अग्नि आलोक
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नष्टप्राय जीर्णशीर्ण देहत्याग में भी अनिच्छा : कैसे मिले आवागमन चक्र से मुक्ति ?

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डॉ. विकास मानव

(मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक, निदेशक : चेतना विकास मिशन

)

              _सूत्र-वाक्य :_

*नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः*।। 23।। 

   _इस आत्मा को न तलवार, गदा आदि शस्त्र काट सकते हैं, न जल शिथिल कर सकता है, न अग्नि जला सकती है और न वायु सुखा सकता है।_

*अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः*।। 24।। 

    _क्योंकि यह आत्मा अनादि, नित्य, सर्वव्यापक, स्थिर स्वभाव और अचल है, इसलिए इसका शस्त्रादि से छेदन, अग्नि से दाह, जल से भेदन और वायु से शोषण नहीं हो सकता।_

*अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि।।* 25।। 

    _आत्मा इस शरीर से भिन्न है, अज्ञान से भिन्न है, विकार से शून्य है, इसलिए इसको निष्कल और निष्क्रिय जान कर इसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।_

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   *व्याख्यात्मक विश्लेषण :*

    आत्मा, न जन्म लेता है, न मरता है; न उसका प्रारंभ है, न उसका अंत है–जब हम ऐसा कहते हैं, तो थोड़ी-सी भूल हो जाती है। 

_इसे दूसरे ढंग से कहना ज्यादा सत्य के करीब होगा:_

    जिसका जन्म नहीं होता, जिसकी मृत्यु नहीं होती, जिसका कोई प्रारंभ नहीं है, जिसका कोई अंत नहीं है, ऐसे अस्तित्व को ही हम आत्मा कहते हैं। निश्चित ही, अस्तित्व प्रारंभ और अंत से मुक्त होना चाहिए। जो है, दैट व्हिच इज़, उसका कोई प्रारंभ नहीं हो सकता। 

       प्रारंभ का अर्थ यह होगा कि वह शून्य से उतरे, ना-कुछ से उतरे। और प्रारंभ होने के लिए भी प्रारंभ के पहले कुछ तैयारी चाहिए पड़ेगी। प्रारंभ आकस्मिक नहीं हो सकता। सब प्रारंभ पूर्व की तैयारी से, पूर्व के कारण से बंधे होते हैं, कॉजेलिटि से बंधे होते हैं। 

     एक बच्चे का जन्म होता है; हो सकता है, क्योंकि मां-बाप के दो शरीर उसके जन्म की तैयारी करते हैं। सब प्रारंभ अपने से भी पहले किसी चीज को, प्रिसपोज्ड, अपने से भी पहले किसी चीज को स्वीकार करते हैं। इसलिए कोई प्रारंभ मौलिक रूप से प्रारंभ नहीं होता। 

      किसी चीज का प्रारंभ हो सकता है, लेकिन शुद्ध प्रारंभ नहीं होता। ठीक वैसे ही, किसी चीज का अंत हो सकता है, लेकिन अस्तित्व का अंत नहीं होता। क्योंकि कोई भी चीज समाप्त हो, तो उसके भीतर जो होना था, जो अस्तित्व था, वह शेष रह जाता है। 

     तो जब हम कहते हैं, आत्मा का कोई जन्म नहीं, कोई मृत्यु नहीं, तो समझ लेना चाहिए। दूसरी तरफ से समझ लेना उचित है कि जिसका कोई जन्म नहीं, जिसकी कोई मृत्यु नहीं, उसी का नाम हम आत्मा कह रहे हैं।

     _आत्मा का अर्थ है–अस्तित्व, बीइंग। लेकिन हमारी भ्रांति वहां से शुरू होती है, आत्मा को हम समझ लेते हैं- ‘मैं:।_

 मेरा तो प्रारंभ है और मेरा अंत भी है। लेकिन जिसमें मैं जन्मता हूं और जिसमें मैं समाप्त हो जाता हूं, उस अस्तित्व का कोई अंत नहीं है। 

       आकाश में बादल बनते हैं और बिखर जाते हैं। जिस आकाश में उनका बनना और बिखरना होता है, उस आकाश का कोई प्रारंभ और कोई अंत नहीं है। आत्मा को आकाश समझें–इनर स्पेस, भीतरी आकाश। और आकाश में भीतर और बाहर का भेद नहीं किया जा सकता। बाहर के आकाश को परमात्मा कहते हैं, भीतर के आकाश को आत्मा। 

    इस आत्मा को व्यक्ति न समझें, इंडिविजुअल न समझें। व्यक्ति का तो प्रारंभ होगा, और व्यक्ति का अंत होगा। इस आंतरिक आकाश को अव्यक्ति समझें। इस आंतरिक आकाश को सीमित न समझें। 

     सीमा का तो प्रारंभ होगा और अंत होगा। इसलिए कृष्ण कह रहे हैं कि न उसे आग जला सकती है। आग उसे क्यों नहीं जला सकती? पानी उसे क्यों नहीं डुबा सकता? अगर आत्मा कोई भी वस्तु है, तो आग जरूर जला सकती है। यह आग न जला सके, हम कोई और आग खोज लेंगे। कोई एटामिक भट्ठी बना लेंगे, वह जला सकेगी। 

     अगर आत्मा कोई वस्तु है, तो पानी क्यों नहीं डुबा सकता? थोड़ा पानी न डुबा सकेगा, तो बड़े पैसिफिक महासागर में डुबा देंगे। जब वे यह कह रहे हैं कि आत्मा को न जलाया जा सकता है, न डुबाया जा सकता है पानी में, न नष्ट किया जा सकता है, तो वे यह कह रहे हैं कि आत्मा कोई वस्तु नहीं है; थिंगनेस, वस्तु उसमें नहीं है। 

