डॉ. विकास मानव
_साधारणतया जब भी हम ध्यान के लिए बैठते हैं तो प्रयास करते हैं कि किसी तरह से ध्यान लग जाये। इस प्रयास में हममें से कई लोग ‘त्राटक ‘ का माध्यम अपनाते हैं, कई लोग किसी मंत्र के जप के साथ मन्त्र के देवी- देवता पर ध्यान लगाते हैं, कई एक ओंकार जपते हुए ध्यान की प्रक्रिया करते हैं, लेकिन बहुत-से ऐसे भी लोग हैं जो न कोई जप करते हैं, न किसी का ध्यान करते हैं, वे सिर्फ सहज स्थिति में बैठकर पद्मासन या सुखासन लगाकर अपने आते-जाते हुये श्वास-प्रश्वास को देखते हैं।_
बहरहाल, विधि कोई भी हो, किसी एक विधि को अपनाकर ध्यान लगाना आरम्भ कर देना चाहिए।
_ध्यान की प्रक्रिया शुरू करने से पहले कुछ विशेष् बातों को जानना आवश्यक है : आप चाहे किसी भी विधि को अपनाने वाले क्यों न हों, यदि आपने अपने तन-मन को शुद्ध नहीं किया, अपने आसन को शुद्ध नहीं किय, दिशा और एकान्त का ख्याल नहीं किया और सबसे महत्वपूर्ण है–संकल्प जिसे नहीं किया तो आप लाख प्रयत्न करते रहें, आपका ध्यान न तो सधेगा और न तो वह घटित ही होगा।_
आरम्भ में संकल्प करना, जल और दीप का सहयोग लेना उतना ही आवश्यक है जितना कि काष्ठ की चौकी पर कम्बल डालकर और रात्रि को पश्चिममुख होकर बैठना।
_चूँकि ध्यान का सीधा सम्बन्ध मन से है, मनोमय जगत् से और है मनोमय शरीर से है तो मन को सहज, स्थिर और एकाग्र करना सरल नहीं है। क्योंकि मनोमय जगत् और मनोमय शरीर हमारा चौथा तल है। हम सीधे चौथे तल में प्रवेश कैसे कर सकते हैं ?_
इससे पूर्व तीसरा तल सूक्ष्मशरीर और सूक्ष्म जगत् का है और दूसरा तल् है भाव शरीर और भाव जगत् का। यदि कोई कहे कि मेरा ध्यान लग गया तो वह लाख कहता रहे, ध्यान नहीं लगेगा। वह दूसरों को तो धोखा दे ही रहा है, अपने को भी धोखा दे रहा हैं।
जब भी हम ध्यान करते हैं तो सबसे पहले भाव जगत् में भाव शरीर के माध्यम से प्रवेश करते हैं। भाव जगत् वासना जगत् भी कहलाता है, अतः भाव जगत् के प्राणी तामसिक प्रवृत्ति की आत्माओं के उत्पात करने की आशंका बढ़ जाती है। उत्पात होता भी है। मगर धैर्य रखने की आवश्यकता होती है।
_ध्यान की साधना मन की साधना है, मन की एकाग्रता और स्थिरता की साधना है और मन है कि ईश्वर् के द्वारा दिया गया मयारूप है। मन ही माया है, मन ही विचारों की दुनियां है। मन है तो विक्षोभ है, वासना है, कामना है, इच्छा है, कल्पना है। इन सबका मिला-जुला रूप ही संसार-जाल है, भव-चक्र है।_
जब ईश्वर् ने आरंभ काल में जीव की रचना की और सृष्टि के चरम विकास के रूप में मानव का निर्माण किया तो उसे वे सब तत्व दिये जो ब्रह्मांड में विद्यमान हैं–‘यतपिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’।
सृष्टि की प्रक्रिया में ईश्वर् ने मनुष्य को जहां एक ओर मायारूपी मन प्रदान किया, वहीं दूसरी ओर प्राण-शक्ति (दस प्राणों की शक्ति–प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान–मुख्य प्राण तथा पांच उपप्राण–नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।) प्रदान की।
_मनुष्य को पांच ज्ञान इन्द्रियाँ (आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा ) और पांच कर्म इन्द्रियाँ (हाथ, पैर, मुख, लिंग और गुदा) प्रदान कीं। इन दसौं इन्द्रियाँ का संचालनकर्ता मनुष्य का मन है।_
मन आंखों के द्वारा देखता है और सौंदर्यबोध का भाव अपने भीतर न केवल पैदा करता है, बल्कि उस भाव को अपने चेतन स्वरूप में संग्रहीत भी कर लेता है, बाद में वही अचेतन का हिस्सा बन जाता हैं।
इसी प्रकार मनुष्य का मन कर्णप्रिय संगीत, मधुर से मधुर ध्वनि या शब्द कानों के माध्यम से सुनता है और उसे भी अपने मस्तिष्क के एक भाग् में स्मृति के रूप में संजोकर रख छोड़ता है। इसी प्रकार मन् अपनी सभी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा अपने अपने विषय ग्रहण करता है जिनकी सूक्ष्म स्मृतियां अपने में समेटता रहता है।
_मन के द्वारा जो भी देखने, सुनने, चखने, सूंघने और स्पर्श करने के कार्य किये जाते हैं वे सब सूक्ष्म कार्य कहलाते हैं जिनके माध्यम से विभिन्न प्रकार के भाव, विचार के संस्कार बनते हैं। अब मन अपनी कर्मेन्द्रियों के द्वारा जो भी कार्य करता है, वे सब मनुष्य के द्वारा किये गए स्थूल कर्म कहे जाते हैं।_
मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों द्वारा किये गए सूक्ष्म कर्म हों या कर्मेन्द्रियों द्वारा किये गए स्थूल कर्म हों–सबके समयानुसार कर्माणु बनते हैं और वे कर्माणु ही समय पाकर कर्मफल में बदल जाते हैं जिनको मनुष्य इस जन्म में और अगले किसी जन्म में भोगता रहता है।
अब प्रश्न उठता है कि मनुष्य इन कर्मबन्धनों से कैसे मुक्ति प्राप्त कर् सकता है ? कैसे अपने प्रारब्ध से छुटकारा प्राप्त कर सकता है ?
