भिवानी
प्लास्टिक की कुर्सी पर जय भगवान बैठे हैं। पीछे नजर आ रही दीवार पर शायद सालों पहले हरे रंग की पुताई हुई थी, अब थोड़ी-बहुत ही बची है। बॉक्सिंग वर्ल्ड चैंपियन बेटी नीतू घणघस का जिक्र आते ही मुस्कुराकर कहते हैं, ‘अजी वो तो स्कूल में लड़कों को पीट देती थी। जिस बस से स्कूल जाती, उसमें रोज लड़कों से मारपीट करती थी। लड़के रोते हुए आते और इसकी मां से शिकायत करते। मैंने तो तंग आकर इसे बॉक्सर बना दिया था।’
ये कहानी देखी-सुनी सी लगती है। ‘दंगल’ फिल्म की गीता-बबीता जैसी, जगह भी हरियाणा है। दो कमरों का एक घर है, लोअर मिडिल क्लास परिवार है। एक पिता भी हैं, जिन्होंने बेटी की प्रैक्टिस के लिए नौकरी से अनपेड लीव ली, तो सस्पेंड हो गए। मां भी हैं मुकेश देवी, जिन्हें दिन-रात रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों ने ताने दिए। कहा- ‘ऐसे मार-पीट के खेल खेलेगी तो शादी कौन करेगा इससे?’
लेकिन अब सवालों के जवाब मिल गए हैं। जय भगवान चुपचाप कोने में बैठे मुस्कुरा रहे हैं, बीच-बीच में कुछ सवालों के जवाब भी देते हैं, उनके चेहरे पर एक संतोष है। मां भी खुश हैं और नीतू घर में एक चारपाई पर बैठी हैं। नीतू ने भी जीतते ही कहा कि इनाम के पैसों से वो सबसे पहले उधार चुकाएंगी। अब वो लोगों के लिए ‘म्हारी छोरी’ हैं, जो ‘सोणा’ लेकर आई है।
सीन : 25 मार्च, 2023
दिल्ली का इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स
कमेंटेटर जोर-जोर से बोल रहे हैं- ‘हमारे प्यारे हिंदुस्तान से नीतू घणघस… जी हां, स्वर्ण पदक विजेता बनी हैं भारतीय मुक्केबाज नीतू। 5-0 से इस मुकाबले को जीतने में कामयाब हुई हैं। ये खुशी के आंसू हैं नीतू की आंखों में।’
15 से 26 मार्च तक दिल्ली के इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में IBA विमेंस वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप हुई थी। 25 मार्च को 22 साल की नीतू ने मंगोलिया की लुत्साइखान अल्तांत्सेत्सेग को हराकर 48 किलो वेट कैटेगरी में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीत लिया।

नीतू वर्ल्ड चैंपियन बनने वाली छठी भारतीय (महिला-पुरुष) मुक्केबाज हैं। उनसे पहले मैरी कॉम, सरिता देवी, जेनी, लेखा केसी और निखत जरीन यह खिताब जीत चुकी हैं।
हरियाणा की एक लड़की के वर्ल्ड चैंपियन बनने की कहानी क्या है, ये जानने हम दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर भिवानी पहुंचे।
‘म्हारी छोरी देस के लिए सोणा जीत के आ रही है’
जगह- भिवानी बॉक्सिंग क्लब (BBC)। हमने नीतू से बात करना चाहा तो पता चला कि 31 मार्च, 2023 यानी शुक्रवार को उनके सम्मान में कोच जगदीश सिंह ने एक प्रोग्राम रखा है। ये वही क्लब है जहां नीतू साल 2012 से ट्रेनिंग ले रही हैं। क्लब के दरवाजे पर लोगों की भीड़ थी। बच्चे, बूढ़े और महिलाएं सभी हाथ में मालाएं लिए खड़े थे। हमने पूछा कौन आ रहा है, एक बूढ़ी महिला चहकते हुए बोलीं- ‘म्हारी छोरी देस के लिए सोणा जीत के आ रही है। उसके लिए आए हैं।’
