स्नेहलता रेड्डी भी उसी जेल में बन्दिनी थीं, जिसमें मधु दण्डवते को आपातकाल के दौरान बन्दी बना कर रखा गया था। राम मनोहर लोहिया को आदर्श मानने वाली राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हुईं कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री स्नेहलता तथा उनके पति पट्टाभिराम रेड्डी की जॉर्ज फर्नांडीज से अच्छी मित्रता थी। ‘बडौदा डायनामाइट केस’ के फर्नांडीज तथा २४ अन्य व्यक्ति अभियुक्त थे। स्नेहलता के अभियुक्त न होते हुए भी उन्हें २ जून १९७६ को गिरफ्तार कर लिया गया।
फिर आरम्भ हुआ यातनाओं का दौर। दमे से पीड़ित स्नेहलता रेड्डी इस बीच दो बार कोमा में भी चली गई, किन्तु यंत्रणा थमी नहीं। वह बैंगलोर जेल में अकेली महिला राजनीतिक बन्दी थीं।
उनका नाम चार्जशीट में भी नहीं था, फिर भी उन्हें मीसा (Maintenance of Internal Security Act) जैसे तानाशाह कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया। इस कानून को कुछ विरोधियों ने ‘मिसचीव्स ऑफ इन्दिरा एण्ड संजय एक्ट’ का नाम दिया गया, लालू प्रसाद यादव ने तो इस कानून के नाम पर अपनी एक बेटी का नामकरण किया।
किसी प्रकार स्नेहलता रेड्डी को १५ जनवरी १९७७ को बेल मिली परन्तु पाँच ही दिन बाद उनका देहावसान हो गया।
जेल में लिखी उनकी डायरी पर २०१९ में एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाई गई।
आपातकाल के विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत करने वाली वे महानायिका हैं।
किशोर कुमार का आपातकाल में तब सूचना और प्रसारण मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल के साथ पंगा तो जग-जाहिर है।
आपातकाल में किशोर कुमार के युवा-कॉङ्ग्रेस के एक जलसे में कॉङ्गेस की प्रशंसा में गीत न गाने के अतिरिक्त संजय गाँधी के बीस सूत्री आर्थिक योजना की प्रशंसा में प्रचार गीत गाने से भी इनकार कर दिया।
सूचना और प्रसारण मंत्री ने वही किया जो एक तानाशाह के चाटुकार को करना चाहिए। उन्होंने किशोर कुमार के गीतों और फिल्मों को आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रतिबन्धित कर दिया गया। हम उनके गीत रेडियो सीलोन पर ही सुन पाते थे।
आपातकाल में ही ‘शोले’ प्रदर्शित होने को तैयार थी, किन्तु सेंसर बोर्ड की ओर से समस्याएँ आ रही थी। तब जी पी सिप्पी के तारणहार बने थे मनोज कुमार! मनोज कुमार को कॉङ्ग्रेस से बहुत ही निकट का सम्बन्ध माना जाता रहा है। और उन्होंने विद्याचरण शुक्ल को शोले के प्रदर्शन के लिए मनवा ही लिया।
शुक्ल जी बडे पंडित किस्म के व्यक्ति थे, कर्मकाण्ड करते तो उसकी दक्षिणा तो लेते ही थे। इधर गोस्वामी जी ‘भारत कुमार’ यूँ ही नहीं कहलाते। आपातकाल के तो आरम्भ से ही विरोध में रहे। लेकिन शुक्ल जी तो दक्षिणा चाहिए ही थी। तो ‘रसीदी टिकट’ के साथ एक आपातकाल के समर्थन में वृत्तचित्र की पटकथा भिजावा दिए। मनोज कुमार ने ‘सन्डे गॉर्डियन’ को दिए एक साक्षात्कार कहा :
“One morning, I received a call from the I&B Ministry to direct a pro-Emergency documentary written by Amrita Pritam. I point-blank refused to direct the documentary and even asked her directly if she had sold out as a writer,”
(एक सुबह, मुझे सूचना और प्रसारण मंत्रालय से अमृता प्रीतम की लिखी एक आपातकाल का समर्थन करने वाले वृत्तचित्र का निर्देशन करने के लिए एक कॉल आया। मैंने साफ-तौर पर इन्कार कर दिया और मैंने अमृता प्रीतम से सीधे पूछा भी कि क्या वे एक लेखक के रूप में बिक गईं हैं?)
अमृता प्रीतम ने क्षमायाचना करते हुए पटकथा को जला देने का अनुरोध किया।
किन्तु विद्याचरण बाबू को पण्डित जी की सारी विद्या चरण के नीचे दबा देने मौका मिल गया।
आपातकाल में एक कानून बनाया गया, जिसमें किसी भी फिल्म को उसके प्रदर्शन के दो सप्ताह बाद दूरदर्शन पर दिखाया जा सकता है। मनोज कुमार की ‘शोर’ (१९७२) दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली पहली फिल्म थी। इसे दो सप्ताह के बाद पुनः सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया गया, किन्तु हॉल खाली थे, और मनोज कुमार को अपनी जेब से सिनेमाघरों के मालिकों को पैसा देना पडा। कुछ ऐसा ही हश्र मनोज कुमार की आने वाली फिल्म ‘दस नम्बरी’ (१९७६) का भी होता। पर ‘भारत कुमार’ इस दाव पर पटकनी खाने वालों में नहीं थे। एक ओर ‘भारत सरकार’ और दूसरी ओर ‘भारत कुमार’, इस कुश्ती के रेफरी ने सतर्कता से सरकार का फाउल का पर्यवेक्षण कर लिया, तो इस मैच का परिणाम निकला, कि पण्डित जी गा पड़े “ये विदिया एक नम्बरी, तो मैं दस नम्बरी …”
आपातकाल में सरकार के विरुद्ध न्यायपालिका मे जीतने वाले एकमात्र फिल्मकार मनोज कुमार ही थे।
किशोर कुमार की ही तरह देव आनन्द की फिल्मों के भी दूरदर्शन पर प्रसारण से रोक लगाई गई। क्योंकि देव आनन्द ने आपातकाल के समर्थन में बोलने से न केवल इन्कार किया अपितु सार्वजनिक रूप से इसके खिलाफ भी बोले। इसमें चेतन आनन्द (देव आनन्द के बडे भाई) और विजय आनन्द (छोटे भाई) भी देव आनन्द के साथ सरकार के विरोध में खड़े थे।
जूहू तट पर एक सार्वजनिक सभा में देव आनन्द ने इन्दिरा गाँधी और संजय गाँधी के तानाशाही रवैये के विरुद्ध न केवल बोले अपितु ‘नेशनल पार्टी’ नाम के एक राजनीतिक दल को बनाने की भी घोषणा कर दी। देव आनन्द का कहना था :
“The pro-Emergency lobby enforced strict discipline amongst the masses and the rank and file of the government offices through certain legislative measures. It did a lot of good for the country. But, the fact was that the soul of the people was smouldering, their spirit stifled by an iron hand,” Dev Anand in his autobiography, ‘Romancing With Life.’
(आपातकाल की समर्थक लॉबी ने कुछ संवैधानिक उपायों से जनसाधारण और सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों पर सख्त अनुशासन लगाया है। इसने देश के लिए कुछ अच्छा किया। लेकिन, सच्चाई यह थी कि लोगों की आत्मा सुलग रही थी, उनकी आत्मा लोहे के हाथ से कुचल दी गई थी। — देव आनन्द की आत्मकथा “रोमांसिंग विद लाइफ” से)
अपनी पार्टी की इस कथा पर उन्होंने मि॰ प्राइम-मिनिस्टर नाम की एक फिल्म भी बनाई।
शत्रुघ्न सिन्हा की फिल्मों पर न सिर्फ़ ऐसा बैन लगा अपितु बिहार में कॉङ्ग्रेस प्रचार न करने पर उसी ‘बडौदा डायनामाइट केस’ में फँसाने की धमकी दी गई जिसकी शहीद स्नेहलता रेड्डी हैं।
क्या ऐसा है जिससे आज “तीसरे बादशाह” कॉङ्ग्रेस-वन्दना में लगे हैं?