    _आत्मा सिर्फ अस्तित्व का नाम है। एक्झिस्टेंट वस्तु नहीं, एक्झिस्टेंस इटसेल्फ। वस्तुओं का अस्तित्व होता है, आत्मा स्वयं अस्तित्व है।_

       इसलिए आग न जला सकेगी, क्योंकि आग भी अस्तित्व है। पानी न डुबा सकेगा, क्योंकि पानी भी अस्तित्व है। इसे ऐसा समझें कि आग भी आत्मा का एक रूप है, पानी भी आत्मा का एक रूप है, तलवार भी आत्मा का एक रूप है, इसलिए आत्मा से आत्मा को जलाया न जा सकेगा। आग उसको जला सकती है, जो उससे भिन्न है। आत्मा किसी से भी भिन्न नहीं। आत्मा अस्तित्व से अभिन्न है, अस्तित्व ही है। 

     _अगर हम आत्मा शब्द को अलग कर दें और अस्तित्व शब्द को विचार करें, तो कठिनाई बहुत कम हो जाएगी।_ 

क्योंकि ~

   आत्मा से हमें लगता है, मैं। हम आत्मा और ईगो को, अहंकार को पर्यायवाची मानकर चलते हैं। इससे बहुत जटिलता पैदा हो जाती है। आत्मा अस्तित्व का नाम है। उस अस्तित्व में उठी हुई एक लहर का नाम मैं है। वह लहर उठेगी, गिरेगी; बनेगी, बिखरेगी; उस मैं को जलाया भी जा सकता है, डुबाया भी जा सकता है। ऐसी आग खोजी जा सकती है, जो मैं को जलाए। ऐसा पानी खोजा जा सकता है, जो मैं को डुबाए। ऐसी तलवार खोजी जा सकती है, जो मैं को काटे।

     इसलिए ‘मैं’ को छोड़ दें। आत्मा से मैं का कोई भी लेना-देना नहीं है, दूर का भी कोई वास्ता नहीं है। मैं को छोड़कर जो पीछे आपके शेष रह जाता है, वह आत्मा है। लेकिन मैं को छोड़कर हमने अपने भीतर कभी कुछ नहीं देखा है। जब भी कुछ देखा है, मैं मौजूद हूं। जब भी कुछ सोचा है, मैं मौजूद हूं। मैं हर जगह मौजूद हूं भीतर। इतने घने रूप से हम मैं के आस-पास जीते हैं कि मैं के पीछे जो खड़ा है सागर, वह हमें कभी दिखाई नहीं पड़ता। और हम कृष्ण की बात सुनकर प्रफुल्लित भी होते हैं।

      जब सुनाई पड़ता है कि आत्मा को जलाया नहीं जा सकता, तो हमारी रीढ़ सीधी हो जाती है। हम सोचते हैं, मुझे जलाया नहीं जा सकता। जब हम सुनते हैं, आत्मा मरेगी नहीं, तो हम भीतर आश्वस्त हो जाते हैं कि मैं मरूंगा नहीं। इसीलिए तो बूढ़ा होने लगता है आदमी, तो गीता ज्यादा पढ़ने लगता है। 

      _मृत्यु पास आने लगती है, तो कृष्ण की बात समझने का मन होने लगता है। मृत्यु कंपाने लगती है मन को, तो मन समझना चाहता है, मानना चाहता है कि कोई तो मेरे भीतर हो, जो मरेगा नहीं, ताकि मैं मृत्यु को झुठला सकूं। इसलिए मंदिर में, मस्जिद में, गुरुद्वारे में जवान दिखाई नहीं पड़ते। क्योंकि अभी मौत जरा दूर मालूम पड़ती है। अभी इतना भय नहीं, अभी पैर कंपते नहीं। वृद्ध दिखाई पड़ने लगते हैं।_

   सारी दुनिया में धर्म के आस-पास बूढ़े आदमियों के इकट्ठे होने का एक ही कारण है कि जब मैं मरने के करीब पहुंचता है, तो मैं जानना चाहता है कि कोई आश्वासन, कोई सहारा, कोई भरोसा, कोई प्रामिस–कि नहीं, मौत को भी झुठला सकेंगे, बच जाएंगे मौत के पार भी। कोई कह दे कि मरोगे नहीं–कोई अथारिटी, कोई प्रमाण-वचन, कोई शास्त्र!

     इसीलिए आस्तिक, जो वृद्धावस्था में आस्तिक होने लगता है, उसके आस्तिक होने का मौलिक कारण सत्य की तलाश नहीं होती, मौलिक कारण भय से बचाव होता है, फियर से बचाव होता है। और इसलिए दुनिया में जो तथाकथित आस्तिकता है, वह भगवान के आस-पास निर्मित नहीं, भय के आस-पास निर्मित है। और अगर भगवान भी है उस आस्तिकता का, तो वह भय का ही रूप है; उससे भिन्न नहीं है। वह भय के प्रति ही सुरक्षा है, सिक्योरिटी है।

      तो जब कृष्ण यह कह रहे हैं, तो एक बात बहुत स्पष्ट समझ लेना कि यह आप नहीं जलाए जा सकेंगे, इस भ्रांति में मत पड़ना। इसमें तो बहुत कठिनाई नहीं है। घर जाकर जरा आग में हाथ डालकर देख लेना, तो कृष्ण एकदम गलत मालूम पड़ेंगे। एकदम ही गलत बात मालूम पड़ेगी। गीता पढ़कर आग में हाथ डालकर देख लेना कि आप जल सकते हैं कि नहीं! 