यहीं हमें नीतू की मां मुकेश देवी मिलीं। उनकी आंखें भी जीत के बाद बेटी से मिलने के इंतजार में थीं। नीतू की कार आकर रुकी। साथी बॉक्सर और कोच उनके साथ थे। ढोल-ताशे की आवाज गूंजने लगी। नीतू को आशीर्वाद देने सिर्फ उनके ही नहीं, आसपास के गांव के लोग भी पहुंचे थे। भीड़ ज्यादा थी, इसलिए नीतू के पिता ने धीरे से कहा- ‘आप कल घर आइए, वहीं आराम से सब बताएंगे।’
दो कमरों के घर से निकली वर्ल्ड चैंपियन
1 अप्रैल यानी शनिवार को हम सुबह-सुबह ही नीतू के गांव धनाना पहुंच गए। घर पर भी बधाई देने लोग आए थे। गेट से घुसते ही नीतू की मां और पिताजी मिल गए। मेन गेट से घुसते ही छोटा सा बरामदा है। यहीं एक कोने में चूल्हे पर घर आए रिश्तेदारों और मेहमानों के लिए चाय चढ़ी हुई थी। आस-पास सामान भी था।

धनाना गांव में नीतू का घर। ये दिखने में जरूर बड़ा लगता है, लेकिन इसमें दो ही कमरे हैं। इसी घर में नीतू के दादा-दादी, माता-पिता, नीतू और उनका भाई अक्षित रहते हैं। एक बहन शिमला में रहती हैं।
घर के नाम पर दो कमरे हैं। बाईं तरफ एक कमरा है। जिसमें एक छोटा पलंग, एक टेबल और 4-5 प्लास्टिक की कुर्सी रखी थीं। दीवारों पर कभी रंग हुआ था, अब पुताई झड़ चुकी है। कमरे में एक तरफ अपने माता-पिता के साथ नीतू की एक तस्वीर लगी है।
नीतू अंदर वाले कमरे से निकलकर आईं और ठीक हमारे सामने चारपाई पर बैठ गईं। पिता से धीरे से कुछ कहा, फिर ठहाका मारकर हंसती हैं। इस जीत के बाद भी नीतू 23 साल की आम लड़की ही नजर आईं।
एक टाइम था, जब लगा बॉक्सिंग का करियर खत्म हुआ: नीतू
नीतू शुरुआत में सारे सवालों के जवाब रटे-रटाए अंदाज में देती हैं। शायद जीत के बाद बहुत मीडिया वाले आए, तो लगातार ऐसे ही सवाल पूछे होंगे। हम घर के आर्थिक हालात से जुड़ा सवाल करते हैं तो जैसे कोई दर्द उनकी आंखों में उतर आता है।
संभलते हुए कहती हैं- ‘मैं किसान परिवार से हूं। परिवार तो दो वक्त की रोटी और दूध-दही ही दे सकता था। स्पोर्ट्स के लिए एक्स्ट्रा डाइट चाहिए थी, जिसका इंतजाम नहीं था। आप ऐसे परिवार से हो, तो कुछ करने की भूख बढ़ जाती है। मैं भी सोचती थी कि परिवार इतना कर रहा है, मैं भी कुछ तो करूं, जिससे इन्हें मुझ पर गर्व हो।’
नीतू आगे बताती हैं, ‘पापा ने मुझसे कहा था कि किसी भी फील्ड में जाओ तो उसका मास्टर बनो। एक चीज करो और उसमें परफेक्ट बनो। मैंने वही किया।’
थोड़ा ठहरकर फिर बोलती हैं, ‘ऐसा नहीं है कि चैलेंज नहीं आए। खिलाड़ी की जिंदगी तो ऐसी ही होती है। 2019 की बात है। खेलते समय शोल्डर इंजरी हो गई। 2 साल तक बॉक्सिंग नहीं कर पाई। एक टाइम था जब लगने लगा था कि वापसी नहीं कर पाऊंगी। पापा न होते तो शायद आज ये मेडल न होता।’
‘रिश्तेदार कहते थे नौकरी बचा ले, मैंने किसी की नहीं सुनी’
