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*कैसे मिटा दिया जा रहा है नौकरियों में आरक्षण ?*

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-तेजपाल सिंह तेज

            भारतीय संविधान में आरक्षण व्यवस्था एक सामाजिक न्याय की परियोजना है, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित और शोषित समुदायों—विशेषकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)—को समता, अवसर और गरिमा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू की गई थी। यह नीतिगत उपाय इसलिए जरूरी माना गया क्योंकि सदियों तक जाति आधारित भेदभाव ने इन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संसाधनों से दूर रखा। लेकिन आजादी के 75 वर्ष बाद, जब तक आरक्षण से कुछ लोग मुख्यधारा में आ ही पाए थे, तब तक उसे समाप्त करने या निष्प्रभावी करने के नए-नए रास्ते खोजे जाने लगे। नौकरियों में आरक्षण को प्रत्यक्ष रूप से हटाना कठिन था, इसलिए उसे नियोजन प्रक्रिया से ही बाहर करने के कई अप्रत्यक्ष और चालाक रास्ते अपनाए जा रहे हैं। यह लेख इसी प्रश्न का विस्तार से विश्लेषण करता है– नौकरियों में आरक्षण को कैसे मिटाया जा रहा है? इसके लिए हम कानूनी, प्रशासनिक, सांख्यिकीय और वैचारिक उपायों को समझेंगे।

1. स्थायी नौकरियों का खत्म किया जाना:

·        सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था केवल स्थायी पदों (permanent jobs) पर लागू होती है। लेकिन पिछले दो दशकों से केंद्र और राज्य सरकारें नियमित भर्तियों की बजाय ठेके पर नियुक्ति, आउटसोर्सिंग, संविदा और अस्थायी नियुक्तियों को बढ़ावा दे रही हैं।

·        शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, क्लर्क, सुरक्षा गार्ड, डाटा एंट्री ऑपरेटर—सभी पदों पर अब संविदा आधारित भर्ती की जाती है, जिनमें आरक्षण लागू नहीं होता।

·        यह “नियोजन के बिना आरक्षण” की नीति है—जब पद ही स्थायी नहीं होंगे, तो आरक्षण किस पर लागू होगा?

2. पदों का अकारण’ समाप्त किया जाना:

          कई विभागों में पदों को “अवांछनीय” या “अनावश्यक” बताकर समाप्त कर दिया गया है–

·        रेलवे, डाक विभाग, बैंकिंग, बीमा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई—इनमें लाखों पद खाली हैं, लेकिन उन्हें भरने की बजाय समाप्त किया जा रहा है।

·        2022 में संसद में सरकार ने स्वीकार किया कि केंद्र सरकार में करीब 10 लाख पद खाली हैं, लेकिन नियमित भर्तियाँ नहीं हो रही हैं।

यह नीति आरक्षण को मिटाने का एक सांख्यिकीय हथियार है—जब पद ही नहीं होंगे, तो आरक्षित वर्गों को अवसर कैसे मिलेगा?

3. निजीकरण और कॉर्पोरेटीकरण:

          आरक्षण संविधान द्वारा केवल सरकारी सेवाओं में लागू है। लेकिन सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, संस्थानों और सेवाओं को लगातार निजी हाथों में सौंप रही हैं–

·        एयर इंडिया, बीएसएनएल, रेलवे के कई हिस्से, बीमा कंपनियाँ, बैंक शाखाएँ—इन सबका निजीकरण हो चुका है या चल रहा है।

·        निजी संस्थानों पर आरक्षण लागू नहीं होता, और इस तरह लाखों संभावित आरक्षित पद निजी क्षेत्र में जाकर आरक्षण से मुक्त हो जाते हैं।

यह प्रक्रिया आरक्षण के अधिकार को कॉर्पोरेट नीति से बदलने का तरीका हैजहां लाभ और जाति न्याय एक-दूसरे के विरोध में खड़े कर दिए जाते हैं।

4. संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी और न्यायिक नज़रिए में बदलाव:

·        पहले न्यायपालिका आरक्षण की रक्षा करती थी, लेकिन अब उसका दृष्टिकोण बदलता दिखता है।