व्ही॰ शान्ताराम, उत्तम कुमार, सत्यजीत राय, राज कुमार, आई॰एस॰ जौहर, अमृत नाहटा और गुलज़ार सब भी आपातकाल के खिलाफ खड़े हुए और बोले भी।
गुलज़ार की फिल्म ‘आँधी’, जो एक पत्नी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और पति के मौन समर्थन, और उनका अलगाव दिखाती है, को प्रधानमंत्री की छवि के लिए नकारात्मक मान कर उसे प्रदर्शित नहीं होने दिया। किन्तु, यह फिल्म ऐसा कुछ दिखाती ही नहीं।
सत्यजीत राय को जवाहरलाल नेहरू पर एक वृत्तचित्र बनाने और निर्देशन का अनुरोध किया गया, किन्तु यह उन्होंने ठुकरा दिया। उनकी विश्व में ख्याति और देश में लोकप्रियता ने सरकार के हाथ बाँध दिए।
अमृत नाहटा १९६७ से बाड़मेर संसदीय क्षेत्र (जो क्षेत्रफल में बेल्जियम से भी बडा है) से कॉङ्ग्रेस के सांसद थे। वे ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ (ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गङ्गा बहाते चलो) जैसी कालजयी फिल्म बना चुके थे। उन्होंने बनाई ‘किस्सा कुर्सी का’ यह व्यंग्यात्मक फिल्म एक साधारण व्यक्ति (मनोहर सिंह) के सत्तारूढ़ होकर कुर्सी से चिपके रहने के प्रयास और इस प्रयास में भ्रष्टाचार को अपनाने और फिर उसके पतन को दर्शाती है। इस फिल्म के प्रिंट्स को मारुति की निर्माणाधीन फैक्ट्री के प्राङ्गण में जला दिया गया था। अमृत नाहटा ने इस फिल्म को फिर से बनाया।
इस फिल्म को संजय गाँधी, आर के धवन (प्रधानमंत्री के निजी सचिव) तथा रुखसाना सुल्तान (अमृता सिंह की माँ) के चरित्र पर आक्षेप मानते हुए सेंसर बोर्ड के कार्यालय से उठवा कर नष्ट किया गया था। तब सूचना और प्रसारण मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल तथा संजय गाँधी को इसका दोषी पाया गया और शुक्ल को दो वर्ष तथा गाँधी को मात्र एक माह की ही सजा हुई।
अमृत नाहटा १९७७ में पाली से जनता पार्टी के चुने गए, किन्तु उसके बाद फिर चुनकर नहीं आए।
आई॰एस॰ जौहर तो व्यंग्य के बेताज बादशाह थे।
इसी समय में आई॰एस॰ जौहर ने आपातकाल में हुई जबरन नसबन्दी पर आक्षेप करते हुए यह फिल्म बनाई। किन्तु इसे तब सरकार ने प्रदर्शन से रोक दिया। इसे जनता दल की सरकार से प्रदर्शन की अनुमति मिली।
आनन्द पटवर्धन ने १९७५ में ही Waves of Revolution (वैव्स ऑफ रिवोल्यूशनर — क्रान्ति की तरंगें) नाम से एक वृत्तचित्र बनाया, जो ‘जननायक’ जयप्रकाश नारायण के सत्याग्रह और १९७४-७५ में बिहार की हालत को चित्रित करता है।
उन्होंने इसी विषय पर Prisoners of Conscience (प्रिजनर्स ऑफ कॉन्सिएंस — अन्तरात्मा के बन्दी) नाम से फिल्म भी बनाईं।
(क्रान्ति की तरंगें)
विशेष :—
दिलीप कुमार ने क केवल आपातकाल का समर्थन किया अपितु वे अमेठी में संजय गाँधी का प्रचार करने भी गए।
आपातकाल समाप्त होने के बाद कुछ फिल्मकार मुखर हुए और उन्होंने इसके विरोध में कुछ फिल्में भी बनाईं। किन्तु, बहुत ही कम, अतः भारत की नई पीढ़ी जो फिल्मों के माध्यम से इस काल को जान सकती थी, इतना नहीं जान पाई है।
सई परांजपे (चश्मेबद्दूर) ने १९७७ में एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म Freedom from Fear (फ्रीडम फ्रॉम फिअर — भय से मुक्ति) बनाई, जिसमें उन्होंने आपातकाल के भयावह वातावरण का चित्रण किया है, और जनता पार्टी की सरकार को अभिव्यक्ति की आजादी के रक्षक के रूप में उस भय से मुक्त करने वाला बताया।
मलयालम फिल्मों में बालू महेन्द्रन की यात्रा (१९८५) तथा आशाजी एन॰ करुण की पिरावी (१९८९) भी इस दौर पर रोशनी डालती हैं।
(यात्रा — मम्मूटी और शोभना)
(पिरावी)
हिन्दी फिल्मों में हजारों ख़्वाहिशें ऐसी (२००५),
इन्दु सरकार (२०१७)
तथा
बादशाहों (२०१७) ने इस काल पर कुछ कहने में रुचि दिखाई है।
सन्दर्भ :—
Bans & Jail: When Kishore Kumar, Dev Anand & Manoj Kumar Battled The Emergency
Snehalata Reddy – Wikipedia
‘Prison Diaries’: An intimate documentary on anti-Emergency activist Snehalatha Reddy
When Manoj Kumar turned into a real hero during emergency
Dilip Kumar Supported Emergency, Campaigned For Sanjay Ga
14इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए 1975 के आपातकाल के खिलाफ भारतीय सिनेमा ने किस प्रकार विद्रोह किया था ?मधु दण्डवते ने अपने संस्मरण Dialogue with Life में लिखा है : “I could hear the screams of Snehalata from her cell in the silence of the night”. (मैं रात की खामोशी में स्नेहलता की कोठरी से आती उसकी चित्कारें सुन सकता था।) स्नेहलता रेड्डी भी उसी जेल में बन्दिनी थीं, जिसमें मधु दण्डवते को आपातकाल के दौरान बन्दी बना कर रखा गया था। राम मनोहर लोहिया को आदर्श मानने वाली राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हुईं कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री स्नेहलता तथा उनके पति पट्टाभिराम रेड्डी की जॉर्ज फर्नांडीज से अच्छी मित्रता थी। ‘बडौदा डायनामाइट केस’ के फर्नांडीज तथा २४ अन्य व्यक्ति अभियुक्त थे। स्नेहलता के अभियुक्त न होते हुए भी उन्हें २ जून १९७६ को गिरफ्तार कर लिया गया। फिर आरम्भ हुआ यातनाओं का दौर। दमे से पीड़ित स्नेहलता रेड्डी इस बीच दो बार कोमा में भी चली गई, किन्तु यंत्रणा थमी नहीं। वह बैंगलोर जेल में अकेली महिला राजनीतिक बन्दी थीं। उनका नाम चार्जशीट में भी नहीं था, फिर भी उन्हें मीसा (Maintenance of Internal Security Act) जैसे तानाशाह कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया। इस कानून को कुछ विरोधियों ने ‘मिसचीव्स ऑफ इन्दिरा एण्ड संजय एक्ट’ का नाम दिया गया, लालू प्रसाद यादव ने तो इस कानून के नाम पर अपनी एक बेटी का नामकरण किया। किसी प्रकार स्नेहलता रेड्डी को १५ जनवरी १९७७ को बेल मिली परन्तु पाँच ही दिन बाद उनका देहावसान