इंदौर में 1998 में परिवारवाद की शुरुआत हुई थी। 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने दिग्गज नेता व पूर्व मंत्री स्व. महेश जोशी के भतीजे अश्विन जोशी और पूर्व मंत्री रामेश्वर पटेल के बेटे सत्यनारायण पटेल को टिकट देकर परिवारवाद की शुरुआत की थी। इसी तरह बीजेपी ने 2003 में परिवारवाद की शुरुआत की थी। 2003 के चुनाव में बीजेपी ने पूर्व मंत्री निर्भय सिंह पटेल के बेटे मनोज पटेल और बीजेपी के कद्दावर नेता विष्णु प्रसाद शुक्ला के बेटे राजेंद्र शुक्ला को टिकट देकर परिवारवाद की शुरुआत की थी।

देपालपुर में पटेल परिवार से बाहर ही नहीं आ पाई बीजेपी और कांग्रेस

देपालपुर इंदौर की सबसे पुरानी विधानसभा सीट है। यहां पर 43 साल से पटेल पिता-पुत्र की जोड़ी ही चुनाव लड़ रही है और विधायक बन रही है। बीजेपी से निर्भय सिंह पटेल और उनके पुत्र मनोज पटेल की जोड़ी, तो कांग्रेस से रामेश्वर पटेल और पुत्र सत्यनारायण पटेल के साथ कांग्रेस से ही जगदीश पटेल और उनके पुत्र व वर्तमान विधायक विशाल पटेल की जोड़ी चुनाव लड़ रही है।

देपालपुर से 1980 में बीजेपी के निर्भय सिंह पटेल विधायक बने। फिर 1990 में कांग्रेस से रामेश्वर पटेल चुनाव जीते। 1990 और 1993 में फिर निर्भय सिंह जीते। 1998 में जगदीश पटेल चुनाव जीते। साल 2003 में यहां से बीजेपी के पूर्व मंत्री निर्भय सिंह पटेल के बेटे मनोज पटेल तो कांग्रेस से पूर्व मंत्री रामेश्वर पटेल के बेटे सत्यनारायण पटेल चुनाव लड़े।

साल 2008 में सत्यनारायण चुनाव जीते तो फिर 2013 में मनोज जीते। वहीं साल 2018 में कांग्रेस के पूर्व नेता व विधायक जगदीश पटेल के बेटे विशाल मैदान में आते हैं और मनोज को हराकर चुनाव जीतते हैं। यानी पिछले 43 साल से इस सीट पर बीजेपी से निर्भय सिंह पटेल और कांग्रेस से रामेश्वर पटेल व जगदीश पटेल का कब्जा है। बता दें कि सत्यनारायण पटेल को पहली बार 1998 में पांच नंबर विधानसभा से टिकट मिला था और वह चुनाव जीते थे।

33 साल से इंदौर में विजयवर्गीय परिवार के पास रहती है एक सीट

इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय व उनके बेटे के पास पिछले 33 साल से इंदौर की एक सीट रहती ही है। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय साल 1990 में पहली बार विधानसभा 4 से विधायक बने, फिर 1993, 1998, 2003 में विधानसभा 2 से चुनाव जीते। इसके बाद वह 2008 और 2013 में महू से चुनाव जीते। साल 2018 में बेटे आकाश के लिए सीट खाली की और आकाश विधानसभा 3 से विधायक बनकर भोपाल पहुंचे। इस हिसाब से देखें तो पिछले 33 साल से यानी 1990 से इंदौर की एक सीट पर विजयवर्गीय परिवार का कब्जा रहता ही है। आकाश विजयवर्गीय इस चुनाव में भी इंदौर 3 या इंदौर 2 से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

51 साल से इंदौर 3 में जोशी परिवार को कब्जा

इंदौर 3 विधानसभा पर 51 साल से जोशी परिवार का कब्जा है। पूर्व मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता महेश जोशी 1972 में विधानसभा 1 से विधायक बने, 1977 में हार गए। लेकिन 1980 में विधानसभा 3 से जीते, 1985 में भी जीते, लेकिन 1990 में हार गए। साल 1998 में उनके भतीजे अश्विन जोशी मैदान में आ गए और चुनाव जीते।