·        2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण ‘मूल अधिकार नहीं है’, और राज्य सरकारें चाहें तो लागू करें या न करें।

·        इंदिरा साहनी केस (1992) में 27% OBC आरक्षण को मंजूरी देने वाली न्यायपालिका अब OBC आरक्षण की गणना की मांग (कैस्ट सेन्सस) को अस्वीकार कर रही है।

यह वैचारिक मोड़ हैजहाँ सामाजिक न्याय अब संवैधानिक प्राथमिकता नहींबल्कि “नीति” का मामला बना दिया गया है।

5. आरक्षण विरोधी विमर्श और मीडिया का प्रचार:

·        आरक्षण को ‘अयोग्यता का पुरस्कार’, ‘न्याय में बाधा’, ‘मेधा की हत्या’ जैसे शब्दों से प्रचारित किया गया है।

·        टीवी डिबेट्स और सोशल मीडिया पर दलित-पिछड़ों को “फ्री के लाभार्थी” कहा जाता है, जिससे जनमानस में आरक्षण के खिलाफ गुस्सा फैलता है।

·        अगड़ी जातियों में यह भावना विकसित की गई कि आरक्षण “हमें नौकरियाँ छीन रहा है”, जबकि सच्चाई यह है कि आरक्षण का दायरा बहुत सीमित है।

यह प्रचार रणनीति समाज को आरक्षण-विरोधी बनाने का एक महत्वपूर्ण औजार है।

6. प्रमोशन में आरक्षण का खात्मा:

·        संविधान में नौकरियों में प्रमोशन में भी आरक्षण की व्यवस्था थी।लेकिन कई राज्यों में इसे न्यायालय के आदेशों और सरकारी नीतियों के ज़रिए निष्प्रभावी कर दिया गया है।

·        SC के कई कर्मचारी वर्षों तक प्रमोशन से वंचित रहते हैं, क्योंकि प्रमोशन से पहले ‘प्रतिनिधित्व की जांच’, ‘प्रशासनिक दक्षता’ जैसे बहाने लाद दिए जाते हैं।

यह ऊर्ध्वगामी सामाजिक गतिशीलता को रोकने का एक चुपचाप चलता हुआ ढाँचा है।

7. एक देशएक मेरिट’ की संकल्पना:

·        नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और नई भर्ती प्रणालियाँ जैसे CUET, Agnipath, NTA—इनमें मेरिट का नया ढांचा खड़ा किया गया है।

·        “सबके लिए समान परीक्षा” की बात कहकर यह अनदेखा किया जाता है कि सामाजिक-सांस्कृतिक विषमता में समान परीक्षा असमान प्रभाव डालती है।

·        गाँव के दलित बच्चे और शहर के पब्लिक स्कूल में पढ़े बच्चे को एक ही मापदंड पर आँकना ग़लत है—लेकिन यही किया जा रहा है।

यह “मेरिट के नाम पर मनुवाद” को पुनर्स्थापित करने की चतुर योजना है।

8. जाति आधारित जनगणना से इनकार:

·        1931 के बाद भारत में जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है।

·        OBC की आबादी क्या है, वे किन पदों पर हैं, उनका प्रतिनिधित्व कितना है—इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा सरकार के पास नहीं है।

·        जब तक आंकड़े नहीं होंगे, तब तक “आरक्षण भर गया है” या “प्रतिनिधित्व पर्याप्त है” जैसे झूठ फैलाना आसान रहेगा।

यह आंकड़ों की अनुपस्थिति के ज़रिए नीति निर्धारण को अंधा बनाने की चाल है।

9. आर्थिक आधार पर आरक्षण (EWS) की चाल:

·        2019 में सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण (EWS) दिया गया, जबकि वे पहले से ही कुल नौकरियों के बड़े हिस्से पर काबिज हैं।

·        यह कदम आरक्षण की मूल अवधारणा—सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन—के विपरीत है।

·        इसके जरिए आरक्षण को ‘गरीबी उन्मूलन योजना’ बना दिया गया, जिससे जाति आधारित असमानता की वास्तविकता छिपा दी गई।