हो गया। जेल में लिखी उनकी डायरी पर २०१९ में एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाई गई। आपातकाल के विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत करने वाली वे महानायिका हैं। किशोर कुमार का आपातकाल में तब सूचना और प्रसारण मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल के साथ पंगा तो जग-जाहिर है। आपातकाल में किशोर कुमार के युवा-कॉङ्ग्रेस के एक जलसे में कॉङ्गेस की प्रशंसा में गीत न गाने के अतिरिक्त संजय गाँधी के बीस सूत्री आर्थिक योजना की प्रशंसा में प्रचार गीत गाने से भी इनकार कर दिया। सूचना और प्रसारण मंत्री ने वही किया जो एक तानाशाह के चाटुकार को करना चाहिए। उन्होंने किशोर कुमार के गीतों और फिल्मों को आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रतिबन्धित कर दिया गया। हम उनके गीत रेडियो सीलोन पर ही सुन पाते थे। आपातकाल में ही ‘शोले’ प्रदर्शित होने को तैयार थी, किन्तु सेंसर बोर्ड की ओर से समस्याएँ आ रही थी। तब जी पी सिप्पी के तारणहार बने थे मनोज कुमार! मनोज कुमार को कॉङ्ग्रेस से बहुत ही निकट का सम्बन्ध माना जाता रहा है। और उन्होंने विद्याचरण शुक्ल को शोले के प्रदर्शन के लिए मनवा ही लिया। शुक्ल जी बडे पंडित किस्म के व्यक्ति थे, कर्मकाण्ड करते तो उसकी दक्षिणा तो लेते ही थे। इधर गोस्वामी जी ‘भारत कुमार’ यूँ ही नहीं कहलाते। आपातकाल के तो आरम्भ से ही विरोध में रहे। लेकिन शुक्ल जी तो दक्षिणा चाहिए ही थी। तो ‘रसीदी टिकट’ के साथ एक आपातकाल के समर्थन में वृत्तचित्र की पटकथा भिजावा दिए। मनोज कुमार ने ‘सन्डे गॉर्डियन’ को दिए एक साक्षात्कार कहा : “One morning, I received a call from the I&B Ministry to direct a pro-Emergency documentary written by Amrita Pritam. I point-blank refused to direct the documentary and even asked her directly if she had sold out as a writer,” (एक सुबह, मुझे सूचना और प्रसारण मंत्रालय से अमृता प्रीतम की लिखी एक आपातकाल का समर्थन करने वाले वृत्तचित्र का निर्देशन करने के लिए एक कॉल आया। मैंने साफ-तौर पर इन्कार कर दिया और मैंने अमृता प्रीतम से सीधे पूछा भी कि क्या वे एक लेखक के रूप में बिक गईं हैं?) अमृता प्रीतम ने क्षमायाचना करते हुए पटकथा को जला देने का अनुरोध किया। किन्तु विद्याचरण बाबू को पण्डित जी की सारी विद्या चरण के नीचे दबा देने मौका मिल गया। आपातकाल में एक कानून बनाया गया, जिसमें किसी भी फिल्म को उसके प्रदर्शन के दो सप्ताह बाद दूरदर्शन पर दिखाया जा सकता है। मनोज कुमार की ‘शोर’ (१९७२) दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाली पहली फिल्म थी। इसे दो सप्ताह के बाद पुनः सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया गया, किन्तु हॉल खाली थे, और मनोज कुमार को अपनी जेब से सिनेमाघरों के मालिकों को पैसा देना पडा। कुछ ऐसा ही हश्र मनोज कुमार की आने वाली फिल्म ‘दस नम्बरी’ (१९७६) का भी होता। पर ‘भारत कुमार’ इस दाव पर पटकनी खाने वालों में नहीं थे। एक ओर ‘भारत सरकार’ और दूसरी ओर ‘भारत कुमार’, इस कुश्ती के रेफरी ने सतर्कता से सरकार का फाउल का पर्यवेक्षण कर लिया, तो इस मैच का परिणाम निकला, कि पण्डित जी गा पड़े “ये विदिया एक नम्बरी, तो मैं दस नम्बरी …” आपातकाल में सरकार के विरुद्ध न्यायपालिका मे जीतने वाले एकमात्र फिल्मकार मनोज कुमार ही थे। किशोर कुमार की ही तरह देव आनन्द की फिल्मों के भी दूरदर्शन पर प्रसारण से रोक लगाई गई। क्योंकि देव आनन्द ने आपातकाल के समर्थन में बोलने से न केवल इन्कार किया अपितु सार्वजनिक रूप से इसके खिलाफ भी बोले। इसमें चेतन आनन्द (देव आनन्द के बडे भाई) और विजय आनन्द (छोटे भाई) भी देव आनन्द के साथ सरकार के विरोध में खड़े थे। जूहू तट पर एक सार्वजनिक सभा में देव आनन्द ने इन्दिरा गाँधी और संजय गाँधी के तानाशाही रवैये के विरुद्ध न केवल बोले अपितु ‘नेशनल पार्टी’ नाम के एक राजनीतिक दल को बनाने की भी घोषणा कर दी। देव आनन्द का कहना था : “The pro-Emergency lobby enforced strict discipline amongst the masses and the rank and file of the government offices through certain legislative measures. It did a lot of good for the country. But, the fact was that the soul of the people was smouldering, their spirit stifled by an iron hand,” Dev Anand in his autobiography, ‘Romancing With Life.’ (आपातकाल की समर्थक लॉबी ने कुछ संवैधानिक उपायों से जनसाधारण और सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों पर सख्त अनुशासन लगाया है। इसने देश के लिए कुछ अच्छा किया। लेकिन, सच्चाई यह थी कि लोगों की आत्मा सुलग रही थी, उनकी आत्मा लोहे के हाथ से कुचल दी गई थी। — देव आनन्द की आत्मकथा “रोमांसिंग विद लाइफ” से) अपनी पार्टी की इस कथा पर उन्होंने मि॰ प्राइम-मिनिस्टर नाम की एक फिल्म भी बनाई। शत्रुघ्न सिन्हा की फिल्मों पर न सिर्फ़ ऐसा बैन लगा अपितु बिहार में कॉङ्ग्रेस प्रचार न करने पर उसी ‘बडौदा डायनामाइट केस’ में फँसाने की धमकी दी गई जिसकी शहीद स्नेहलता रेड्डी हैं। क्या ऐसा है जिससे आज “तीसरे बादशाह” कॉङ्ग्रेस-वन्दना में लगे हैं? व्ही॰ शान्ताराम, उत्तम कुमार, सत्यजीत राय, राज कुमार, आई॰एस॰ जौहर, अमृत नाहटा और गुलज़ार सब भी आपातकाल के खिलाफ खड़े हुए और बोले भी। गुलज़ार की फिल्म ‘आँधी’, जो एक पत्नी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और पति के मौन समर्थन, और उनका अलगाव दिखाती है, को प्रधानमंत्री की छवि के लिए नकारात्मक मान कर उसे प्रदर्शित नहीं होने दिया। किन्तु, यह फिल्म ऐसा कुछ दिखाती ही नहीं। सत्यजीत राय को जवाहरलाल नेहरू पर एक वृत्तचित्र बनाने और निर्देशन का अनुरोध