वाराणसी
काशी में शनिवार को महाश्मशान की होली खेली गई। मणिकर्णिका घाट पर कोई चिताओं की राख से होली खेला तो कोई भस्म से नहाया। पूरा माहौल भक्तिमय रहा। होली 100 डमरुओं की निनाद के साथ शुरू हुई। होली खेलने के लिए दुनियाभर से 4 से 5 लाख श्रद्धालु मणिकर्णिका घाट पहुंचे। इस दौरान शिवभक्त डमरू बजाकर खूब थिरके। कई श्रद्धालु भगवान शंकर और पार्वती के रूप में नजर आए और शिव के भजनों पर नाचे। ये होली मणिकर्णिका घाट पर शाम 6 बजे तक खेली गई।
शनिवार को कई सौ साल पुरानी चिता भस्म की होली की परम्परा को निभाने काशीवासियों का हुजूम महाश्मशान मर्णिकर्णिका घाट पर उमड़ पड़ा । धधकती चिताओं के बीच चिता भस्म की होली खेली। इस मौके पर यूपी सरकार की तरफ से सुरक्षा के कड़े प्रबंध किये गए। एक तरफ चिताएं धधकती रहीं तो दूसरी ओर बुझी चिताओं की भस्म से जमकर साधु-संत और भक्त होली खेलने में रमे रहे। ढोल, मजीरे और डमरुओं की थाप के बीच लोग जमकर झूमेंगे और हर-हर महादेव के उद्घोष से महाश्मशान गूंजता रहा।
शिव के गण यक्ष, गंधर्व, किन्नर, औघड़ सब महाश्मशान पर चिताओं के भस्म की होली खेलने पहुंचे। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के पास स्थित इस महाश्मशान पर इस ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं वाली विश्व की अनूठी होली को कैमरों के कैद करने की होड़ मच गई। शिव-पार्वती के स्वरूप के साथ पहुंचे भोलेनाथ के गणों ने चिताओं की भस्म से होली खेलनी शुरू कर दिया।
संगीत की धुनों पर थिरकते अड़भंगी के काशी के लोग चिता भस्म को शरीर पर लपेटे जा रहे थे। अद्भुत और अलौकिक होली। आध्यात्म की गहराईयों का अहसास कराती यह होली दूर दराज के शवयात्रा में आये लोगों को अजीब भी लग रही थी। आश्चर्य हो रहा था कि जहां लाशों के ढेर लगे हों, अपनों के खोने के गम में डूबे परिजन उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ऐसे में हंसना और नाचना कितना मुश्किल है और यहां तो उन्हीं चिताओं की भस्म लपेटकर लोग होली मना रहे हैं।
एक ओर मौत का मातम और दूसरी ओर होली की मस्ती। सबकुछ एक ही जगह और एक साथ। कोई भूत बनकर पहुंचा है तो कोई औघड़। किन्नर समाज भी नृत्य में मगन है। काशी के साधु-संतों भी इस दिव्य होली में शामिल हुए। संगीत की धुनों पर काशीवासी नृत्य कर रहे थे, डमरूओं के निनाद गूंज रहे थे और रह-रहकर काशीपुराधिपति, महादानी भोलेनाथ की आध्यात्मिक होली पर पद्मविभूषण पंडित छन्नूलाल मिश्र के गाये गीत ह्यखेले मसाने में होली दिगम्बर, भूत पिशाच बटोरीह्य पर भक्त मस्ती के सागर में गोते लगा रहे थे। चिता भस्म की इस होली के आयोजक महाश्मशान नाथ मंदिर के अध्यक्ष चैनु प्रसाद गुप्ता, सतुआ बाबा आश्रम के महामंडलेश्वर संतोष दास, व्यवस्थापक गुलशन कपूर आदि व्यवस्था की कमान सम्भाले हुए थे।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव मां पार्वती का गौना कराने के बाद उन्हें काशी लेकर आए थे। तब उन्होंने अपने गणों के साथ रंग-गुलाल के साथ होली खेली थी, लेकिन वे श्मशान में बसने वाले भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष गन्धर्व, किन्नर और दूसरे जीव-जंतुओं के साथ ये खुशी नहीं मना पाए थे। तो रंगभरी एकादशी के ठीक एक दिन बाद उन्होंने श्मशान में बसने वाले भूत-पिशाचों के साथ होली खेली थी। तब से ही इस प्रथा की शुरूआत मानी जाती है।
100 डमरुओं की डम-डम के साथ शुरू हुई होली
मणिकर्णिका घाट पर शिवभक्त डमरू बजाते हुए नाचे। पूरा माहौल भक्तिमय रहा।
21 अर्चकों ने 45 मिनट की आरती
बाबा महाश्मसान समिति के अध्यक्ष और भस्म होली के आयोजक चैनू प्रसाद गुप्ता ने कहा कि सबसे पहले मणिकर्णिका घाट स्थित मसाननाथ मंदिर में गेरुवा लुंगी और गंजी धारण किए 21 अर्चकों ने बाबा मसाननाथ की आरती उतारी। 12 बजकर 5 मिनट पर आरती शुरू हुई, जो 45 मिनट तक चली।
मान्यता है कि गौना के बाद मां पार्वती को श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में विराजमान कर बाबा आज यहां पर होली मना रहे हैं। रंग भरी एकादशी पर गौना कराकर लौटते समय बाबा विश्वनाथ ने देवताओं के साथ खूब होली खेले थे, लेकिन भूत-प्रेत और औघड़ आदि के साथ होली नहीं खेल पाए थे। इसी वजह से श्रीकाशी विश्वनाथ ने महाश्मशान में भूतों की होली खेली।बाबा मसाननाथ की पूजा-अर्चना और आरती के बाद चिता-भस्म की पारंपरिक होली खेली गई।
अधजली चिताओं पर गंगाजल छिड़का गया
बाबा मसाननाथ पर 30 किलो फल-फूल, माला और 21 किलोग्राम प्रसाद चढ़ाया गया। इसके बाद से शिवभक्त दौड़ते हुए चिताओं के पास पहुंचे। इसके बाद चिताओं की राख को अपने शरीर पर लगाया। साथ ही अधजली चिताओं पर गंगाजल और थोड़ी-सी भस्म भी छिड़की गई। मान्यता है कि ऐसा करने से आत्मा को जाते-जाते शिव का प्रसाद मिलता है।