·        EWS आरक्षण असल में दलित-पिछड़ा आरक्षण को हल्का और अप्रासंगिक बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है।

निष्कर्षत: यह मिटाना नहींधीमा विष है:

          आरक्षण को आज के भारत में सीधे खत्म करना संभव नहीं है, क्योंकि उसका संवैधानिक संरक्षण बहुत मजबूत है। लेकिन उसकी आत्मा को मारने, प्रभाव को कम करने, और लाभार्थियों को हतोत्साहित करने की बहुआयामी योजनाएं चल रही हैं। यह सामाजिक न्याय की धारा को सूखा देने की प्रक्रिया है, जो दिखती नहीं पर गहरे असर डालती है। संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर ने कहा था — “Reservation is not a charity. It is a compensation for historical injustice.” जब तक यह बात समाज और सरकार समझने को तैयार नहीं होंगे, तब तक आरक्षण एक राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष बना रहेगा।

समाप्ति से पहले एक सवाल:

·        क्या आरक्षण को खत्म करने की यह प्रक्रिया दरअसल जाति व्यवस्था को स्थायी बनाए रखने की योजना नहीं है?

·        यह प्रश्न हमें सोचना चाहिए—और उत्तर के लिए संगठित संघर्ष करना चाहिए।

क्या आरक्षण को खत्म करने की यह प्रक्रिया दरअसल जाति व्यवस्था को स्थायी बनाए रखने की योजना नहीं है?

            हाँ, यह प्रश्न न केवल बिल्कुल सही है, बल्कि आज की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की असलियत को उजागर करता है। आरक्षण को समाप्त करने या निष्प्रभावी करने की प्रक्रिया दरअसल जाति व्यवस्था को बनाए रखने और मजबूत करने की एक सुविचारित योजना का हिस्सा है।

            भारतीय संविधान ने जब अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण का अधिकार दिया, तो उसका उद्देश्य केवल कुछ नौकरियाँ या सीटें सुरक्षित करना नहीं था, बल्कि सदियों पुराने जातिगत उत्पीड़न और बहिष्कार की व्यवस्था को तोड़ना था। आरक्षण एक सामाजिक सुधार की परियोजना थी—ऐसा कदम जो सामाजिक न्याय की दिशा में पहला ठोस और संस्थागत प्रयास था।

            लेकिन जैसे-जैसे दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय शिक्षा और नौकरियों के ज़रिए मुख्यधारा में आने लगे, वैसे-वैसे आरक्षण के खिलाफ़ एक संगठित, बहुपरतीय और वैचारिक मोर्चा भी खड़ा हो गया। यह विरोध केवल नीति का नहीं, बल्कि सत्ता और विशेषाधिकार खोने के भय का प्रतिबिंब है। आज जब यह बहस बार-बार उठती है कि आरक्षण अब खत्म कर देना चाहिए, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है—क्या यह दरअसल जाति व्यवस्था को ही स्थायी बनाने की योजना है? क्या आरक्षण हटाने की माँग करने वाले जाति व्यवस्था को भी मिटाने के लिए तैयार हैं?

            आइए इस बात को ऐतिहासिक, वैचारिक और सामाजिक दृष्टिकोण से विस्तार से समझते हैं:

1. आरक्षण जाति-व्यवस्था को नहींजातिगत भेदभाव को चुनौती देता है:

·        भारत में जाति व्यवस्था जन्म पर आधारित सामाजिक असमानता का ढांचा है, जिसमें ऊँची जातियों को जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त हैं।

·        आरक्षण इसी व्यवस्था के खिलाफ एक सुधारात्मक उपाय (affirmative action) है, जो वंचितों को समान अवसर देने की कोशिश करता है।

·        जब आप आरक्षण को हटाते हैं, तो आप समान अवसर के उस एकमात्र पुल को भी तोड़ देते हैं, जो जाति व्यवस्था के खिलाफ चलने की ताकत देता है।

·        इसलिए आरक्षण को हटाना या कमजोर करना दरअसल जाति विशेष के सामाजिक प्रभुत्व को स्थायी बनाना है।