किया गया, किन्तु यह उन्होंने ठुकरा दिया। उनकी विश्व में ख्याति और देश में लोकप्रियता ने सरकार के हाथ बाँध दिए। अमृत नाहटा १९६७ से बाड़मेर संसदीय क्षेत्र (जो क्षेत्रफल में बेल्जियम से भी बडा है) से कॉङ्ग्रेस के सांसद थे। वे ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ (ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गङ्गा बहाते चलो) जैसी कालजयी फिल्म बना चुके थे। उन्होंने बनाई ‘किस्सा कुर्सी का’ यह व्यंग्यात्मक फिल्म एक साधारण व्यक्ति (मनोहर सिंह) के सत्तारूढ़ होकर कुर्सी से चिपके रहने के प्रयास और इस प्रयास में भ्रष्टाचार को अपनाने और फिर उसके पतन को दर्शाती है। इस फिल्म के प्रिंट्स को मारुति की निर्माणाधीन फैक्ट्री के प्राङ्गण में जला दिया गया था। अमृत नाहटा ने इस फिल्म को फिर से बनाया। इस फिल्म को संजय गाँधी, आर के धवन (प्रधानमंत्री के निजी सचिव) तथा रुखसाना सुल्तान (अमृता सिंह की माँ) के चरित्र पर आक्षेप मानते हुए सेंसर बोर्ड के कार्यालय से उठवा कर नष्ट किया गया था। तब सूचना और प्रसारण मंत्री रहे विद्याचरण शुक्ल तथा संजय गाँधी को इसका दोषी पाया गया और शुक्ल को दो वर्ष तथा गाँधी को मात्र एक माह की ही सजा हुई। अमृत नाहटा १९७७ में पाली से जनता पार्टी के चुने गए, किन्तु उसके बाद फिर चुनकर नहीं आए। आई॰एस॰ जौहर तो व्यंग्य के बेताज बादशाह थे। इसी समय में आई॰एस॰ जौहर ने आपातकाल में हुई जबरन नसबन्दी पर आक्षेप करते हुए यह फिल्म बनाई। किन्तु इसे तब सरकार ने प्रदर्शन से रोक दिया। इसे जनता दल की सरकार से प्रदर्शन की अनुमति मिली। आनन्द पटवर्धन ने १९७५ में ही Waves of Revolution (वैव्स ऑफ रिवोल्यूशनर — क्रान्ति की तरंगें) नाम से एक वृत्तचित्र बनाया, जो ‘जननायक’ जयप्रकाश नारायण के सत्याग्रह और १९७४-७५ में बिहार की हालत को चित्रित करता है। उन्होंने इसी विषय पर Prisoners of Conscience (प्रिजनर्स ऑफ कॉन्सिएंस — अन्तरात्मा के बन्दी) नाम से फिल्म भी बनाईं। (क्रान्ति की तरंगें) विशेष :— दिलीप कुमार ने क केवल आपातकाल का समर्थन किया अपितु वे अमेठी में संजय गाँधी का प्रचार करने भी गए। आपातकाल समाप्त होने के बाद कुछ फिल्मकार मुखर हुए और उन्होंने इसके विरोध में कुछ फिल्में भी बनाईं। किन्तु, बहुत ही कम, अतः भारत की नई पीढ़ी जो फिल्मों के माध्यम से इस काल को जान सकती थी, इतना नहीं जान पाई है। सई परांजपे (चश्मेबद्दूर) ने १९७७ में एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म Freedom from Fear (फ्रीडम फ्रॉम फिअर — भय से मुक्ति) बनाई, जिसमें उन्होंने आपातकाल के भयावह वातावरण का चित्रण किया है, और जनता पार्टी की सरकार को अभिव्यक्ति की आजादी के रक्षक के रूप में उस भय से मुक्त करने वाला बताया। मलयालम फिल्मों में बालू महेन्द्रन की यात्रा (१९८५) तथा आशाजी एन॰ करुण की पिरावी (१९८९) भी इस दौर पर रोशनी डालती हैं। (यात्रा — मम्मूटी और शोभना) (पिरावी) हिन्दी फिल्मों में हजारों ख़्वाहिशें ऐसी (२००५), इन्दु सरकार (२०१७) तथा बादशाहों (२०१७) ने इस काल पर कुछ कहने में रुचि दिखाई है। मेरा यह उत्तर भी देखें क्या किसी हिन्दी लेखक ने आपातकाल का खुल कर विरोध किया था? के लिए अरविन्द व्यास (Arvind Vyas) का जवाब © अरविन्द व्यास, सर्वाधिकार सुरक्षित। इस लेख को उद्धृत करते हुए इस लेख के लिंक का भी विवरण दें। सन्दर्भ :— Bans & Jail: When Kishore Kumar, Dev Anand & Manoj Kumar Battled The Emergency Snehalata Reddy – Wikipedia ‘Prison Diaries’: An intimate documentary on anti-Emergency activist Snehalatha Reddy When Manoj Kumar turned into a real hero during emergency Dilip Kumar Supported Emergency, Campaigned For Sanjay Gandhi Films of Anand Patwardhan
:—
ध्यान दें सभी आरोपी बन्दी नहीं बनाए जाते; अनेक जमानत पर भी छूट जाते हैं। अतः लेखक के कुछ लोगों का यह आँकड़ा वर्तमान परिस्थिति से बहुत ही भयावह है। एक बात और तब की जनसङ्ख्या वर्तमान की लगभग 43% थी। अतः पूर्ण तुलना के लिए तब के आँकड़े को 2.3 गुना करना आवश्यक है।
मेरे विचार में प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया को मानने वाले किसी भी व्यक्ति को राजनैतिक बन्दी बनाना लोकतन्त्र की मूल भावना के विरुद्ध है। अतः, एक आदर्श लोकतन्त्र में राजनैतिक बन्दियों की सङ्ख्या शून्य होनी चाहिए। दूसरा, उपलब्ध आँकड़ो से यह भी स्पष्ट है कि प्रतिवर्ष पिछले वर्ष की तुलना में अधिक व्यक्ति राजनैतिक आरोपी बनाए गए हैं। यह निस्सन्देह एक स्वस्थ रुझान नहीं है; लगभग 16.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष; इतना चढ़ाव शेयर बाजार में ही अच्छा लगता है; न कि राजनैतिक बन्दियों की सङ्ख्या में; अतः वर्तमान सरकार भी प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया को बाधित करने की दोषी है। किन्तु, इसे श्रीमती गाँधी की गहराइयों तक पहुँचने में समय लगेगा। यही कारण है कि “नरेन्द्र मोदी का विकल्प कौन?” प्रश्न के उत्तर में मैं चिन्तित हूँ। ]
अफवाहबाज़ अखबारों पर सेंसर
वास्तविकता : मई 1976 में ही 7,000 पत्रकारों को जेल में डाला गया। इनमें कुलदीप नय्यर (न्यूयॉर्क टाइम्स
]) तथा अरुण शौरी जैसे सम्माननीय पत्रकार भी थे। टाइम्स ऑफ लंडन, द वाशिंगटन पोस्ट, और लॉस एंजेल्स टाइम्स के पत्रकार निष्कासित किए गए। द गॉर्डियन और द इकोनॉमिस्ट के पत्रकारों को धमकीयाँ मिली; और उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
According to IE, journalists from The Times of London, The Washington Post, The Los Angeles Times were expelled. The Guardian and The Economists correspondents flew back to the United Kingdom after receiving threats.