_कर्म बन्धनों से मुक्ति प्राप्ति करने के उपायों को ही साधना या तपश्चर्या कहा जाता है। जितने भी प्रकार की उपासनाएँ, आराधनाएं, पूजाएँ हैं, उनका सबका एकमात्र उद्देश्य है अपने आपको उस स्तर तक उठाना ताकि मनुष्य ईश्वर् के निकट अपने आपको अनुभव कर् सके।_
इस प्रक्रिया में वह अपने स्थूल शरीर को अधिकाधिक शुद्ध, स्वच्छ और निर्मल करता है ताकि शरीर स्वस्थ, स्फूर्त और हल्का बन सके। इन्हीं सबके लिए सात्विक भोजन करने का शास्त्रों में उल्लेख हुआ है। व्रत, उपवास, यम, नियम और आसन हमारे स्थूल शरीर को शुद्ध, निर्मल कर साधना करने के योग्य बनाते हैं।
_अभी तक मनुष्य अपने स्थूल शरीर को साधने के उपाय कर् सकता है। जब उसका स्थूल शरीर इस योग्य बन जाये तो फिर वह अपने दूसरे तल के शरीर को साधने को सोच सकता है। दूसरा तल है भाव शरीर का, भाव जगत् का या वासना जगत् का। इस शरीर को शुद्ध करने के लिए हमें अपने भाव और विचारों को शुद्ध और निर्मल करना पड़ता है।_
अशुद्ध और निकृष्ट विचारों वाला मनुष्य यदि शक्ति-साधना करता है तो उसकी अर्जित शक्ति का दुष्टतापूर्ण कार्यों में उपयोग होता है। क्योंकि दुष्ट विचारों वाला व्यक्ति अपनी शक्ति का नियोजन दुष्ट कार्यों में ही कर् सकता है।
इसलिए मनुष्य को पहले अपने इरादे अच्छे करने चाहिए तब साधना करने को सोचना चाहिए.
ध्यान करना एक यौगिक क्रिया है। ध्यानयोग का परम उद्देश्य और उपलब्धि है–समाधि। जब कोई व्यक्ति, साधक अंतर्जगत में प्रवेश करना चाहता है तो उसे समाधि को उपलब्ध् होना ही पड़ता है। किसी सेवाभावी दक्ष प्रशिक्षक प्रत्यक्ष संपर्क द्वारा उसकी ऊर्जा से शक्तिकृत होना संभव हो तो मंज़िल सुनिश्चित हो जाती है. व्हाट्सप्प 9997741245 पर संपर्क कर के हमारी निःशुल्क सेवा ली जा सकती है.
_अंतर्जगत का मतलब है–सूक्ष्म जगत्। जब तक सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर् सूक्ष्म शरीर द्वारा साधना नहीं करता है, तब तक अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। स्थूल शरीर से सैकड़ों, हज़ारों वर्ष तक साधना करते रहना कोई उपलब्धि नहीं है। केवल अपने को भ्रान्ति में डाले रहना कि हम साधना कर् रहे हैं।_
साधना करना और साधना करने का भ्रम पालना अलग-अलग है। जो व्यक्ति यह कहता है कि वह साधना करते हुए उस उच्च अवस्था को प्राप्त हो चुका है जिसे समाधि की अवस्था कहते हैं तो यह बहुत कुछ सम्भव है वह साधना-साधना कहकर साधना की मादकता में डूब जाने को ही साधना समझता है।
साधना करने और साधना समझने की मादकता में ज़मीन-आसमान का अंतर है।
_बहुत से लोग जो विद्वान् नहीं, केवल अन्ध विश्वासी ही हैं, वे भजन-कीर्तन, पूजा-उपासना को ही साधना समझते हैं और उसी में मस्त रहते हैं। वह सब साधना नहीं होती।_
साधना होती है–शरीर साधना, श्वास-प्रश्वास साधना अर्थात् प्राण साधना, मन को साधना और अन्त में आत्मा को साधना। सूक्ष्म शरीर से साधना करने को ही सही मायने में आध्यात्मिक साधना करने की शुरुआत कहते है।
{लेखक मेडिटेशन रिसर्च फाउंडेशन, यूएसए अधिकृत ध्यानप्रशिक्षक एवं मनोचिकित्सक हैं}