रंगभरी एकादशी पर माता गौरा का गौना कराने के दूसरे दिन शनिवार को मणिकर्णिका श्मशान पर होली देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। दोपहर 12 बजे मशानेश्वर महादेव की भोग आरती हुई। इसके बाद सैकड़ों भक्त डमरू, त्रिशूल के साथ चिताओं की भस्म उड़ाकर होली खेलने लगे।विज्ञापन

अनोखी होली खेलने के लिए मणिकर्णिका घाट पर शिव भक्तों का हुजूम इस कदर उमड़ा हुआ था कि पैर रखने की जगह भी नहीं बची थी। एक तरफ शव की कतार के बीच करुण कंद्रन तो दूसरी तरफ हर-हर महादेव का उद्घोष सुनाई दे रहा था।

मान्यता है कि गौना कराने के दूसरे दिन बाबा विश्वनाथ ने महाश्मशान पर अपने गणों के साथ होली खेली थी। उसी परंपरा का निर्वाह करते हैं काशी के लोग। इसमें घुलते अबीर-गुलाल ने राग विराग को एकाकार करते हुए जीवन दर्शन के रंग को चटख किया। विज्ञापन

ठंडी चिताओं की भस्म के साथ भभूत उड़ाई जाने लगी। साथ में कुछ युवक अबीर और गुलाल की भी बौछार घाटों से करने लगे। श्मशान पर अंतिम संस्कार के लिए शवों को लेकर गमगीन लोग भी घाट पर पहुंचते रहे। कहीं चिताएं लगती रहीं तो कहीं मुखाग्नि दी जाती रही।