      गीता पढ़कर पानी में डुबकी लगाकर देख लेना, तो पता चल जाएगा कि डूब सकते हैं या नहीं! लेकिन कृष्ण गलत नहीं हैं। जो डूबता है पानी में, कृष्ण उसकी बात नहीं कर रहे हैं। जो जल जाता है आग में, कृष्ण उसकी बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन क्या आपको अपने भीतर किसी एक भी ऐसे तत्व का पता है, जो आग में नहीं जलता? पानी में नहीं डूबता? 

      अगर पता नहीं है, तो कृष्ण को मानने की जल्दी मत करना। खोजना, मिल जाएगा वह सूत्र, जिसकी वे बात कर रहे हैं। सवाल पूछा है। पूछा है कि आत्मा न भी करती हो यात्रा, सूक्ष्म शरीर, लिंग शरीर अगर यात्रा करता है, तो भी आत्मा का सहयोग तो है ही। आत्मा कोआप्ट तो करती ही है।

     अगर इनकार कर दे सहयोग करने से, तब तो यात्रा नहीं हो सकेगी! इसे भी दो तलों पर समझ लेना जरूरी है। सहयोग भी इस जगत में दो प्रकार के हैं। एक, वैज्ञानिक जिसको कैटेलिटिक कोआपरेशन कहता है, कैटेलिटिक एजेंट जिसको वैज्ञानिक कहता है, उस बात को समझ लेना उचित है।

     एक सहयोग है, जिसमें हम पार्टिसिपेंट होते हैं। एक सहयोग है, जिसमें हमें भागीदार होना पड़ता है। एक और सहयोग है, जिसमें मौजूदगी काफी है, जस्ट प्रेजेंस। सुबह सूरज निकला। आपकी बगिया का फूल खिल गया। 

    सूरज को पता भी नहीं है कि उसने इस फूल को खिलाया। सूरज इस फूल को खिलाने के लिए निकला भी नहीं है। यह फूल न होता तो सूरज के निकलने में कोई बाधा भी नहीं पड़ती। यह न होता तो सूरज यह न कहता कि फूल तो है नहीं, मैं किसलिए निकलूं! यह खिल गया है, इसके लिए सिर्फ सूरज की मौजूदगी, प्रेजेंस काफी बनी है। सूरज की मौजूदगी के बिना यह खिल भी न सकता, यह बात पक्की है। लेकिन सूरज की मौजूदगी इसको खिलाने के लिए नहीं है, यह बात भी इतनी ही पक्की है। सूरज की मौजूदगी में यह खिल गया है। लेकिन यह भी बहुत ठीक नहीं है। क्योंकि सूरज की किरणें कुछ करती हैं। चाहे सूरज को पता हो, चाहे न पता हो। सूरज की किरणें उसकी कलियों को खोलती हैं। सूरज की किरणें उस पर चोट भी करती हैं। 

    _चोट कितनी ही बारीक और सूक्ष्म हो, लेकिन चोट होती है। सूरज की किरणों का भी वजन है। सूरज की किरणें भी प्रवेश करती हैं। कोई एक वर्ग मील पर जितनी सूरज की किरणें पड़ती हैं, उसका कोई एक छटांक वजन होता है। बहुत कम है। एक वर्ग मील पर जितनी किरणें पड़ती हैं, अगर हम इकट्ठी कर सकें, तो कहीं एक छटांक वजन होगा। एक तो इकट्ठा करना मुश्किल है।_

      अनुमान है वैज्ञानिकों का, इतना वजन होगा। इतना भी सही, तो भी सूरज फूल की पखुड़ियों पर कुछ करता है। तो वह भी कैटेलिटिक एजेंट नहीं है, इनडायरेक्ट पार्टिसिपेंट है, परोक्ष रूप से भाग लेता है। लेकिन कैटेलिटिक एजेंट वैज्ञानिक बहुत दूसरी चीज को कहते हैं। 

    जैसे कि हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर पानी बनता है। तो आप हाइड्रोजन और आक्सीजन एक कमरे में बंद कर दें, तो भी पानी नहीं बनेगा। सब तरह से सब मौजूद है, लेकिन पानी नहीं बनेगा। लेकिन उस कमरे में बिजली की एक धारा दौड़ा दें। तो बस, तत्काल हाइड्रोजन और आक्सीजन के अणु मिलकर पानी बनाना शुरू कर देंगे। 

       सब तरह से खोज-बीन की गई, बिजली की धारा कुछ भी नहीं करती। न वह हाइड्रोजन को छूती है, न आक्सीजन को छूती है। न स्पर्श करती है, न उनके साथ कुछ करती। बस उसकी मौजूदगी, सिर्फ उसका होना। उसकी मौजूदगी के बिना नहीं हो पाता। कहना चाहिए, उसकी मौजूदगी ही कुछ करती है; बिजली कुछ नहीं करती। 

    कृष्ण कह रहे हैं आत्मा निष्क्रिय है, अक्रिय है, नान-एक्टिव है। आत्मा अक्रिय है, निष्क्रिय है, कर्म नहीं करती, तो फिर यह सारी की सारी यात्रा, यह जन्म और मरण, यह शरीर और शरीर का छूटना, और नए वस्त्रों का ग्रहण और जीर्ण वस्त्रों का त्याग, यह कौन करता है? 