वह 2003 और 2008 में भी जीते, साल 2013 में उषा ठाकुर से तो फिर 2018 में आकाश विजयवर्गीय से हार गए। अब अश्विन जोशी के भतीजे और महेश जोशी के बेटे पिंटू जोशी साल 2023 में होने वाले चुनाव के लिए टिकट की दावेदारी कर रहे हैं।

शुक्ला परिवार का जनसंघ के समय से बीजेपी पर कब्जा, अब बेटे का कांग्रेस से विधायक

स्व. विष्णुप्रसाद शुक्ला (बड़े भैया) जनसंघ के नेता रहे। साल 1985 और 1990 में चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। इसके बाद 2003 में उनके एक बेटे राजेंद्र शुक्ला को बीजेपी ने इंदौर 3 से टिकट दिया लेकिन हार गए। वहीं शुक्ला के दूसरे बेटे संजय शुक्ला को कांग्रेस ने साल 2008 में टिकट दिया लेकिन हार गए। संजय को साल 2018 में फिर टिकट मिला और वह चुनाव जीत गए।

इधर, विष्णु प्रसाद शुक्ला के भतीजे गोलू शुक्ला को बीजेपी में समय समय पर अच्छे पद मिलते रहे हैं। पहले उन्हें युवा मोर्चा नगर अध्यक्ष तो अब आईडीए में उपाध्यक्ष का पद मिला है। गोलू शुक्ला को बीजेपी पार्षद का चुनाव भी लड़ा चुकी है। जिसमें उनकी हार हुई थी।

गौड़ परिवार का 30 साल से इंदौर 4 पर कब्जा

30 साल से इंदौर की 4 नंबर विधानसभा पर गौड़ परिवार का कब्जा है। लक्ष्मण सिंह गौड़ पहली बार 1993 में विधानसभा 4 से विधायक बने और फिर 1998, 2003 में चुनाव जीते। इसके बाद उनकी पत्नी 2008, 2013 और 2018 से लगातार चुनाव जीत रही है, वह महापौर भी रह चुकी हैं। 30 साल से इंदौर 4 पर विधायक बन रहे गौड़ परिवार से अब मालिनी गौड़ के बेटे एकलव्य को टिकट दिलाने की कवायद चल रही है।

महू में पाटीदार परिवार का कब्जा

इंदौर की राजनीति में महू के पाटीदार परिवार का भी जिक्र जरूरी है। भेरूरलाल पाटीदार 1980 में पहली बार चुनाव लड़े, 1985 में पहली बार विधायक बने और फिर 1990 और 1993 में भी चुनाव जीते, लेकिन 1998 और 2003 में अंतर सिंह दरबार कांग्रेस से चुनाव हार गए। इसके बाद साल 2008 में यह सीट उनकी बेटी कविता पाटीदार की जगह कैलाश विजयवर्गीय के पास चली गई। बदले में कविता जिला पंचायत अध्यक्ष हो गई और हाल ही में उन्हें पार्टी ने राज्यसभा सांसद बना दिया। ​​​​​​

सांवेर में 38 साल से चुनाव लड़ रहे सिलावट

सांवेर विधानसभा में तुलसी सिलावट 38 साल से चुनाव लड़ रहे हैं। वह इकलौते व्यक्ति है जो सांवेर से 38 साल से चुनाव लड़ रहे हैं। साल 2018 तक वह कांग्रेस से चुनाव लड़ते रहे, फिर बीजेपी में आ गए और साल 2020 के उप-चुनाव में बीजेपी से इसी सीट से चुनाव लड़े और जीते और अब फिर 2023 के लिए ताल ठोक रहे हैं।

साथ ही अपने बेटे को भी उन्होंने अपनी विधानसभा में सक्रिय कर दिया है। वहीं इस सीट पर सोनकर परिवार का भी कब्जा रहा है। इस सीट पर दो बार से बीजेपी से चुनाव लड़ रहे राजेश सोनकर इस बार सोनकच्छ से चुनाव लड़ेंगे।

Ramswaroop Mantri

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