बाबा के गणों के रूप में गंजी, गमछा लपेटे युवाओं की होली तमाम विदेशी पर्यटकों के लिए भी यादगार बनी। लोग उन क्षणों को कैमरे में कैद करने के लिए आसपास की छतों, मुंडेरों पर जमे रहे।

पूरी दुनिया में काशी ही एक ऐसा शहर है जहां महाश्मशान में भी फागुन मनाया जाता है। राग और विराग की नगरी काशी में मणिकर्णिका घाट पर महाश्मशान पर बाबा भोले के भक्तों ने चिता भस्म की होली खेली। काशी की यह रंगभरी एकादशी के बाद विधान युगों पुरानी मानी जाती है।

काशी एक ऐसा शहर है जहां मृत्यु का आलिंगन और मौत पर नृत्य होता है। ये एक ऐसा शहर है जहां श्मशान में भी फागुन मनाया जाता है। जी हां, जीवन के शाश्वत सत्य से परिचित कराती स्थली पर होली खेलने का दृश्य सिर्फ यहीं नजर आता है।
महाश्मशान होली की 3 बातें …
1. चिता-भस्म होली की परंपरा 350 साल से चल रही
बाबा महाश्मसान समिति के अध्यक्ष और भस्म होली के आयोजक चैनू प्रसाद गुप्ता ने बताया कि उनकी पीढ़ी 350 साल से चिता-भस्म की होली करा रही है। आज से करीब 16-17 साल पहले चिताओं के साथ सीधे होली नहीं खेली जाती थी। जब मंदिर में जगह नहीं बची, तो हम लोगों को बाहर निकलना पड़ा। यह हुल्लड़बाजी और बाबा का नटराजन नृत्य देख कर पूरी दुनिया चकित हो उठी। तब से हर साल रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन चिताओं पर होली खेलने जानी लगी।
2. नरमुंड वाले भूत-प्रेत के बारे में कोई जानकारी नहीं
चैनू प्रसाद ने ने आगे बताया कि साधु नरमुंड लगाकर तांडव करते हैं। वे कहां से आते हैं, क्या करते हैं और उनकी क्या मंशा है, यह मुझे नहीं पता। कुछ तो ओरिजिनल ही लगते हैं, तो वहीं कुछ कैरेक्टर प्ले करते नजर आते हैं। इन लोगों ने मसाने की सांस्कृतिक होली को भव्य बना दिया है। उन्होंने कहा कि आज तक इस परंपरा को चलाने में सरकार ने कोई मदद नहीं की है। न तो लाइव कवरेज की व्यवस्था, न कोई फंड और न ही कोई सुविधा मुहैया कराई जाती है। केवल गलियां बंद कर दी जाती हैं। हम लोग खुद से ही पैसा जुटाकर मसाने की होली कराते और खेलते हैं।
3. महाश्मशान होली पर गाना गाकर पंडित छन्नूलाल मिश्र फेमस हुए
चैनू प्रसाद ने बताया कि पद्मविभूषण पंडित छन्नू लाल मिश्र ने ‘खेले मसाने में होरी दिगंबर…’ गाना गया। यह गाने पहले यहीं पर गाए जाते थे। वो खुद तो मसानों पर नहीं दिखे, लेकिन यहां होने वाले गाने की उन्होंने रिकॉर्डिंग मंगाई और गाना रिकॉर्ड कर दुनिया भर में फेमस हो गए।
गोकुल के मुरलीधर घाट पर खेली गई छड़ीमार होली