    आत्मा की मौजूदगी के बिना यह नहीं हो सकता है, इतना पक्का है। लेकिन आत्मा की मौजूदगी सक्रिय तत्व की तरह काम नहीं करती, निष्क्रिय उपस्थिति की तरह काम करती है। जैसे समझें कि बच्चों की क्लास लगी है। शिक्षक नहीं है। चिल्ला रहे हैं, शोरगुल कर रहे हैं, नाच रहे हैं। फिर शिक्षक कमरे में आया। सन्नाटा छा गया, चुप्पी हो गई। अपनी जगह बैठ गए हैं, किताबें पढ़ने लगे हैं।

     अभी शिक्षक ने एक शब्द नहीं बोला। अभी शिक्षक ने कुछ किया नहीं। अभी उसने यह भी नहीं कहा कि चुप हो जाओ। अभी उसने यह भी नहीं कहा कि गलत कर रहे हो। अभी उसने कुछ किया ही नहीं। अभी वह सिर्फ प्रवेश हुआ है। पर उसकी मौजूदगी, और कुछ हो गया है। शिक्षक कैटेलिटिक एजेंट है इस क्षण में। अभी कुछ कर नहीं रहा है। ये सारे उदाहरण बिलकुल ठीक नहीं हैं, सिर्फ़ आपको खयाल आ सके, इसलिए कह रहा हूं। 

     आत्मा की मौजूदगी–लेकिन पूछा जा सकता है, मौजूद होने का भी उसका निर्णय तो है ही; डिसीजन तो है ही! शिक्षक कमरे में आया है, नहीं आता। आने का निर्णय तो लिया ही है। यह भी कोई कम काम तो नहीं है। आया है। आत्मा कम से कम निर्णय तो ले ही रही है जीवन में होने का। अन्यथा जीवन के प्रारंभ का कोई अर्थ नहीं है। कैसे जीवन प्रारंभ होगा! 

   _आत्मा क्यों निर्णय ले रही है जीवन के प्रारंभ का? मौजूद होने की भी क्या जरूरत है? क्या परपज है? तो यहां थोड़े और गहरे उतरना पड़ेगा।_

    एक बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि स्वतंत्रता सदा दोहरी होती है। स्वतंत्रता कभी इकहरी नहीं होती। स्वतंत्रता सदा दोहरी होती है। स्वतंत्रता का मतलब ही यह होता है कि आदमी या जिसके लिए स्वतंत्रता है, वह विपरीत भी कर सकता है। 

    समझ लें, एक गांव में हम डुंडी पीट दें और कहें कि प्रत्येक आदमी अच्छा काम करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन बुरा काम नहीं कर सकता। तो उस गांव में अच्छा काम करने की स्वतंत्रता भी नहीं रह जाएगी। अच्छा काम करने की स्वतंत्रता में इम्प्लाइड है, छिपी है, बुरा काम करने की स्वतंत्रता।

      जो आदमी बुरा काम कर ही नहीं सकता, उसने अच्छा काम किया है, ऐसा कहने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। स्वतंत्रता दोहरी है, समस्त तलों पर। आत्मा स्वतंत्र है, अस्तित्व स्वतंत्र है। उस पर कोई परतंत्रता नहीं है। उसके अतिरिक्त कोई है ही नहीं, जो उसे परतंत्र कर सके। अस्तित्व फ्रीडम है, अस्तित्व स्वातंत्र्य है। और स्वातंत्र्य में हमेशा दोहरे विकल्प हैं। 

      आत्मा चाहे तो दोनों यात्राएं कर सकती है–संसार में, शरीर में, बंधन में; बंधन के बाहर, संसार के बाहर, शरीर के बाहर। ये दोनों संभावनाएं हैं। और संसार का अनुभव, संसार के बाहर उठने के अनुभव की अनिवार्य आधारशिला है। 

     विश्रांति का अनुभव, तनाव के अनुभव के बिना असंभव है। मुक्ति का अनुभव, अमुक्त हुए बिना असंभव है। मैं एक छोटी-सी कहानी निरंतर कहता रहता हूं। मैं कहता रहता हूं कि एक अमीर आदमी, एक करोड़पति, जीवन के अंत में सारा धन पाकर चिंतित हो उठा। 

      चिंतित हो उठा कि आनंद अब तक मिला नहीं! सोचा था जीवनभर धन, धन, धन। सोचा था, धन साधन बनेगा, आनंद साध्य होगा। साधन पूरा हो गया, आनंद की कोई खबर नहीं। साधन इकट्ठे हो गए, आनंद की वीणा पर कोई स्वर नहीं बजता। साधन इकट्ठा हो गया, भवन तैयार है, लेकिन आनंद का मेहमान आता हुआ दिखाई नहीं पड़ता, उसकी कोई पदचाप सुनाई नहीं पड़ती है। चिंतित हो जाना स्वाभाविक है। 

       गरीब आदमी कभी चिंतित नहीं हो पाता, यही उसका दुर्भाग्य है। अगर वह चिंतित भी होता है, तो साधन के लिए होता है कि कैसे धन मिले, कैसे मकान मिले! अमीर आदमी की जिंदगी में पहली दफा साध्य की चिंता शुरू होती है; क्योंकि साधन पूरा होता है। अब वह देखता है, साधन सब इकट्ठे हो गए, जिसके लिए इकट्ठे किए थे, वह कहां है! 