2. जाति नहीं होनी चाहिए’ कहने वाले खुद जाति से लाभ ले रहे हैं:

            जब दलित-पिछड़े आरक्षण की माँग करते हैं, तब कहा जाता है — “हमें जाति नहीं देखनी चाहिए, सब बराबर हैं।” लेकिन वही लोग विवाह, सामाजिक संबंध, मंदिर, भोजन, आवास, स्कूल—हर क्षेत्र में जाति को पूरी तरह बनाए रखते हैं। क्या आपने कभी देखा कि सवर्णों के मोहल्लों में दलितों को बिना भेदभाव के मकान मिलते हों? क्या मंदिरों में हर कोई बराबरी से पूजा कर सकता है? जो लोग जाति को मिटाना नहीं चाहते, वे आरक्षण को मिटाने की बात कर रहे हैं।

3. जाति व्यवस्था को समाप्त करने का अर्थ है सत्ता के ढाँचे को तोड़ना:

·        जाति व्यवस्था केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं है; यह सत्ता, ज्ञान और संसाधनों पर नियंत्रण का ढांचा है।

·        अगड़ी जातियाँ शिक्षा, भूमि, नौकरियाँ, न्यायपालिका, मीडिया और प्रशासन पर ऐतिहासिक रूप से काबिज रही हैं।

·        आरक्षण इस शक्ति-संरचना को थोड़ा-थोड़ा खोलता है, जिससे उनका वर्चस्व खतरे में पड़ता है। इसलिए वे आरक्षण को ख़त्म करना चाहते हैं, ताकि सत्ता-संपत्ति उनके हाथों में ही बनी रहे।

4. क्या जाति समाप्त हो गई है?

        नहीं…जाति आधारित बलात्कार, हत्या, बहिष्कार, भेदभाव—आज भी जारी है।

दलितों के खिलाफ अत्याचारों के आँकड़े हर साल बढ़ रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1.3 करोड़ से अधिक लोग आज भी हाथ से मैला ढोने जैसे जातिगत पेशों में लगे हुए हैं।

जब जाति का दुख जिंदा हैतो आरक्षण को अनावश्यक’ कहना एक असंवेदनशील और जातिवादी दृष्टिकोण है।

5. आरक्षण हटाओ अभियान = जाति संरचना बचाओ योजना:

आरक्षण विरोधी अभियान इस मिथक पर टिका है कि इससे “योग्यता की हत्या” होती है। जबकि सच यह है कि भारत की तथाकथित ‘योग्यता’ ब्राह्मणवादी शिक्षा, अंग्रेज़ी माध्यम, कोचिंग उद्योग और जातिगत नेटवर्किंग से पैदा होती है। जब इन तमाम साधनों तक सबको बराबरी से पहुँच नहीं है, तब केवल आरक्षण को दोष देना नैतिक और तार्किक दोनों रूप से ग़लत है।

आरक्षण विरोध का अर्थ है: जो पीढ़ियों से पीछे हैंवे वहीं बने रहें।

6. डॉ. अंबेडकर की चेतावनी:

          डॉ. भीमराव अंबेडकर ने साफ कहा था — “Political power is the key to all social progress.” और यह शक्ति दलित-पिछड़ों को आरक्षण के ज़रिए ही मिलती है। इसलिए यदि आप आरक्षण छीनते हैं, तो आप जातियों के बीच सत्ता का संतुलन भी छीनते हैं और  ब्राह्मण- वादी ढाँचे को फिर से स्थापित करते हैं।

आरक्षण हटाना = जाति को स्थायी बनाना: जो लोग कहते हैं “जाति नहीं होनी चाहिए”, वे अक्सर ऐसा तभी कहते हैं जब जाति के खिलाफ आरक्षण जैसे औजार काम करने लगते हैं।

आरक्षण को हटाना सामाजिक न्याय को नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और जातिगत प्रभुत्व को स्थायी करना है। यह कोई संयोग नहीं कि आरक्षण के विरोधी कभी जातिगत विवाह या वर्णाश्रम पर सवाल नहीं उठाते—वे केवल दलितों-पिछड़ों की हिस्सेदारी पर आपत्ति जताते हैं।

          इसलिए जरूरत आरक्षण को नहींजाति को मिटाने की है। और जब तक जाति का शोषण मौजूद है, तब तक आरक्षण एक आवश्यक और नैतिक उत्तरदायित्व है—not charity, but justice.