फागुन की शुरुआत होते ही हुरियारों का उत्साह पूरे मथुरा-वृंदावन में देखने को मिलता है। मथुरा में विभिन्न तरह की होलियों में से एक छड़ीमार होली का आयोजन शनिवार को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर किया गया। जिसमें गोकुल की ग्वालिनों ने कान्हा स्वरूप हुरियारों पर प्रेम में पगी छड़ियां बरसाईं। इस दौरान होली के गीतों से वातावरण प्रेममय होता दिखाई दिया।
छड़ीमार होली के दौरान गोकुल की कुंज गलियों में चारों तरफ गुलाल उड़ने लगा। आसमान कई रंगों से मिलकर सतरंगी सा दिखने लगा। चारों तरफ फाग गाने वालों और रसियाओं की आवाज गूंजने लगी। होरी के रसिया लोग टेसू के फूलों से बने रंग में सराबोर होकर राधा और कान्हा के साथ होली का आंनद लेते रहे।
नंदभवन से निकाला गया ठाकुर जी का डोला
शनिवार सुबह दस बजे नंद भवन नंदकिला से ठाकुर जी का डोला निकाला गया। डोला नंद भवन से बीच चौक, नंद चौक होकर मुरलीधर घाट पर पहुंचा। मंदिर सेवायत पुजारी मथुरा दास ने ठाकुर जी की आरती उतारी। गोकुल वासियों ने गली गली में डोला का फूलों की बरसात कर स्वागत किया।
डोला में गोकुल वासी मस्त होकर नाचते रहे। गोकुल के लोगों ने ठाकुर जी पर पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। भक्त जयघोष करते हुए डोला के साथ निकले। गोकुल की ग्वालिन छड़ी लेकर डोला के साथ-साथ चल रही थी। हंसी ठिठोली करते हुए ग्वाल ग्वालिन गोकुल की गलियों से गुजरते हुए मुरलीधर घाट पर पहुंचे।

छड़ीमार होली खेलने के दौरान हुरियारनों पर छड़ी बरसातीं ग्वालिनें
मान्यता है कि पहली बार ठाकुरजी ने यहीं बंशी बजाई थी
जहां ठाकुर जी ने पहली बार बंशी बजाई। वहीं छड़ी मार होली खेली गई। गोकुल की ग्वालिनों ने छड़ी मार होली ग्वालों के साथ खेली। गोकुल की होली में शामिल होने देश विदेशों से श्रद्धालु गोकुल पहुंचे। श्रद्धालुओं ने “बिरज में होरी रे रसिया”, “गोकुल की गलियों में मच रहा शोर”, “होरी खेलन आयो नंदकिशोर”, “मेरे चुनरी लग गयो दाग री ऐसो चटक रंग डारो” समेत कई गानों पर डांस किया। देर शाम ठाकुर जी की आरती उतारी गई।
गोकुल की होली में पहुंचे डीएम एसएसपी
ठाकुर जी का डोला नंदभवन नंदकिला के लिए प्रस्थान हुआ। श्रद्धालुओं ने गुलाल उड़ाया, जिसके बाद हर तरफ सतरंगी छटा बिखरने लगी। कार्यक्रम में मंदिर के सेवायत पुजारी छनिया मथुरा दास, राममूर्ति, पप्पू, कुंदन लाल, चंद्रकांत, सौनू शर्मा आदि भक्त मौजूद रहे। गोकुल की छड़ी मार होली देखने को जिलाधिकारी पुलकित खरे एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शैलेश पांडेय होली में पहुंचे।

इस दौरान सभी राधा और श्रीकृष्ण की भक्ति में पूरी तरह से सराबोर दिखे।
गोकुल की महिलाएं दूध पीकर खेलती हैं होली
गोकुल में मंदिर की सेवायत पुजारी होली से पहले छड़ी मार होली खेलने के लिए न्यौता भेजते हैं मंदिर परिसर में सभी महिलाओं को मेवा युक्त दूध पिलाया जाता है दूध पी कर महिलाएं होली खेलती हैं यह परम्परा हर वर्ष निभाई जाती है।
होली खेलने के बाद हर हुरियारिन को मंदिर समिति के द्वारा फऊआ दिया जाता है। फऊआ में बर्तन एवं मिष्ठान वितरण होता है। मथुरा की हुरियारने अपनी छड़ी जब हुरियारों पर बरसाती हैं तो वहां का माहौल देखते बनता है।
भीड़ में सांड घुसने से मची भगदड़
मुरलीधर घाट पर प्रेम से होली खेली जा रही थी तभी भीड़ के बीच सांड घुस गया, जिससे श्रृद्धालुओं में भगदड़ मच गई सांड ने इतना हुड़दंग किया, जिससे काफी श्रृद्धालु घायल हो गए। पुलिस की समुचित व्यवस्था नहीं होने पर सांड भीड़ के अंदर घुसा था।
होली चबूतरा के सामने छड़ी मार, रंग, गुलाल की होली खेली जा रही थी। इस दौरान भीड़ का दबाव बढ़ने लगा और पंडाल का खम्मा गिर गया। जिससे श्रृद्धालु चोटिल जरूर हुए लेकिन कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ।