    _इसलिए जब तक किसी आदमी की जिंदगी में साध्य का खयाल न उठे, तब तक वह गरीब है। चाहे उसके पास कितना ही धन इकट्ठा हो गया हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके अमीर होने की खबर उसी दिन मिलती है, जिस दिन वह यह सोचने को तैयार हो जाता है–सब है जिससे आनंद मिलना चाहिए ऐसा सोचा था, लेकिन वह आनंद कहां है? साधन पूरे हो गए, लेकिन वह साध्य कहां है?_

      भवन बन गया, लेकिन अतिथि कहां है? उसी दिन आदमी अमीर होता है। वही उसका सौभाग्य है। लेकिन बहुत कम अमीर आदमी अमीर होते हैं। वह अमीर आदमी अमीर था; चिंता पकड़ गई उसे। उसने अपने घर के लोगों को कहा कि बहुत दिन प्रतीक्षा कर ली, अब मैं खोज में जाता हूं। अब तक सोचता था कि इंतजाम कर लूंगा, तो आनंद का अतिथि आ जाएगा। इंतजाम पूरा है, अतिथि का कोई पता चलता नहीं। अब मैं उसकी खोज पर निकलता हूं। बहुत-से हीरे-जवाहरात अपने साथ लेकर वह गया। गांव-गांव पूछता था लोगों से कि आनंद कहां मिलेगा? लोगों ने कहा, हम खुद ही तलाश में हैं। इस गांव तक हम उसी की तलाश में पहुंचे हैं। रास्तों पर लोगों से पूछता था, आनंद कहां मिलेगा?

      वे यात्री कहते कि हम भी सहयात्री हैं, फेलो ट्रेवलर्स हैं; हम भी खोज में निकले हैं। तुम्हें पता चल जाए, तो हमें भी खबर कर देना। जिससे पूछा उसी ने कहा कि तुम्हें खबर मिल जाए, तो हमें भी बता देना। हमें कुछ पता नहीं, हम भी खोज में हैं। थक गया, परेशान हो गया, मौत करीब दिखाई पड़ने लगी। आनंद की कोई खबर नहीं। फिर एक गांव से गुजर रहा था, तो किसी से उसने पूछा। झाड़ के नीचे एक आदमी बैठा हुआ था। देखकर ऐसा लगा कि शायद यह आदमी कोई जवाब दे सके। क्योंकि अंधकार घिर रहा था सांझ का, लेकिन उस आदमी के आस-पास कुछ अलौकिक प्रकाश मालूम पड़ता था। रात उतरने को थी, लेकिन उसके चेहरे पर चमक थी सुबह की। 

       पकड़ लिए उसके पैर, धन की थैली पटक दी। और कहा कि ये हैं अरबों-खरबों रुपए के हीरे-जवाहरात–आनंद चाहिए! उस फकीर ने आंखें ऊपर उठाईं और उसने कहा कि सच में चाहिए? बिलकुल तुम्हें आज तक कभी आनंद नहीं मिला? उसने कहा, कभी नहीं मिला। उसने कहा, कभी कोई थोड़ी-बहुत धुन बजी हो! कोई धुन नहीं बजी। उसने कहा, कभी थोड़ा-बहुत स्वाद आया हो! उस आदमी ने कहा, बातों में समय खराब मत करो; तुम पहले आदमी हो, जिसने एकदम से यह नहीं कहा कि मैं भी खोज रहा हूं। मुझे बताओ! उस फकीर ने पूछा, कोई परिचय ही नहीं है? उसने कहा, कोई परिचय नहीं है। इतना कहना था कि वह फकीर उस झोले को, जिसमें हीरे-जवाहरात थे, लेकर भाग खड़ा हुआ।

      उस अमीर ने तो सोचा भी नहीं था। वह उसके पीछे भागा और चिल्लाया, मैं लुट गया। तुम आदमी कैसे हो! गांव परिचित था फकीर का, अमीर का तो परिचित नहीं था। गली-कूचे वह चक्कर देने लगा। सारा गांव जुट गया। गांव भी पीछे भागने लगा। अमीर चिल्ला रहा है, छाती पीट रहा है, आंख से आंसू बहे जा रहे हैं। और वह कह रहा है, मैं लुट गया; मैं मर गया; मेरी जिंदगीभर की कमाई है। उसी के सहारे मैं आनंद को खोज रहा हूं; अब क्या होगा! मेरे दुख का कोई अंत नहीं है। मुझे बचाओ किसी तरह इस आदमी से; मेरा धन वापस दिलवाओ।

      वह गांवभर में चक्कर लगाकर भागता हुआ फकीर वापस उसी झाड़ के नीचे आ गया, जहां अमीर का घोड़ा खड़ा था। झोला जहां से उठाया था वहीं पटककर, जहां बैठा था वहीं झाड़ के पास फिर बैठ गया। पीछे से भागता हुआ अमीर आया और सारा गांव। 

     अमीर ने झोला उठाकर छाती से लगा लिया और भगवान की तरफ हाथ उठाकर कहा, हे भगवान, तेरा परम धन्यवाद! फकीर ने पूछा, कुछ आनंद मिला? उस अमीर ने कहा, कुछ? बहुत-बहुत मिला। ऐसा आनंद जीवन में कभी भी नहीं था। उस फकीर ने कहा, आनंद के पहले दुखी होना जरूरी है; पाने के पहले खोना जरूरी है; होने के पहले न होना जरूरी है; मुक्ति के पहले बंधन जरूरी है; ज्ञान के पहले अज्ञान जरूरी है; प्रकाश के पहले अंधकार जरूरी है। इसलिए आत्मा एक यात्रा पर निकलती है, वह धन खोने की यात्रा है। असल में जिसे हम खोते नहीं, उसे हम कभी पाने का अनुभव नहीं कर सकते।