Mark Tully, the voice of BBC, was also withdrawn by the channel. According to the Home Ministry, in May of 1976, almost 7,000 journalists and media personnel were arrested. — Times Now
आपातकाल के पहले दो दिन में ही 200 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया।
लेखक ने अखबारों के आगे अफवाहबाज़ को एक विशेषण के रूप में प्रयोग किया है। यदि हम आज की परिस्थिति में देखें तो वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार भी प्रेस के कुछ लोगों के लिए अफवाहबाज़ विशेषण का ही प्रयोग कर रही है। यह चिन्ता का विषय है। किन्तु, उतना ही चिन्ता का विषय यह भी है कि यदि इन पत्रकारों पर विदेशों से धन लेकर यदि सरकार का विरोध करते हैं तो क्या लोकतन्त्र का यह चौथा स्तम्भ कहीं इसके अन्य स्तम्भों पर आघात तो नहीं कर रहा?
वैसे पत्रकारों को जेल में डालने के प्रयास में भी मोदी सरकार बहुत ढीली है। अलबत्ता मोदी जी के समर्थक और विरोधी दोनों, पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेविस एम सिमॉन्स (Lewis M. Simons) का यह कथन अवश्य पढें :—
Nearly half a century after the government of India kicked me out of the country for writing a story that struck an exposed nerve, foreign journalists there are under the gun again. And for a similar reason. — Lewis M. Simons
अतः न तो श्रीमती इन्दिरा गाँधी न ही प्रधानमन्त्री मोदी को सन्त मानते हुए उन्हें स्वतन्त्र पत्रकारिता को बन्धक बनाने के दोष से मुक्त किया जा सकता है।
नरसंहार, गोलीबारी, जजों की लोया गति, अथवा नग्न परेड सरकार द्वारा चलाई गई गतिविधियाँ नहीं है। किन्तु, इस प्रकार की घटनाएँ व्यवस्था के लचर होने का सङ्केत देतीं हैं।
ज्यूडिसियल किलिंग और मुठभेड़ निश्चय ही मानवता के लिए सङ्कट हैं। किन्तु, तुर्कमान गेट काण्ड, जिसका लेखक ने छोटी सी घटना मानते हुए उल्लेख किया है; उसमें लगभग 70 हजार लोग (मुख्य रूप से मुस्लिम शरणार्थी) विस्थापित हुए और 400 व्यक्तियों के मारे जाने का अनुमान किया जाता है
“Turkman Gate is where it came to grief. People speak the words now in the way that they spoke of Jallianwala Bagh after General Dyer’s massacre in 1919.” — Michael Henderson
इस काण्ड के दौरान कितने बलात्कार हुए इसके अनेक किस्से हैं; किन्तु, इनकी उचित सङ्ख्या का आकलन करना असम्भव है। इनमें जो व्यक्ति मारे गए अनेक पुलिस की गोलियों का शिकार हुए। अतः इसे सरकार द्वारा प्रायोजित नरसंहार कहना चाहिए। इस लिंक पर राजिया बेगम की कथा अवश्य पढिए, जिनके वस्त्रहरण का एक पुलिस कर्मी ने प्रयास किया।
दुःख है कि अपने आप को अल्पसङ्ख्यकों का हितैषी कहने वाले दल की सरकार ने उनके विरुद्ध ऐसे दंगे आयोजित किए।
आपातकाल लगाने का यह तीसरा अवसर था। संविधान की धाराओं 362–360 में आपातकाल का प्रावधान है।
पहली बार पण्डित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में 26 अक्तूबर 1962 को चीन से युद्ध के चलते आपातकाल घोषित किया गया, जोकि श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने 10 जनवरी 1968 को हटाया। इस बीच पाकिस्तान से युद्ध हुआ और ताशकन्द समझौता भी।
दूसरी बार 3 दिसम्बर 1971 से आपातकाल लागू किया गया। यह भी युद्ध की स्थिति में था।
हमारे यह मित्र इसे पूर्णतः संवैधानिक मानते हुए लिखते हैं —:
तीसरी बार यह स्थिति 25 जून 1975 को आई। किन्तु, इसके पूर्व श्रीमती इन्दिरा गाँधी की सरकार ने संविधान के अडतीसवें संशोधन, 1975 द्वारा आपातकाल लागू करने की प्रक्रिया को न्यायिक समीक्षा से परे कर दिया। अतः आपातकाल को लागू करने के उपरान्त उसे वैधानिकता का चोगा पहनाया गया था। इस अधिनियम की धाराएँ देखें :—
Made the declaration of emergency by the President non-justiciable.
Made the promulgation of ordinances by the President, governors and administrators of Union territories non-justiciable.
Empowered the President to declare different proclamations of national emergency on different grounds simultaneously.
— Thirty-Eighth Amendment Act, 1975
[16]
अतः यह काम उन्होंने संविधान में आपातकाल के मूलभूत सिद्धान्त के विपरीत किया।
इस संशोधन को रद्द कर पुनः आपातकाल लगाने की प्रक्रिया को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाया गया। तथा आन्तरिक विरोध के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह की परिस्थिति में ही जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1977 में लाया गया संविधान का चौवालीसवाँ संशोधन देता है। यही नहीं आपातकाल में संविधान की धारा 20 तथा 21 में वर्णित मूलभूत अधिकारों को निलम्बित नहीं होने देने की गारंटी भी यह संशोधन देता है। इस संशोधन के कारण भारत सरकार को न्यायिक रूप से मानवाधिकार हनन के लिए न्यायपालिका से चुनौती दी जा सकती है।
Replaced the term ‘internal disturbance’ by ‘armed rebellion’ in respect of national emergency.
Made the President to declare a national emergency only on the written recommendation of the cabinet.
Made certain procedural safeguards with respect to a national emergency and President’s rule.
Deleted the right to property from the list of Fundamental Rights and made it only a legal right.
Provided that the fundamental rights guaranteed by Articles 20 and 21 cannot be suspended during a national emergency.
Omitted the provisions which took away the power of the court to decide the election disputes of the president, the vice-president, the prime minister and the Speaker of the Lok Sabha
— Forty-Fourth Amendment Act, 1978
[17]
संविधान का अड़तीसवाँ संशोधन 22 जुलाई 1975 को; आपातकाल लगाने के लगभग एक माह पश्चात किया गया।
[18] यही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की न्यायपालिका को धता बताकर तानाशाही की ओर बढने वाला कदम है। यह न्यायोचित नहीं है।
जनता पार्टी की सरकार का चौवालीसवाँ संशोधन अब भी लागू है। अतः बिना किसी न्यायिक समीक्षा के कोई भी सरकार यह नहीं कर सकती है; और न ही आपातकाल की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 20 तथा 21 में वर्णित मूलभूत नागरिक अधिकारों को ही छीन सकती है। इससे पूर्व जीवन जीने का अधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को आपातकाल में छीना जा सकता था। और यह हुआ भी था।
किन्तु आपातकाल के परिप्रेक्ष्य में पुनः लौटते हैं।
ललित नारायण मिश्र की हत्या का दोष लेखक ने परोक्ष रूप से “सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन” पर डालने का प्रयास किया है। किन्तु, यह हत्या आनन्दमार्गी नक्सलपन्थियों ने की थी।
[19] लचर न्याय-प्रक्रिया के चलते इन्हें चालीस वर्ष उपरान्त ही दण्डित किया जा सका!
