शशिकांत गुप्ते
5 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति स्व.सर्वपल्ली राधाकृष्णनजी का जन्म दिवस है।इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन शिक्षकों का सम्मान किया जाता है।शिक्षक देश की भावी पीढ़ी का निर्माता होता है।महाराष्ट्र में शिक्षक को गुरुजी ही कहतें हैं।शिक्षक को गुरुतुल्य ही माना जाता है।गुरु की महिमा इस श्लोक में वर्णित है।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर साक्षत परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
शिक्षक को आचार्य भी कहा है।पौराणिक कथाओं में आचार्यो का वर्णन पढ़ने को मिलता है।
आचार्य,शिक्षक यह युग निर्माता भी होतें है।शिक्षक विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत होतें हैं।
एक अच्छा शिक्षक और निपुण विद्यार्थी कैसा होना चाहिए।इस संदर्भ में आचार्य विनोबा भावे के कहा है। निपुण विद्यार्थी वह होता है जो जिज्ञासा वश शिक्षक से ऐसा प्रश्न पूछे कि, शिक्षक निरुत्तर हो जाए।और अच्छा शिक्षक वह होता है, जो अपने बुद्धि कौशल्य से विद्यार्थी की जिज्ञासाओं को पूर्ण रूप से संतुष्ट कर दे।जिससे विद्यार्थी को प्रश्न पूछने की जरूरत ही न पड़े।
शिक्षक की श्रेष्ठता के लिए सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है आचार्य चाणक्य का।आचार्य का मतलब ही शिक्षक होता है।एक प्राध्यापक ने आचार्य के सबसे महत्वपूर्ण गुण को समझाते हुए कहा कि, आचार्य चाणक्य ने समाज को बहुत ही अहम संदेश दिया है।आचार्य विद्यार्थियों के लिए शिक्षा के माध्यम से सृजन करता होता है।अर्थात आचार्य Creator होता है।इसीलिए आचार्य को सत्ता के मातहत नहीं रहना चाहिए।आचार्य का सत्ता पर अंकुश होना चाहिए।सम्पूर्ण इतिहास में आचार्य चाणक्य ही ऐसा आचार्य हुआ है, जो सत्ता के मातहत नहीं रहा है।चाणक्य ने एक साधारण बालक के अंदर गुण देखकर उसे सम्राट बनाया है।चाणक्य ने बालक चंद्रगुप्त के अंदर विद्यमान गुणों का सृजन किया।
इतिहास में जो भी आचार्य सत्ता के मातहत रहें हैं, वे सत्ता की गलत नीतियों का और सत्ता द्वारा जनता के साथ किए गए अन्याय का विरोध नहीं कर पाए हैं।
आज की शिक्षा पद्धति विद्यार्थियों को सिर्फ पढ़ा लिखा बना रही है।शिक्षत नहीं कर रही है।अर्थात सिर्फ literate बना रही है।Educated नहीं कर रही है।
literacy और Education में क्या अंतर को समझना होतो हमें संत कबीरसाहब को पढ़ना चाहिए।कबीरसाहब Educated थे।संत कबीरसाहब जैसे अन्य संतो को पढ़कर समझने से यह स्पष्ट हो जाता है कि,शिक्षित होने के लिए साक्षर होना भी जरूरी नहीं है।आज के कथित संत literate हैं।
साक्षरता पर एक व्यंग्य का स्मरण होता है।साक्षरता का प्रचार दूर दराज के आँचल तक पहुँच तो गया है।इस प्रचार का नतीजा सिर्फ इतना हुआ है कि,
बुद्धू सिंह साक्षर हो गया,पहले वह अंगूठा लगता था,अब हस्ताक्षर करना सीख तो गया किंतु उसे यह सीख नहीं मिली कि,हस्ताक्षर क्यों और कहाँ करना चाहिए।आज भी वह उन्ही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करता है जहाँ वह पूर्व में बगैर पढ़े अंगूठा लगा था।
अंत में literacy और Education का अंतर
युवाओं को समझाने के लिए बहुत सामान्य उदाहरण है।
ट्रैफिक पॉइंट पर जो लाल बत्ती को देख कर रुक जाता है, वह Educated होता है और जो कानून को तोड़ कर निकल जाता है,वह सिर्फ literate हो सकता है।
एक महवपूर्ण मुद्दा समझना बहुत जरूरी है।गुरु शब्द का अध्यात्म में महत्व नहीं है।अध्यात्म में गुरु की जगह सद्गुरु कहा जाता है।सद्गुरु सदहृदय होता है।सद्गुरु अपने शिष्य को सिर्फ विद्वान ही नहीं बनाता है,बल्कि उसे ज्ञानी बनाता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