      इसलिए जब जिन्होंने पाया है, जैसे कृष्ण, जैसे बुद्ध.जब बुद्ध को मिला ज्ञान, लोगों ने पूछा, क्या मिला? तो बुद्ध ने कहा, मिला कुछ भी नहीं। जो मिला ही हुआ था, उसको जाना भर। लेकिन बीच में खोना जरूरी था। स्वास्थ्य का अनुभव करने के लिए भी बीमार होना अनिवार्य प्रक्रिया है। 

     _ऐसा जीवन का तथ्य है। ऐसी फैक्टिसिटी है। तो जब आप पूछते हैं, क्या जरूरत है आत्मा को संसार में जाने की? तो मैं कहता हूं, मुक्ति के अनुभव के लिए। और आत्मा संसार में आने के पहले भी मुक्त है, लेकिन उस मुक्ति का कोई बोध नहीं हो सकता; उस मुक्ति की कोई प्रतीति नहीं हो सकती; उस मुक्ति का कोई एहसास नहीं हो सकता।_

     खोए बिना एहसास असंभव है। इसलिए संसार एक परीक्षण है। संसार एक एक्सपेरिमेंट है, स्वयं को खोने का। संसार इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। यह आत्मा का अपना ही चुनाव है कि वह खोए और पाए। परमात्मा संसार में अपने को खोकर पा रहा है; खोता रहेगा, पाता रहेगा; अंधेरे में उतरेगा और प्रकाश में आकर जागेगा कि प्रकाश है।

       इसलिए कृष्ण से अगर हम पूछेंगे, तो वे कहेंगे, लीला है–अपने से ही अपने को छिपाने की, अपने से ही अपने को खोजने की, अपने से ही अपने को पाने की–लीला है, बहुत गंभीर मामला नहीं है। बहुत सीरियस होने की जरूरत नहीं है।

      _कृष्ण से ज्यादा नान-सीरियस, गैर-गंभीर आदमी खोजना मुश्किल है। और जो गंभीर हैं, वे खबर देते हैं कि उन्हें जीवन के पूरे राज का अभी पता नहीं चला है। जीवन का पूरा राज यही है कि जिसे हम तलाश रहे हैं, उसे हमने खोया है। जिसे हम खोज रहे हैं, उसे हमने छिपाया है। जिसकी तरफ हम जा रहे हैं, उसकी तरफ से हम खुद आए हैं।_

       पर ऐसा है। और आप पूछें, क्यों है? तो उस क्यों का कोई उत्तर नहीं है। एक क्यों तो जरूर जिंदगी में होगा, जिसका कोई उत्तर नहीं होगा। वह क्यों हम कहां जाकर पकड़ते हैं, यह दूसरी बात है। लेकिन अल्टिमेट व्हाई, आखिरी क्यों का कोई उत्तर नहीं हो सकता है। 

      _नहीं हो सकता, इसीलिए फिलासफी, दर्शनशास्त्र फिजूल के चक्कर में घूम जाता है। वह क्यों की तलाश करता है। इसको थोड़ा समझ लेना उचित है।_

 दर्शनशास्त्र क्यों की तलाश करता है–ऐसा क्यों है? एक कारण मिल जाता है; फिर वह पूछता है, यह कारण क्यों है? फिर दूसरा कारण मिल जाता है; फिर वह पूछता है, यह कारण क्यों है? फिर इनफिनिट रिग्रेस हो जाता है। फिर अंतहीन है यह सिलसिला। 

      हर उत्तर नए प्रश्न को जन्म दे जाता है। हम कोई भी कारण खोज लें, फिर भी क्यों तो पूछा ही जा सकता है। ऐसा कोई कारण हो सकता है क्या, जिसके संबंध में सार्थक रूप से क्यों न पूछा जा सके? नहीं हो सकता। इसलिए दर्शनशास्त्र एक बिलकुल ही अंधी गली है। विज्ञान नहीं पूछता–क्यों? विज्ञान पूछता है–क्या, व्हाट? 

     _इसलिए विज्ञान अंधी गली नहीं है। धर्म भी नहीं पूछता–क्यों? धर्म भी पूछता है–व्हाट, क्या? इसे समझ लेना आप। विज्ञान और धर्म बहुत निकट हैं। विज्ञान की भी दुश्मनी अगर है, तो फिलासफी से है। और धर्म की भी अगर दुश्मनी है, तो फिलासफी से है।_

    आमतौर से ऐसा खयाल नहीं है। लोग समझते हैं कि धर्म तो खुद ही एक फिलासफी है। धर्म बिलकुल भी फिलासफी नहीं है। धर्म एक विज्ञान है। धर्म यह पूछता है, क्या? क्यों नहीं। क्योंकि धर्म जानता है कि अस्तित्व से क्या का उत्तर मिल सकता है। क्यों का कोई उत्तर नहीं मिल सकता। विज्ञान भी पूछता है, क्या? विज्ञान पूछता है, पानी क्या है? 

