विजय दलाल
जब तक बैंक कर्मचारी आंदोलन राष्ट्रीय श्रम आंदोलन का महत्वपूर्ण घटक रहा उसके शीर्ष नेतृत्व की भूमिका देश की बैंकों के साथ देश के सम्पूर्ण श्रम आंदोलन में भी बहुत योगदान रहा। वैसे तो उस कद के सैकड़ों नेताओं के नाम है लेकिन उदाहरण के तौर पर कामरेड परवाना , जिनके देहावसान पर देश में केवल एक बार किसी नेता के लिए समाचार पत्र नहीं छपे होंगे उनको श्रद्धांजलि के लिए देश के सभी प्रमुख समाचार पत्र नहीं छपे। यही नहीं दिल्ली के चांदनी चौक के छोटे छबड़ी व्यापारियों ने अपना कारोबार बंद रखा। कामरेड प्रभातकार अधिकारी संगठन एआईबीओए के शिल्पकार वामपंथी सांसद ने देश के बैंक कर्मचारियों के साथ श्रमिकों के सवालों पर पार्लियामेंट में मोर्चा संभाल रखा था। आज के छोटे छोटे कद के अहंकारी नेताओं को देखकर मुझे 1981 की एआईबीईए के इलाहाबाद अधिवेशन का किस्सा याद आता है हम कुछ युवा नये नये बैंक जाईनिस़ नेताओं के ऑटोग्राफ लेने पहुंचे। हम जब कामरेड प्रभातकार के पास पहुंचे तो उन्होंने यह कहकर ऑटोग्राफ देने से इन्कार कर दिया कि ” We all are Comrades “! कामरेड डी.पी.चढ्ढा जो शायद देश के पहले ट्रेड यूनियन नेता हो जिन्होंने 1987 में जनता के पैसे की सुरक्षा के लिए देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक पंजाब नेशनल बैंक में प्रबंधन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जमकर आंदोलन किया। उनके ज्ञान और तर्क़ के दबदबे के बारे में लोग बताते थे कि जब वो कभी वित्त मंत्रालय के सचिवों से बातचीत को जाते थे तो सचिव लोग उनके सम्मान में खड़े होते थे। उस काल में जितने भी वर्कमेन डायरेक्टर थे
सबके बैंकों के बोर्ड में गलत ॠणों के निर्णयों के विरुद्ध विवाद सुनते थे। जनता के जमा धन के ट्रस्टी होने की भूमिका में बैंक प्रबंधन से ज्यादा यूनियनों की प्रभावी भूमिका स्पष्ट नजर आती थी। सरकारी हस्तक्षेप के शुरुआती दिन थे साथ ही यूनियन नेताओं के सरकार की आंख की किरकिरी होने के भी।
आज बात बात पर किसी भी बैंक के सवालों पर या अन्य किसी भी अन्य श्रमिकों या किसानों के आंदोलन के समर्थन में जाने पर बहुत से कर्मचारी आज मोदी या मोदी सरकार के विरुद्ध जाने को राजनीति कहते हैं और मुखर होकर विरोध करते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि आपातकाल में इंदिरा गांधी की सरकार ने कामरेड डी पी चढ्ढा और प्रभातकार के ऊपर आयकर विभाग के छापे पड़वाए थे।
वो बात अलग है उन्हें रिफंड मिला। एआईबीईए ने इंदिरा गांधी के मंत्री जनार्दन पुजारी के लोन मेलों की परंपरा शुरू करने का भी विरोध किया था।
कामरेड ताराकेश्वर चक्रवर्ती की पैनी दृष्टि ने बैंकिंग, बहुल यूनियनों और बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में उनकी पीढ़ी ने अनवरत संघर्ष और बेमिसाल त्याग से जो पाया था उसे बचाने के लिए यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स की शुरुआत की। ….. आगे….
जब तक बैंक कर्मचारी आंदोलन राष्ट्रीय श्रम आंदोलन का महत्वपूर्ण घटक रहा उसके शीर्ष नेतृत्व की भूमिका देश की बैंकों के साथ देश के सम्पूर्ण श्रम आंदोलन में भी बहुत योगदान रहा। वैसे तो उस कद के सैकड़ों नेताओं के नाम है लेकिन उदाहरण के तौर पर कामरेड परवाना , जिनके देहावसान पर देश में केवल एक बार किसी नेता के लिए समाचार पत्र नहीं छपे होंगे उनको श्रद्धांजलि के लिए देश के सभी प्रमुख समाचार पत्र नहीं छपे। यही नहीं दिल्ली के चांदनी चौक के छोटे छबड़ी व्यापारियों ने अपना कारोबार बंद रखा। कामरेड प्रभातकार अधिकारी संगठन एआईबीओए के शिल्पकार वामपंथी सांसद ने देश के बैंक कर्मचारियों के साथ श्रमिकों के सवालों पर पार्लियामेंट में मोर्चा संभाल रखा था। आज के छोटे छोटे कद के अहंकारी नेताओं को देखकर मुझे 1981 की एआईबीईए के इलाहाबाद अधिवेशन का किस्सा याद आता है हम कुछ युवा नये नये बैंक जाईनिस़ नेताओं के ऑटोग्राफ लेने पहुंचे। हम जब कामरेड प्रभातकार के पास पहुंचे तो उन्होंने यह कहकर ऑटोग्राफ देने से इन्कार कर दिया कि ” We all are Comrades “! कामरेड डी.पी.चढ्ढा जो शायद देश के पहले ट्रेड यूनियन नेता हो जिन्होंने 1987 में जनता के पैसे की सुरक्षा के लिए देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक पंजाब नेशनल बैंक में प्रबंधन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जमकर आंदोलन किया। उनके ज्ञान और तर्क़ के दबदबे के बारे में लोग बताते थे कि जब वो कभी वित्त मंत्रालय के सचिवों से बातचीत को जाते थे तो सचिव लोग उनके सम्मान में खड़े होते थे। उस काल में जितने भी वर्कमेन डायरेक्टर थे
सबके बैंकों के बोर्ड में गलत ॠणों के निर्णयों के विरुद्ध विवाद सुनते थे। जनता के जमा धन के ट्रस्टी होने की भूमिका में बैंक प्रबंधन से ज्यादा यूनियनों की प्रभावी भूमिका स्पष्ट नजर आती थी। सरकारी हस्तक्षेप के शुरुआती दिन थे साथ ही यूनियन नेताओं के सरकार की आंख की किरकिरी होने के भी।
आज बात बात पर किसी भी बैंक के सवालों पर या अन्य किसी भी अन्य श्रमिकों या किसानों के आंदोलन के समर्थन में जाने पर बहुत से कर्मचारी आज मोदी या मोदी सरकार के विरुद्ध जाने को राजनीति कहते हैं और मुखर होकर विरोध करते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि आपातकाल में इंदिरा गांधी की सरकार ने कामरेड डी पी चढ्ढा और प्रभातकार के ऊपर आयकर विभाग के छापे पड़वाए थे।
वो बात अलग है उन्हें रिफंड मिला। एआईबीईए ने इंदिरा गांधी के मंत्री जनार्दन पुजारी के लोन मेलों की परंपरा शुरू करने का भी विरोध किया था।
कामरेड ताराकेश्वर चक्रवर्ती की पैनी दृष्टि ने बैंकिंग, बहुल यूनियनों और बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में उनकी पीढ़ी ने अनवरत संघर्ष और बेमिसाल त्याग से जो पाया था उसे बचाने के लिए यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स की शुरुआत की। ….. आगे….
विजय दलाल