इस दौरान डीएम समेत तमाम प्रशासनिक अधिकारी सिविल ड्रेस में सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेते रहे।
क्या कहते हैं बाहर से आए श्रृद्धालु
दिल्ली से आए राजकुमार और शिप्रा ने बताया कि वो गोकुल पहली बार होली खेलने आएं हैं। श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली गोकुल एक अलौकिक स्थान है। यहां होली खेलने पर ऐसा लग रहा है मानो द्वापर युग जीवन्त हो गया। श्री कृष्ण की क्रीड़ा स्थली गोकुल में होली खेली गई जिसमें गुलाल टेसू के फूलों तैयार रंग का आनंद अलबेला था। गोकुल की होली में ऐसा लगता है मानो राधाकृष्ण स्वयं भक्तों के साथ होली खेल रही हैं।
लखनऊ से पहुंचे शैलेंद्र और राजन ने बताया कि दिल्ली से हम अपने मित्रों के साथ हर वर्ष होली का आंनद लेने गोकुल आते हैं, गोकुल की होली बहुत ही मनमोहक एवं आंनद मय होती है। गोकुल में श्रद्धालुओं ने होली खेली जो बहुत अलौकिक थी। गुलाल एवं रंग से सराबोर श्रद्धालु होरी का आंनद रसियाओं के साथ लेते रहे। बहुत ही अच्छा लगा।
वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर शुक्रवार को शिवभक्त चिताओं की राख से भस्म की होली खेल रहे हैं। भक्त शिव-पार्वती ‘भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी’ गाने पर डांस कर रहे हैं। चिताओं के चारों ओर मस्ती में झूम रहे हैं। हर तरफ चिता की राख उड़ रही है। सड़कें राख से पटी हैं।
जिधर नजर जा रही, कोई चेहरे पर राख मल रहा है, तो कोई चिता भस्म से नहाया है। जहां एक तरफ चिता जल रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ लोग भस्म की होली का उत्सव मना रहे हैं। हर तरफ हवा में भस्म और गुलाल उड़ रहा है। चंदन और भस्म से रंगे शिव भक्त भोलेनाथ के जयकारे लगा रहे हैं।

गले में रूद्राक्ष और नरमुंड माला पहने शिवभक्त चिताओं की राख से होली खेलते हुए।
हरिश्चंद्र घाट तक विशाल शोभायात्रा निकाली गई
भस्म से होली खेलने से पहले रविन्द्रपुरी स्थित भगवान कीनाराम स्थली के कुंड से औघड़ संतों के साथ हरिश्चंद्र घाट तक विशाल शोभायात्रा निकाली गई। इसमें बग्घी, ऊंट, घोड़ा समेत हजारों की संख्या में लोग नाचते-गाते हुए शामिल हुए। वहीं भोला बाबा अपनी पत्नी मां पार्वती के साथ शोभायात्रा में आए।
शोभायात्रा में भस्म और चंदे से रंगे भक्तों ने बाबा मशान नाथ का जयकारा लगाया। इस मौके पर बाबा भोलेनाथ के भक्तों ने भूत-प्रेत-पिशाच का स्वांग रचा। अघोरी बाबा बनकर यात्रा में करतब दिखाए। सभी लोग हर-हर महादेव के जयकारों के साथ चिता भस्म की होली खेलने गंगा तट पर पहुंचे।

राख के ऊपर बैठकर होली खेलते शिव भक्त। आस-पास बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं।