[20] यदि आपातकाल की अवधि में यदि भारत सरकार को श्री मिश्र की हत्या के दोषियों को दण्डित करने का यदि लक्ष्य होता तो वे जनसाधारण के स्थान पर सीधा सर्जिकल स्ट्राइक करते। आनन्दमार्गी नक्सलपन्थियों को “सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन” के समाजवादी तथा “अर्बन नक्सल” शब्द गढ़ने वाले दक्षिणपन्थी नेतृत्व का सहयोग नहीं था। हाँ; श्रमिक आन्दोलन के महत्वपूर्ण नेता और “सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन” के सहयोगी नक्सलपन्थ के प्रति नरम भावना रखते थे; और नक्सलपन्थ को राजीनीति की मुख्य धारा में लाने के पक्षधर रहे। भारत की प्रत्येक राजनीतिक विचारधारा यदि भारत को एक देश के रूप में देखने वाली मुख्य धारा में परिणत होती है तो इससे अधिक सुखद भारत के लिए क्या हो सकता है।
1975 की “सम्पूर्ण क्रान्ति” का नारा तात्कालीन भारत सरकार के लिए चुनौती था। इसका सबसे उचित और शान्तिपूर्ण समाधान भारत सरकार को भारतीय नागरिकों की समस्याओं के बारे सुनकर समझकर उचित कदम उठाना ही होता।
लेखक ने “मैं होता तो इमरजेंसी लगाता” लिखकर स्वयं के तानाशाही का समर्थक होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है। किन्तु, समस्या यह है कि यही कुतर्क देकर मोदी समर्थक प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को भी ठीक इसी प्रकार से उचित ठहरा सकते हैं। आवेग में आवेशित होकर ऐसा करना और कहना अनुचित है। एक लोकतन्त्र में इस प्रकार के निर्णय किसी को भी तानाशाह बनने से नहीं रोक सकते।
लेखक ने 1975 के आपातकाल की घोषणा करने से पूर्व के इतिहास के बारे में सङ्केत किया है; तो उस बारे में भी सङ्क्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है :—
सम्पूर्ण क्रान्ति से पूर्व दिसम्बर 1973 में गुजरात की चिमनभाई पटेल के नेतृत्व वाली सरकार के विरुद्ध एल डी इंजीनियरिंग कॉलेज छात्रों ने छात्रावास के भोजन शुल्क 20% बढाने का विरोध में एक आन्दोलन किया। यह आन्दोलन शिक्षा और भोजन से सम्बन्धित बातों को लेकर 7 जनवरी 1974 तक एक बडे आन्दोलन का रूप ले लेता है। यह आन्दोलन 30 जनवरी तक पुलिस और जनता के मध्य व्यापक रूप से हिंसक हो गया। अतः 7 फरवरी को चिमनभाई की सरकार को निलम्बित कर दिया गया; और राज्यपाल को शासन व्यवस्था को सम्हालने के निर्देश दिए गए। किन्तु, गतिरोध और प्रतिरोध चलता रहा। संगठन कॉङ्ग्रेस ने तथा फिर जनसंघ ने इस आन्दोलन को सहयोग दिया। विधानसभा में तब इन्दिरा कॉङ्ग्रेस के 167 में से 140 सदस्य थे। अतः संगठन कॉङ्ग्रेस 15 तथा जनसंघ के 3 विधानसभा सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया।
जयप्रकाश नारायण ने 11 फरवरी 1974 को गुजरात का दौरा किया और कई दिनों तक छात्रों के साथ बातचीत की। जेपी ने अगस्त 1974 में लिखा था: “मैंने आम सहमति की राजनीति लाने की कोशिश में दो साल व्यर्थ कर दिए थे। किन्तु, इसका कोई परिणाम नहीं निकला; फिर मैंने देखा कि गुजरात में छात्र लोगों के समर्थन से राजनीतिक बदलाव ला रहे हैं और मुझे पता था कि यही मार्ग है।” यह सम्पूर्ण क्रान्ति का आरम्भ कहा जा सकता है। इसके साथ ही जेपी और मोरारजी देसाई में वार्ता हुई। और 12 मार्च को संगठन कॉङ्ग्रेस के मोरारजी देसाई अनिश्चितकाल के लिए अनशन पर बैठ गए। इस वातावरण में पहले से ही निलम्बित विधानसभा के कॉङ्ग्रेस सदस्यों सहित कुल 95 सदस्यों से छात्र नेताओं ने त्यागपत्र भी दिलवाए। “राइट टू रिकॉल” के अभाव में छात्रों द्वारा घेराव कर पदत्याग करवाना ही इसका विकल्प रहा था; और इसका परिणति जनता के द्वारा चुनी गई लोकप्रिय सरकार में हुई थी। इस परिस्थिति में निलम्बित विधानसभा को भङ्ग करने का ही विकल्प शेष रहता था। 9 फरवरी 1974 से 18 जून 1975 तक गुजरात में राष्ट्रपति शासन रहा।
मार्च 1974 में गुजरात की सफलता को देखते हुए; बिहार में भी मुख्यमन्त्री अब्दुल गफूर के भ्रष्ट माने जाने वाले प्रशासन के विरुद्ध छात्र आन्दोलन आरम्भ हुए। अनेक छात्र संगठनों के संयोजन से बिहार छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ जिसका नेतृत्व लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी और राम विलास पासवान ने किया। और जेपी को इस आन्दोलन से जुड़ने के लिए सहमत किया गया। यह छात्र नेता समाजवादी और दक्षिणपन्थी दोनों प्रकार के विचारधारा से आते हैं।
मई 1974 में, ऑल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष जॉर्ज फर्नांडीस ने उच्च वेतन और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर 17 लाख रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल का नेतृत्व किया। उनके वेतन और भत्ते कई वर्षों से रुके हुए थे, और मुद्रास्फीति बहुत अधिक थी। खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों में कई रेलवे कर्मचारी घायल भी होते रहते थे।
सञ्जय गाँधी को सूचित किए बिना इन्दिरा गाँधी ने बैरन आर्किबाल्ड फेनर ब्रॉकवे (Baron Archibald Fenner Brockway) को जयप्रकाश नारायण से वार्ता के लिए अपना मध्यस्थ बनाया। जिसमें ब्रॉकवे ने बिहार विधानसभा को भङ्ग करने की माँग के अतिरिक्त अन्य सभी माँगों को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा। चन्द्र शेखर जोकि इस वार्ता में जेपी के अभिवक्ता थे; उन्होंने जयप्रकाश नारायण को इस समझौते को स्वीकार करने की सलाह दी। जयप्रकाश नारायण माने नहीं। इस वार्ता के दौरान जेपी ने 1952 में बिनोबा भावे के आश्रम में पहचान हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक सङ्घ के प्रमुख नानाजी देशमुख से सम्पर्क बनाकर उनसे अपने आन्दोलन के लिए आवश्यक स्वयंसेवकों को उपलब्ध करवाने के लिए सम्पर्क किया। और बिहार के छात्र नेताओं को उनके स्थान पर स्वयं नानाजी देशमुख के नेतृत्व में आन्दोलन की बागडोर थमाने के लिए मनाया। इनमें लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी और राम विलास पासवान के अतिरिक्त शरद यादव, नीतीश कुमार, तथा रवि शङ्कर प्रसाद भी सम्मिलित हैं। यद्यपि, जेपी की अपनी मण्डली के केएस राधाकृष्ण, सुगत दास गुप्ता, अच्युत पटवर्धन और न्यायमूर्ति वीएम तारकुण्डे, तथा उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी चन्द्र शेखर, उनके अचानक आरएसएस के साथ जुड़ने से चकित थे। नेहरू के बाद 1930 के दशक से जेपी ही हिन्दुत्व और आरएसएस की मुखर निन्दा करने में अग्रणी रहे थे। इस बीच भारत की गुप्तचर संस्थानों ने इन्दिरा गाँधी को इस आन्दोलन तक अनेक स्रोतों से विभिन्न स्वयंसेवी संस्थानों से विदेशी धन पहुँचने की बात भी बताई।
इस बीच 5 अप्रैल 1975 को मोरारजी देसाई पुनः गुजरात में चुनाव की माँग को लेकर आमरण अनशन करने बैठे। अतः 8 से 10 जून 1975 को गुजरात में चुनाव करवाने का निर्णय लिया गया।
और गुजरात में चुनाव की घोषणा कर दी गई। गुजरात में नए चुनाव हुए!