नीतू बोल ही रही थीं कि उनकी मम्मी आ गईं। वे फिर अतीत से लौट आईं और मुस्कुराकर घर आए लोगों से मिलने लगीं। नीतू के पिता जय भगवान हमारी बातचीत सुन रहे थे, वे नीतू की छोड़ी कहानी को आगे बढ़ाते हुए कहने लगे, ‘3 साल तक नीतू को कोई मेडल नहीं मिला था। मैं चंडीगढ़ विधानसभा में नौकरी करता था।’
‘एक दिन चंडीगढ़ से लौटा तो वो बोली- ‘पापा मैं बॉक्सिंग छोड़ दूं? तीन साल हो गए, कोई मेडल तो आ नहीं रहा। क्या फायदा बॉक्सिंग करके? मैंने कहा- ‘मैं अपनी नौकरी छोड़ सकता हूं, लेकिन तुम बॉक्सिंग मत छोड़ो।’ कहते-कहते वे चुप हो गए।
जय भगवान आगे बताते हैं, ‘मैंने नीतू के लिए 3-4 साल की अनपेड लीव ले ली। बेटी को रोज सुबह चार बजे और शाम को फिर से चार बजे भिवानी लेकर जाता था। ट्रेनिंग चलती रहती तो क्लब के बाहर खड़ा रहता। दिन-रात इसी में बीतता था। मेरा अपना भाई मुझसे कहता था कि अपनी नौकरी बचा ले। घर का खर्चा चलाने के लिए लोन लिया, नीतू की मां की सोने की चेन भी बेचनी पड़ी।’
जो रिश्तेदार ताने मारते थे, अब बधाई दे रहे
जय भगवान को चुप देखकर नीतू की मां मुकेश बोलने लगती हैं। कहती हैं- ‘परेशानी तो बहुत आई, लेकिन हमें तो बेटों से प्यारी बेटी है। रिश्तेदार पहले ताना मारते थे, अब वही लोग बधाई देने आते हैं। कहते हैं कि बेटी ने कमाल कर दिया। नीतू जैसी बेटियां हर घर में होनी चाहिए, जो देश के लिए मेडल लाएं।’
कोच, जिसने भिवानी को बनाया ‘मिनी क्यूबा’
नीतू के परिवार से मिलकर हम नीतू के कोच द्रोणाचार्य अवॉर्डी जगदीश सिंह से मिलने भिवानी पहुंचे। उनके बॉक्सिंग क्लब की वजह से भिवानी को भले ही ‘मिनी क्यूबा’ कहा जाने लगा हो, लेकिन उसके सामने की सड़क पर पड़े गड्ढे इस बात का एहसास नहीं दिलाते।
जब हम पहुंचे तो बॉक्सर्स का मॉर्निंग प्रैक्टिस सेशन खत्म हो चुका था। सभी अपने कमरे में नाश्ता करने पहुंच रहे थे। ब्रेकफास्ट और रेस्ट के बाद आफ्टरनून प्रैक्टिस सेशन होने वाला था। ब्रेक के दौरान हमने कोच जगदीश सिंह से बातचीत की।

नीतू के कोच जगदीश सिंह भिवानी में बॉक्सिंग क्लब चलाते हैं। वे विजेंदर सिंह और अखिल कुमार जैसे स्टार बॉक्सर को भी ट्रेनिंग दे चुके हैं।
‘मैं लड़कियों की बॉक्सिंग के खिलाफ था’
कोच जगदीश कहते हैं, ‘मैं लड़कियों की बॉक्सिंग के खिलाफ था। साल 2002 की बात है। मैं SAI (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ट्रेनिंग सेंटर, भिवानी में कोच था। ग्राउंड के बाहर 4 लड़कियां खड़ी थीं, मुझे देख रही थीं। उनका लुक टॉमबॉय था, मतलब बाल छोटे थे और कपड़े भी लड़कों वाले पहने हुए थे।’
‘मेरा ट्रेनिंग सेशन खत्म होते ही वो मेरे पास आईं और कहा कि हम आपके साथ ट्रेनिंग करना चाहते हैं। मैंने कहा कि ये सेंटर सिर्फ लड़कों के लिए है। मैं खुद भी नहीं चाहता कि लड़कियां बॉक्सिंग करें। उन्होंने कहा कि आप एक बार देख लीजिए। मैंने अनमने ढंग से हां कह दिया।’