      _हाइड्रोजन और आक्सीजन। आप पूछें कि क्यों हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलते हैं? वैज्ञानिक कहेगा, दार्शनिक से पूछो। हमारी लेबोरेटरी में हम क्या खोजते हैं। हम बता सकते हैं कि हाइड्रोजन और आक्सीजन से मिलकर पानी बनता है। क्या, हम बताते हैं। कैसे, हम बताते हैं। क्यों, कृपा करके हमसे मत पूछो।_

       या तो पागलों से या फिलासफर से, इनसे क्यों पूछो। वैज्ञानिक कहता है कि हम कितना ही खोजें, हम इतना ही जान सकते हैं कि क्या! और जब हमें क्या पता चल जाए, तो हम जान सकते हैं, कैसे! पानी हाइड्रोजन और आक्सीजन से मिलकर बना है, हमने जान लिया–व्हाट। 

     अब हम खोज कर सकते हैं कि कैसे मिला है। इसलिए विज्ञान क्या की खोज करता है और कैसे को प्रयोगशाला में ढूंढ़ लेता है। धर्म भी अस्तित्व के क्या की खोज करता है और योग में कैसे की प्रक्रिया को खोज लेता है। इसलिए धर्म का जो आनुषांगिक अंग है, वह योग है। और विज्ञान का जो आनुषांगिक अंग है, वह प्रयोग है। 

       लेकिन धर्म का कोई संबंध नहीं है क्यों से। क्योंकि एक बात सुनिश्चित है कि हम अस्तित्व के क्यों को न पूछ पाएंगे। अस्तित्व है, और यहीं बात समाप्त हो जाती है। 

       कृष्ण कह रहे हैं कि ऐसा है कि वह जो आत्मा है, वह मरणधर्मा नहीं है। पूछें, क्यों? तो क्यों का कोई सवाल ही नहीं है। ऐसा है, थिंग्स आर सच।

     वह जो आत्मा है, वह आत्मा जल नहीं सकती, जन्म नहीं लेती, मरती नहीं। क्यों? कृष्ण कहेंगे, ऐसा है। अगर तुम पूछो कि कैसे हम जानें उस आत्मा को, तो रास्ता बताया जा सकता है–जो नहीं मरती, जो नहीं जन्मती। लेकिन अगर पूछें कि क्यों नहीं मरती? 

        कृष्ण कहते हैं, कोई उपाय नहीं है। यहां जाकर सब निरुपाय हो जाता है। यहां जाकर आदमी एकदम हेल्पलेस हो जाता है। यहां जाकर बुद्धि एकदम थक जाती और गिर जाती है। लेकिन बुद्धि क्यों ही पूछती है। उसका रस क्यों में है। क्योंकि अगर आप क्यों पूछें, तो बुद्धि कभी न गिरेगी और कभी न थकेगी, कभी न मरेगी। वह पूछती चली जाएगी, पूछती चली जाएगी, पूछती चली जाएगी। 

    एक ब़ूढी औरत, नानी है। बच्चे उसे घर में घेर लेते हैं और कहानी पूछते हैं। वह थक गई है, उसकी सब कहानियां चुक गई हैं। लेकिन बच्चे हैं कि रोज पूछे ही चले जाते हैं। वे फिर-फिर कहते हैं रोज रात, कहानी! 

      वह ब़ूढी थक गई है, उसकी सब कहानियां चुक गई हैं। अब वह क्या करे और क्या न करे! और बच्चे हैं कि पीछे पड़े हैं। तो फिर उसने एक कहानी ईजाद की। ठीक वैसी ही जैसी परमात्मा की कहानी है। 

    उसने कहानी ईजाद की। उसने कहा, एक वृक्ष पर अनंत पक्षी बैठे हैं। बच्चे खुश हुए, क्योंकि अनंत पक्षी हैं, कथा अनंत चल सकेगी। उसने कहा, एक शिकारी है, जिसके पास अनंत बाण हैं। उसने एक तीर छोड़ा। 

     तीर के लगते ही वृक्ष पर, एक पक्षी उड़ा। बच्चों ने पूछा, फिर? उस बूढ़ी ने कहा, उस शिकारी ने दूसरा तीर छोड़ा, फिर एक पक्षी उड़ा। बच्चों ने पूछा, फिर! उस बूढ़ी ने कहा, फिर शिकारी ने एक तीर छोड़ा। फिर एक पक्षी उड़ा–फुर्र। बच्चों ने पूछा, फिर! फिर यह कहानी चलने लगी, बस ऐसे ही चलने लगी। 

     फिर बच्चे थक गए और उन्होंने कहा, कुछ और नहीं होगा? उस बूढ़ी स्त्री ने कहा कि अब मैं थक गई हूं, अब और कहानी नहीं। अब यह एक कहानी काफी रहेगी। अब तुम रोज पूछना। फिर उसने एक तीर छोड़ा–अनंत हैं तीर, अनंत हैं पक्षी। 

यह जो हमारे क्यों का जगत है, वह ठीक बच्चों जैसा है, जो पूछ रहे हैं, क्यों? क्यों का सवाल चाइल्डिश है, यद्यपि बहुत बुद्धिमान लोग पूछते हुए मालूम पड़ते हैं। 

     असल में बुद्धिमानों से ज्यादा बाल-बुद्धि के लोग खोजने मुश्किल हैं। क्यों का सवाल एकदम बचकाना है। लेकिन बड़ा कीमती मालूम पड़ता है। क्योंकि दुनिया में जिनको हम बुद्धिमान कहते हैं, वे यही पूछते रहे हैं। चाहे वे यूनान के दार्शनिक हों, चाहे भारत के हों और चाहे चीन के हों, वे यह क्यों ही पूछते रहे हैं। और फिर क्यों के उत्तर खोजते रहे हैं। 