अब एक महत्वपूर्ण दिन की ओर; यह है 12 जून 1975; गुजरात विधानसभा के चुनाव के परिणाम आते हैं; चुनावपूर्व विधानसभा में 140 सदस्यों वाले केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के मात्र 75 सदस्य ही विजयी होते हैं। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता मोर्चा गठबन्धन ((सङ्गठन कॉङ्ग्रेस, भारतीय जनसङ्घ, भारतीय लोकदल, और समाजवादी) के 86 प्रत्याशी विजयी होते हैं; तथा उन कलङ्कित चिमनभाई पटेल के 12 सदस्यों के सहयोग से मोरारजी देसाई मुख्यमन्त्री बनते हैं।
इसी दिन 1971 के चुनाव में श्रीमती गाँधी के विरुद्ध उनके विरोधी प्रत्याशी राज नारायण की याचिका पर भी निर्णय आता है। अटल बिहारी वाजपेई ने राज नारायण से इस याचिका को वापस लेने का आग्रह किया था, किन्तु सङ्गठन कॉङ्ग्रेस के, कई बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री रहे, चन्द्रभानु गुप्ता ने समाजवादी राज नारायण को उकसाया। राज नारायण के अधिवक्ता और सङ्गठन कॉङ्ग्रेस के कोशाध्यक्ष शान्ति भूषण थे। अपने विरुद्ध इस निर्णय के उपरान्त 12 जून को ही श्रीमती गाँधी ने प्रधानमन्त्री पद से अपना त्यागपत्र अपने सचिव राजिन्दर कुमार धवन को मौखिक रूप से बोलकर टाइप करने के कहा।
इस बीच उनका उत्तराधिकारी कौन हो इसकी सुगबुगाहट आरम्भ हो गई; और बाबू जगजीवन राम ने स्वयं को प्रधानमन्त्री पद के प्रत्याशी के रूप में पैरवी की। बाबूजी 27 जून 1970 से 10 अक्टूबर 1974 तक भारत के रक्षामन्त्री थे और श्रीमती गाँधी के साथ स्वयं भी 1971 के युद्ध की विजय का मान साझा करते थे। किन्तु, जयप्रकाश नारायण द्वारा बाबूजी के अच्छे प्रशासक होने की प्रशंसा से श्रीमती गाँधी सशंकित थीं। यशवन्त राव बलवन्त राव चह्वाण दूसरे प्रत्याशी थे। किन्तु, मारुति की फैक्ट्री से लौटकर आने पर सञ्जय गाँधी ने इस त्यागपत्र के निर्णय का पुरजोर विरोध किया। यदि प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी अपना त्यागपत्र दे देतीं तो यह गरिमामय और प्रजातन्त्र के लिए उपयुक्त निर्णय होता। किन्तु, राजनितिक विश्लेषक यह मानते हैं (जैसे पृथिवी नाथ धर) कि जयप्रकाश नारायण का उन पर त्यागपत्र देने के लिए बनाया गया दबाव उनके त्यागपत्र न देने का कारण बना।
[21]
युवा-तुर्क कहलाने वाले नेताओं चन्द्र शेखर, कृष्ण कान्त, मोहन धारिया, राम धन, चन्द्रजीत यादव, लक्ष्मीकान्तम्मा ने इस समय तक भी इन्दिरा गाँधी और जयप्रकाश नारायण के मध्य चल रहे इस गतिरोध और प्रतिरोध को शान्त करने के लिए प्रत्येक सम्भव प्रयास किए। किन्तु, यह हुआ नहीं।
24 जून 1975 को, सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने इन्दिरा गाँधी को सशर्त रोक लगाते हुए निर्णय दिया कि उच्चतम न्यायायलय द्वारा निर्णय लिए जाने तक वे प्रधानमन्त्री बनी रह सकती हैं, किन्तु, उन्हें संसद में मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा।
रामलीला मैदान में 25 जून 1975 को सुब्रमण्यम स्वामी, जयप्रकाश नारायण, और मोरारजी देसाई
25 जून 1975 की सन्ध्या को जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, राज नारायण, नानाजी देशमुख, मदन लाल खुराना और कई अन्य राजनीतिक दिग्गजों ने दिल्ली के राम लीला मैदान में एक विशाल भीड़ को सम्बोधन करते हुए श्रीमती गाँधी को पदत्याग करने का आह्वान किया। जेपी ने सेना और पुलिस को उन आदेशों का पालन न करने के लिए प्रोत्साहित किया जिन्हें वे अवैध और असंवैधानिक मानते थे। उन्होंने राष्ट्र से कर न चुकाने का भी आह्वान किया। और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता इस का पाठ किया :—
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
इस कविता में जनसाधारण का दुःख अब भी इतना ही प्रासङ्गिक है। अब भी भारत के नेतृत्व (ध्यान दें एक व्यक्ति नेतृत्व नहीं – यह ग्राम के वार्ड पञ्च से लेकर प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति बनने के इच्छुक सभी नेता हैं) को जनहित के प्रति उचित निर्णय लेना सीखना है।
इससे इन्दिरा गाँधी और उनके सहयोगी घबड़ाहट की परिस्थिति में आ गए। और उन्होंने वह निर्णय लिया जो आपातकाल कहा जाता है। इसमें वाजपेयी जिन्होंने राज नारायण से इन्दिरा गाँधी के विरुद्ध याचिका वापस लेने को कहा; और प्रधानमन्त्री और सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के मध्य समझौते का प्रयास करने वाले चन्द्र शेखर, मोहन धारिया, राम धन, और कृष्ण कान्त भी सम्मिलित थे। “नीति विरोध न मारिए दूता” न होकर यहाँ दूत भी कोपभाजन का शिकार बने थे!
मोहन धारिया के राजनीतिक जीवन का शिखर भारत के संविधान के अड़तीसवें संशोधन का उनका कट्टर विरोध था, जिसे उन्होंने ‘आने वाली तानाशाही के सामने संसदीय लोकतन्त्र का आत्मसमर्पण’ कहते हुए किया। तब सत्तारूढ़ दल का सदस्य होते हुए भी उन्हें जेलयात्रा करनी पड़ी थी। ‘पद्म विभूषण ‘ मोहन धारिया को 2011 में राष्ट्रीय एकता के लिए ‘इन्दिरा गाँधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया!