जगदीश आगे बताते हैं, ‘मैं अप्रैल के महीने में रेतीली जमीन पर बहुत ही मुश्किल ट्रेनिंग करवाता था। मैंने सोचा कि 5-6 दिन में ये लड़कियां खुद चली जाएंगीं। उन्हें एक हफ्ते का टाइम देते हुए साफ कह दिया कि ये ट्रेनिंग पूरी करोगी, तभी आपको बॉक्सिंग सिखाऊंगा।’
‘मैंने उनसे छुटकारा पाने के लिए कोर्ट से एफिडेविट तक बनवाएं, जिसमें लिखा था कि वो अपने रिस्क पर यहां रह रही हैं और उनकी ट्रेनिंग का सारा क्रेडिट मेरा (कोच जगदीश सिंह) है। उन्होंने एफिडेविट भी बनवा लिए। अब मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था। मैंने उन्हें ट्रेनिंग देना शुरू किया।’

कोच जगदीश सिंह शुरुआत में लड़कियों से इस तरह के एफिडेविट बनवाते थे। ये एफिडेविट 2002 में शर्मिला नाम की लड़की ने दिया था।
‘उनकी मेहनत देखी तो लगा, लड़कियों में दम है’
कोच जगदीश के मुताबिक, भिवानी में बॉक्सिंग क्लब के पास में उन लड़कियों ने एक रूम ले लिया। उनका हाऊस नंबर 92 था। उसी के पास हाऊस नंबर 93 में मेरा एक रिश्तेदार रहता था। एक दिन मैं ट्रेनिंग करवाकर रास्ते में रिश्तेदार से मिलने रुक गया। तभी मैंने उन चारों में से एक लड़की को एक पॉलिथीन में कुछ ले जाते देखा। तब तक मुझे नहीं पता था कि वो चारों वहां रहती हैं। मैं उसके पीछे उसके रूम तक गया।’
‘वहां देखा कि पॉलिथीन साइड में रखकर वो लड़की बिस्तर पर लेट गई। उसकी बाकी 3 साथी भी पहले से बिस्तर पर लेटी हुई थीं। उस पॉलिथीन में उनका ब्रेकफास्ट था। ट्रेनिंग के बाद वो इतना थक गईं कि नाश्ता नहीं कर पाईं। कुछ भी हो, लेकिन उन्होंने ट्रेनिंग नहीं रोकी। 7 दिन की ट्रेनिंग भी पूरी की। इसके बाद मुझे लगा कि इन लड़कियों में दम तो है। वो लड़कियां नेशनल में चैंपियन भी रहीं। इसके बाद मैंने लड़कियों को ट्रेनिंग देने का फैसला लिया।’
नीतू के मेडल से रजनी और बंटी की उम्मीद बढ़ी
कोच जगदीश से बातचीत के बाद हम फीमेल बॉक्सर्स के ट्रेनिंग सेशन में पहुंचे। यहां हमारी मुलाकात कुछ ऐसी बॉक्सर्स से हुई, जो नीतू के साथ ट्रेनिंग करती हैं। रजनी, यूपी के अयोध्या से यहां ट्रेनिंग करने आई हैं। मेडिकल की स्टूडेंट थी, लेकिन पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था। एक मैगजीन मिली, जिसमें कोच जगदीश और ‘मिनी क्यूबा’ का जिक्र था। मन बनाया और 2014 में भिवानी चली आईं, अब गोल्ड मेडल लाने का एक सपना उनका भी है।
इस बॉक्सिंग क्लब में देश के छोटे-छोटे शहरों से सपने लेकर आईं लड़कियां हैं। हमें दिल्ली, जमशेदपुर और हरियाणा के दूसरे इलाकों से आईं लड़कियां मिलीं। इन्हीं में शिवानी और बंटी भी शामिल हैं।हम लौटने लगतीं हैं तो बंटी रोकते हुए कहती हैं- ‘हरियाणा बदल रहा है, अब पहले वाली बात नहीं रही। हमारे मां-बाप ही सबसे बड़े सपोर्टर हैं। अब उम्मीद है कि कुछ कर लेंगे।’ बंटी की ये उम्मीद लिए हम दोनों लौट आती हैं।