          आरक्षण को खत्म करने की कोशिशें किसी “समानता” या “योग्यता” की सच्ची चिंता से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि वे जातिगत वर्चस्व को बनाए रखने की चालाक रणनीति का हिस्सा हैं। जब तक समाज में जातिगत असमानता, भेदभाव और उत्पीड़न मौजूद हैं, तब तक आरक्षण एक संवैधानिक न्याय है, न कि कृपा।

          जो लोग आरक्षण के खिलाफ खड़े हैं, वे जाति के अस्तित्व को चुनौती नहीं देते; वे सिर्फ उस न्याय के खिलाफ हैं जो जाति आधारित विशेषाधिकारों को थोड़ा कम करता है।

दरअसल, आरक्षण को समाप्त करने की मांग जाति को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसे बिना चुनौती के चलने देने की मांग है। इसलिए जरूरत आरक्षण हटाने की नहीं, जाति हटाने की है।

जब तक समाज में जातिगत अन्याय रहेगा, तब तक आरक्षण उसका प्रतिरोध और उत्तर रहेगा—एक ज़िंदा, जरूरी, और नैतिक उत्तर।

“आरक्षण हटाना: ब्राह्मणवादी सत्ता की पुनर्स्थापना की परियोजना?”

1. आरक्षण: सामाजिक न्याय नहींसामाजिक संघर्ष का सेतु:

          आरक्षण की व्यवस्था भारत में कोई कृपा नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक अन्याय का उत्तर है। यह व्यवस्था उन समुदायों के लिए है जिन्हें हजारों वर्षों तक शिक्षा, संपत्ति, मंदिर, न्याय और सत्ता से वंचित रखा गया। डॉ. अंबेडकर ने इसे सामाजिक न्याय की आधारशिला कहा था। उन्होंने कहा था–“Reservation is not a privilege, it is a remedy for historical injustice.”

          आरक्षण जाति व्यवस्था को कमज़ोर करने का औजार है। यह सत्ता-संसाधनों में भागीदारी का एक न्यूनतम प्रयास है। लेकिन जब इस औजार को ही निशाने पर लिया जाने लगे, तो समझना चाहिए कि उद्देश्य सामाजिक न्याय नहीं, वर्चस्व का पुनर्स्थापन है।

2. स्थायी नौकरियों का अंत = आरक्षण का खात्मा:

          आरक्षण केवल सरकारी स्थायी पदों पर लागू होता है। लेकिन पिछले 20 वर्षों में सरकारी क्षेत्र में स्थायी नियुक्तियाँ लगभग ठप कर दी गई हैं–

·        केंद्र और राज्य सरकारें संविदा (contract), आउटसोर्सिंग और ठेके पर नियुक्तियाँ कर रही हैं। जैसे शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, सुरक्षा गार्ड, कार्यालय सहायक—इन सभी पदों पर आरक्षण लागू नहीं होता, क्योंकि वे नियमित पद नहीं माने जाते।

·        सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, लाखों खाली पद नहीं भरे जा रहे हैं।

जब नौकरी ही नहीं होगीतो आरक्षण किस पर लागू होगायह “प्रत्यक्ष विरोध नहींपरोक्ष निष्कासन” की नीति है।

3. निजीकरण: आरक्षण से भागने का आसान रास्ता:

          पिछले दो दशकों में भारत में तेजी से निजीकरण और कॉर्पोरेटीकरण हुआ है —

·        एयर इंडिया, बीएसएनएल, भारतीय रेल, सार्वजनिक बैंक, बीमा कंपनियाँ—सबका आंशिक या पूर्ण निजीकरण।