रामलीला मैदान की जनसभा के उपरान्त रात्रिभोज के समय सुब्रमण्यम स्वामी ने सादे कपड़ो में पुलिस को देखा और इस बारे में जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को इस बारे में आगाह किया। मोरारजी देसाई ने कहा कि इन्दिरा गाँधी इतनी मूर्ख नहीं कि वे उन्हें गिरफ्तार करेंगी। मोरारजी देसाई गलत थे! इन्दिरा गाँधी को ‘मूर्ख’ न समझने की मूर्खता इस आन्दोलन के शीर्ष नेताओं ने की। स्वामी उन्हें चेता कर एक सादी वर्दी वाले पुलिस कर्मी की सहायता से भूमिगत हो गए। कुछ महीने सरदार के रूप में बिताकर गुजरात में नरेन्द्र मोदी (जो तब एक स्वयंसेवक थे) से मिलते हुए कोलम्बो होते हुए अमेरिका पहुँच गए। उनका पासपोर्ट भारत सरकार ने निरस्त कर दिया था फिर भी हार्वर्ड विश्वविद्यालय के माध्यम से हेनरी किसिंजर की सहायता से उन्हें अमेरिका में प्रवेश मिला। आपातकाल में ही पुनः भारत लौटकर 10 अगस्त 1976 अविश्वसनीय रूप से वह राज्य सभा में आकर अपना भाषण देकर पुनः अन्तर्धान भी हुए, किन्तु, श्रीमती इन्दिरा गाँधी के हाथ न लगे। इस बार उनके शिष्य रहे नेपाल के राजा बीरेन्द्र की सहायता से नेपाल होते हुए पुनः हार्वर्ड।
[
इस पर 15 नवम्बर 1976 को श्रीमती गाँधी ने उनकी राज्यसभा की सदस्यता निरस्त करवा दी।
[24]
वैसे, जयप्रकाश नारायण को राजनीति में सुब्रमण्यम स्वामी ही पुनः लाए; और उन्हीं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक सङ्घ, जनसङ्घ, और समाजवादी दलों की खिचड़ी पकाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मोरारजी देसाई उस समय वे गुजरात के चुने गए मुख्यमन्त्री थे। सम्भवतः मोदी भी श्रीमती गाँधी का अनुकरण करते हुए मेरे हमनाम मुख्यमन्त्री को गिरफ्तार करने की ‘मूर्खता’ करने वाले हैं।
श्रीमती इन्दिरा को जो राहत दी गई थी; उसका उन्होंने भरपूर दुरुपयोग किया। विशेषकर सरकारी तन्त्र को जनसाधारण के विरुद्ध प्रयोग किया। नौसिखिये मोदी अब भी उस स्तर तक पहुँचने में असमर्थ हैं। अपने कृत्यों को वैधानिकता का जामा पहनाने के लिए किया अड़तीसवाँ संशोधन बाबा साहेब और श्यामाप्रसाद मुखर्जी वाले संविधान में नहीं था।
आपातकाल हो अथवा नहीं; अपनी संवैधानिक शक्ति का दुरुपयोग अनुचित है। जिन उदाहरणों में मोदी को अपनी संवैधानिक शक्ति का दुरुपयोग करने का दोषी कहा जाता है; उनका उससे कहीं बड़े स्तर पर श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने दुरुपयोग किया।
यहाँ एक बात भी दृष्टव्य है; कि जब समझौते की वार्ता चली तो “सम्पूर्ण क्रान्ति” के नेतृत्व ने श्रीमती गाँधी का कमतर आकलन कर एक समझौते के लिए मना कर दिया जोकि यह बिहार के छात्र-नेताओं के साथ विश्वासघात होता। इस आपातकाल के कोपभाजन का शिकार हुए इन छात्र-नेताओं से ही पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों का ही खेमा सुसज्जित है।
यह इस काल में शीर्ष पर रहे दोनों पक्षों के कुछ नेताओं के अपने अहंकार को बनाए रखने का परिणाम रहा। और इसका दुष्प्रभाव देश को व्यापक रूप से झेलना पड़ा। समझौता होने पर बहुत सम्भव है कि श्रीमती गाँधी त्यागपत्र दे देतीं और बाबू जगजीवन राम अथवा चव्हाण प्रधानमन्त्री होते! और हो सकता है दो प्रधानमन्त्री आतङ्क के शिकार होने से बच जाते। किन्तु, जो हुआ नहीं उस पर क्या रोना?
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के काल में भी कुछ आन्दोलन हुए हैं, जिसे उनके समर्थकों निरर्थक मानते हैं; वहीं विपक्षी दल इसकी आलोचना करते हैं। इसी प्रकार का एक आन्दोलन किसान आन्दोलन रहा। जिसमें 301 दिन तक गतिरोध चलता रहा। यद्यपि प्रधानमन्त्री ने किसी भी सरकारी तन्त्र को इस आन्दोलन में सम्मिलित किसानों के विरुद्ध बल-प्रयोग के लिए नहीं किया; अतः कोई व्यक्ति सरकारी गोली से नहीं मरा। पुलिस तन्त्र को ललकारने पर भी पुलिस की ओर से कोई बल-प्रयोग नहीं हुआ; इसकी प्रशंसा तो करनी होगी। किन्तु, दोनों पक्षों का अपनी बात मनवाने को अड़ जाना अच्छा नहीं रहा। इसमें मैं आपातकाल के पूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी तथा “सम्पूर्ण क्रान्ति” आन्दोलन के नेताओं के बीच के गतिरोध के रूप में देखता हूँ। इसमें विभिन्न कारणों से आन्दोलन में सम्मिलित लगभग 700 लोगों के जीवन की आहुति चढी;
यद्यपि सरकार ने बल प्रयोग नहीं किया; फिर भी दोनों पक्षों के अहंकार का मूल्य उन व्यक्तियों को चुकाना पडा जोकि इस आन्दोलन में भाग लेने आए उन व्यक्तियों ने चुकाई जो यह विश्वास लेकर आए कि सरकार और उनके नेता आपस में बातचीत कर शीघ्र ही कोई समाधान निकालेंगे। किन्तु, मानव जीवन के मूल्य को अपने अहंकार के मानदेय से कम आकलन कर दोनों ही पक्षों के नेताओं ने धोखा ही किया। यद्यपि नरेन्द्र मोदी की सरकार पीछे हटी, किन्तु, इस निर्णय पर पहले ही आपसी विमर्श से पहुँचा जा सकता था। यहाँ जहाँ श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने आपातकाल लगाकर सम्पूर्ण विपक्ष को जेल में डाल दिया, वहीं, नरेन्द्र मोदी ने पीछे हटकर वह ऐतिहासिक भूल नहीं दोहराई। इतना होते हुए भी लम्बे गतिरोध से जिस जन-जीवन की हानि हुई वह अपूरणीय क्षति है; न तो वर्तमान सरकार न ही विपक्ष ही इसकी कमीं पूरी कर पाएगा; अड़ियल रवैया दुर्भाग्य से दोनों ही का रहा। इसी के चलते प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को लोकतन्त्र का आदर्श नहीं कह सकते हैं। श्रीमती इन्दिरा गाँधी का रवैया मोदी की तुलना में कहीं अधिक लोकतन्त्र विरोधी रहा
लोकतन्त्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए नेताओं और जनता में संवाद बना रहना चाहिए। यदि कोई आन्दोलन चलता है तो इसका निराकरण जितना शीघ्र हो उतना ही उचित है। आपातकाल के पीछे की कहानी और किसान आन्दोलन के उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि यह स्थितियाँ लम्बे समय तक चले गतिरोध से बनीं; और आन्दोलनकारियों के नेतृत्व तथा सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों के अहंकार के टकराव से यह परिस्थितियाँ बिगड़ गईँ। जनता और सरकार का समय रहते परस्पर संवाद और परस्पर लाभकारी समझौता करना प्रजातन्त्र की सफलता का मूल मन्त्र है। सभी पक्षों के नेताओं को मानव जीवन का मूल्य समझना और उसका मान करना सीखना होगा।
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फुटनोट
[1]
India’s dark history of sterilisation
[2]
India’s Forced Sterilization Practices Under International Human Rights Law
[3]
Emergency, When Not a Leaf Moved Unless Govt Willed it | NewsClick
[4]
Narendra Modi: Sardar Narendra ‘Singh’ Modi: When PM disguised himself as a Sikh to escape arrest
[5]
Twenty years after Emergency, five victims recalls the tainted past of Indian democracy
[6]
When a Bengaluru prison united Indira’s foes | Bengaluru News – Times of India
[7]
Forty Years Ago, June 25, 1979: Congress Expels Urs
[8]
क्या नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प है? के लिए अरविन्द व्यास (Arvind Vyas) का जवाब
[9]
India Arrests One of. Her Most Important Journalists (Published 1975)
[10]
Emergency in India: How the Press was affected in 1975-77