     _किसी उत्तर ने किसी को तृप्ति नहीं दी। किसी उत्तर से हल नहीं हुआ। क्योंकि हर उत्तर के बाद पूछने वाले ने पूछा, क्यों? फिर एक तीर, फिर पक्षी उड़ जाता है। और फिर इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है। इसलिए मैंने निरंतर पीछे आपसे कहा कि यह किताब मेटाफिजिकल नहीं है।_

      यह कृष्ण का संदेश जो अर्जुन को है, यह कोई दार्शनिक, कोई तत्व-ज्ञान का नहीं, यह मनस-विज्ञान का है। इसलिए वे कह रहे हैं, ऐसा है। और एक आत्मा जब यात्रा करती है, तो कैसे यात्रा करती है, वह मैंने आपसे कहा। 

      यात्रा का क्या–इतना ही ज्ञात है, इतना ही ज्ञात हो सका है, इतना ही ज्ञात हो सकता है, इससे शेष अज्ञात ही रहेगा। वह यह कि स्वतंत्रता के पूर्ण अनुभव के पहले परतंत्रता का अनुभव जरूरी है। मुक्ति के पूरे आकाश में उड़ने के पहले किसी कारागृह, किसी पिंजरे के भीतर थोड़ी देर टिकना उपयोगी है। उसकी यूटिलिटी है।

       इसलिए आत्मा यात्रा करती है और जब तक आत्मा बहुत गहरी नहीं उतर जाती पाप, अंधकार, बुराई, कारागृह में, तब तक लौटती भी नहीं। कल कोई दोपहर मुझसे पूछता था कि वाल्मीकि जैसे पापी उपलब्ध हो जाते हैं ज्ञान को! तो मैंने कहा, वही हो पाते हैं। 

      जो मीडियाकर हैं, जो बीच में होते हैं, उनका अनुभव ही अभी पाप का इतना नहीं कि पुण्य की यात्रा शुरू हो सके। इसलिए वे बीच में ही रहते हैं। लेकिन वाल्मीकि के लिए तो आगे जाने का रास्ता ही खतम हो जाता है; कल-डि-सैक आ जाता है; वहां सब रास्ता ही खतम हो जाता है।

       अब और वाल्मीकि क्या पाप करें? आखिरी आ गई यात्रा। अब दूसरी यात्रा शुरू होती। इसलिए अक्सर गहरा पापी गहरा संत हो जाता है। साधारण पापी साधारण सज्जन ही होकर जीता है। जितने गहरे अंधकार की यात्रा होगी, उतनी अंधकार से मुक्त होने की आकांक्षा का भी जन्म होता है; उतनी ही तीव्रता से यात्रा भी होती है दूसरी दिशा में भी। 

       इसलिए आत्मा निष्क्रिय होते हुए भी कामना तो करती है यात्रा की। निष्क्रिय कामना भी हो सकती है। आप कुछ न करें, सिर्फ कामना करें। लेकिन आत्मा के तल पर कामना ही एक्ट बन जाती है, दि वेरी डिजायर बिकम्स दि एक्ट। 

       _वहां सिर्फ कामना करना ही कृत्य हो जाता है। वहां कोई और कृत्य करने की जरूरत नहीं होती। इसलिए शास्त्र कहते हैं कि परमात्मा ने कामना की, तो जगत निर्मित हुआ। बाइबिल कहती है कि परमात्मा ने कहा, लेट देअर बी लाइट, एंड देअर वाज़ लाइट। कहा कि प्रकाश हो, और प्रकाश हो गया।_ 

       यहां प्रकाश हो और प्रकाश के हो जाने के बीच कोई भी कृत्य नहीं है; सिर्फ कामना है। आत्मा की कामना कि अंधेरे को जाने, कि यात्रा शुरू हो गई। आत्मा की कामना कि मुक्त हों, कि यात्रा शुरू हो गई। आत्मा की कामना कि जानें परम सत्य को, कि यात्रा शुरू हो गई। और आपको अगर कृत्य करने पड़ते हैं, तो वे इसलिए करने पड़ते हैं कि कामना पूरी नहीं है। 

      असल में कृत्य सिर्फ कामना की कमी को पूरा करते हैं, फिर भी पूरा नहीं कर पाते। अगर कामना पूरी है, तो कृत्य तत्काल हो जाता है। 

     अगर आप इसी क्षण पूरे भाव से कामना कर पाएं कि परमात्मा को जानूं, तो एक सेकेंड भी नहीं गिरेगा और परमात्मा जान लिया जाएगा। 

     अगर बाधा पड़ती है, तो कृत्य की कमी से नहीं; बाधा पड़ती है, भीतर मन ही पूरा नहीं कहता। वह यह कहता है, जरा और सोच।

           _[इतना सब आपने पढा। जैसे ही पढ़कर हटे, सब पर पानी फिरा। “मैं आत्मा हूं, मैं अमर हूँ !”– ये सब अभी की तरह जाने कब से, जन्मों से सुन-पढ़ रहे हो और हो ग़ोबर-गणेश ही। अनुभव अहम है : आनंदति रहने और मोक्ष में जीते-जी स्थित होने के लिए। तभी आवागमन के चक्र से मुक्ति होगी। ये अनुभव मिलता है प्रेम में ‘अद्वैत’ या ध्यान में ‘शून्य’ होने से। ऐसा प्रेम आज के दौर में संभव नहीं। ध्यान के लिए आप ‘खुद को’~ ‘सिर्फ़ हमें’ 15 दिन के लिए भी दे सकें, तो चाबी आपके हाथ में हो सकती है।]_

 👁️चेतना विकास मिशन👁️

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Ramswaroop Mantri

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