·        निजी संस्थानों पर संविधान द्वारा कोई आरक्षण लागू नहीं होता।

·        जब सरकारें स्वयं अपने संस्थान निजी हाथों में दे रही हैं, तो वे दरअसल आरक्षण से पीछा छुड़ा रही हैं, और साथ ही जातिगत हिस्सेदारी की ज़रूरत को नजरअंदाज कर रही हैं।

इस तरह सामाजिक न्याय का दायरा सिकोड़ा जा रहा हैजबकि निजी पूंजी के पास जातिगत विविधता की कोई जिम्मेदारी नहीं होती।

4. न्यायपालिका और आरक्षण: वैचारिक बदलाव का संकट:

1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में 27% OBC आरक्षण को वैध ठहराया था। लेकिन हाल के वर्षों में न्यायपालिका का रुख बदलता दिख रहा है–

·        2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है।”

·        प्रमोशन में आरक्षण को लेकर कई राज्यों में अड़चनें डाली गईं।

·        2022 में 10% EWS आरक्षण को संवैधानिक ठहराते हुए, सामाजिक पिछड़ेपन की बजाय आर्थिक आधार को आरक्षण का आधार मान लिया गया।

यह बदलाव केवल न्यायिक नहींवैचारिक है। अब न्याय की भाषा में समता‘ नहींबल्कि प्रतिस्पर्धा‘ और मेरिट‘ की भाषा शामिल कर दी गई हैजो मूलतः सवर्ण वर्चस्व की रक्षा करती है

5. आरक्षण विरोधी विमर्श: जाति को छिपाओवर्चस्व बचाओ:

          आरक्षण विरोध केवल नीति का विरोध नहीं है—यह एक सक्रिय वैचारिक अभियान है–

·        टीवी डिबेट्स, सोशल मीडिया, कोचिंग सेंटर, अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षण संस्थान—सभी जगह यह समझ फैलाया जा रहा है कि आरक्षण “मेधावी छात्रों” के साथ अन्याय है।

·        “सब बराबर हैं”, “जाति देखना बंद करो”, “अब तो दलित भी अफसर बन गए हैं” जैसी बातें अक्सर उन्हीं लोगों से सुनने को मिलती हैं जो खुद जातिगत विशेषाधिकारों में रहते हैं।

जब तक जाति व्यवस्था के लाभ नहीं छोड़े जातेतब तक आरक्षण को हटाने की मांग मूलतः जातिवादी माँग है।

6. EWS आरक्षण: ब्राह्मणवाद की वापसी का रास्ता:

          2019 में संविधान संशोधन कर सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण दिया गया। इसे ‘गरीब ब्राह्मण’ की रक्षा के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन इस आरक्षण के पीछे कई विरोधाभास हैं–

·        यह आरक्षण उन समुदायों को दिया गया, जो पहले से ही सत्ता-संपत्ति और संसाधनों पर काबिज हैं।

·        इसके लिए किसी भी सामाजिक पिछड़ेपन का प्रमाण नहीं चाहिए—सिर्फ एक हलफनामा काफी है।

·        यह संविधान की मूल आत्मा—जाति आधारित अन्याय का सुधार—से हटकर, जाति विशेष को आरक्षण के दायरे में लाने का प्रयास है।

इससे यह सिद्ध होता है कि आरक्षण से समस्या तब होती हैजब वह दलित-पिछड़ों को ऊपर लाता है।

7. प्रमोशन में आरक्षण की समाप्ति: सामाजिक गतिशीलता को रोकना:

          आरक्षण केवल भर्ती तक सीमित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 16(4A) के तहत प्रमोशन में भी आरक्षण की व्यवस्था है। लेकिन–

·        न्यायालयों ने ‘प्रतिनिधित्व की समीक्षा’, ‘प्रशासनिक दक्षता’, ‘डेटा की कमी’ जैसे तर्कों के सहारे प्रमोशन आरक्षण को अवरुद्ध किया है।

·        कई विभागों में दलित-पिछड़ा कर्मचारी 25–30 साल की सेवा के बाद भी प्रमोट नहीं हो पाता।

यानी आरक्षण हैपर उन्नति नहीं। यह छूट दोपर बढ़ने मत दो‘ की नीति है।

8. जातिगत जनगणना से इंकार: आँकड़ों के बिना न्याय नहीं:

·        1931 के बाद भारत में जाति आधारित जनगणना नहीं हुई। इसका सीधा लाभ उन जातियों को हुआ जो पहले से ही सत्ता में हैं।

·        बिना आंकड़ों के आप OBC या SC/ST का प्रतिनिधित्व सिद्ध नहीं कर सकते।

·        सरकारें यह कहती हैं कि “आरक्षण पर्याप्त हो गया”, पर इसका कोई डेटा नहीं दिखातीं।

डॉ. अंबेडकर ने कहा था– “You cannot have reform without statistics.” जब तक संख्या की सच्चाई नहीं आएगी, तब तक न्याय का कोई ठोस आधार नहीं होगा। और यही वर्तमान व्यवस्था चाहती है।

9. जाति गई नहींसिर्फ रूप बदल रही है:

आज भी–

·        दलितों के ख़िलाफ़ हर रोज़ औसतन 50 से अधिक उत्पीड़न के मामले दर्ज होते हैं (NCRB डेटा)।

·        हजारों गाँवों में अब भी दलितों को मंदिर प्रवेश नहीं मिलता, उनका बाल काटने, कुएँ से पानी लेने, या बारात निकालने पर हमला होता है।

·        शिक्षा में SC/ST छात्रों के लिए ड्रॉप-आउट रेट सबसे ज्यादा है।

जब जाति का दुख अभी जीवित हैतो आरक्षण को “अनावश्यक” कहना केवल क्रूरता नहींएक वैचारिक साजिश है।

10. क्या जाति खत्म हो गई हैनहीं। पर आरक्षण खत्म किया जा रहा है।:

यदि जाति को मिटाना ही लक्ष्य होता, तो:

·        अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया जाता (सिर्फ 5% हैं)।

·        मंदिरों, गाँवों, स्कूलों और कार्यस्थलों में जातिगत भेद मिटाया जाता।

·        निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू किया जाता।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ…उल्टा–

·        ऊँची जातियों का संपत्ति और सत्ता पर वर्चस्व कायम है।

·        आरक्षण का लाभ सीमित कर दिया गया है।

यानी जाति नहीं मिट रहीबस उसका प्रतिकार करने वाले औजारों को कमजोर किया जा रहा है।

और अंत में यह सवाल फिर से:

          क्या आरक्षण को खत्म करने की यह प्रक्रिया दरअसल जाति व्यवस्था को स्थायी बनाए रखने की योजना नहीं है?

उत्तर है: हाँ—पूरी स्पष्टता से, पूरी चतुराई से, और पूरी तैयारी से। और इसलिए ज़रूरी है कि आरक्षण की रक्षा केवल दलितों-पिछड़ों का मुद्दा न रहे, बल्कि वह हर न्यायप्रिय नागरिक का सवाल बने।

आरक्षण विरोध = जातिवाद का नया चेहरा:

          आरक्षण को खत्म करने की कोशिशें किसी “समानता” या “योग्यता” की सच्ची चिंता से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि वे जातिगत वर्चस्व को बनाए रखने की चालाक रणनीति का हिस्सा हैं। जब तक समाज में जातिगत असमानता, भेदभाव और उत्पीड़न मौजूद हैं, तब तक आरक्षण एक संवैधानिक न्याय है, न कि कृपा। जो लोग आरक्षण के खिलाफ़ खड़े हैं, वे जाति के अस्तित्व को चुनौती नहीं देते; वे सिर्फ उस न्याय के खिलाफ़ हैं जो जाति आधारित विशेषाधिकारों को थोड़ा कम करता है। दरअसल, आरक्षण को समाप्त करने की मांग जाति को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसे बिना चुनौती के चलने देने की मांग है। इसलिए ज़रूरत आरक्षण हटाने की नहीं, जाति हटाने की है। जब तक समाज में जातिगत अन्याय रहेगा, तब तक आरक्षण उसका प्रतिरोध और उत्तर रहेगा—एक ज़िंदा, जरूरी, और नैतिक उत्तर।

Ramswaroop Mantri

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