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बेरोजगारों के बबाल से, हल कैसे होंगे सवाल ?

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सुसंस्कृति परिहार
इंतहा हो गई इंतज़ार की—-अब जागे हैं युवा जब उनके हाथ से बहुत से रोजगार के बड़े केन्द्र कारपोरेट ने हस्तगत कर लिए ।एक बार नहीं दो दो बार उस सरकार को चुना गया जिसके लहू में व्यापार और मनुवादी संहिता तरंगें मार रही थीं।संघ ने अन्ना को हीरो बनाकर निरंतर प्रगति करती पिछली सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार और कालेधन का ऐसा झूठा संजाल रचा कि जनता उसमें बुरी तरह फंस गई जबकि आज तक उस सरकार पर कोई इल्ज़ाम साबित नहीं हुआ। उधर तथाकथित राष्ट्र भक्त सरकार ने जो गुजरात में नरसंहार के लिए जिम्मेदार थी उसकी ताजपोशी के बाद ही यह तय था कि मोदी सरकार एक लक्ष्य के साथ सत्तारूढ़ हुई है जिसका ख़्वाब उनके आकाओं ने आज़ादी के बाद गांधी की हत्या में देखा था। हिंदू राष्ट्र बनाने प्रतिबद्ध यह सरकार सिर्फ अल्पसंख्यकों की शत्रु नहीं बल्कि आदिवासी,दलित, पिछड़े वर्ग और महिलाओं की तरक्की के ख़िलाफ़ है। पहले ही कहा जा चुका है वह मनुवादी व्यवस्था लाना चाहती है जिसमें दो तीन कौमों को छोड़कर बाकी सब गुलाम हों ,दास हो।उनके बराबरी के अधिकार छीने जाएं।
आज जे एन यू के वे नारे दोहराने होंगे जो कन्हैया कुमार और विश्वविद्यालय के छात्र जोश-खरोश से लगाते रहे हैं उनमें वर्तमान सरकार से उभरी तमाम पीड़ाएं  सामने आई थीं  उन छात्रों को देशद्रोही कहा गया  जेल में डाला गया । पाकिस्तानी कहा गया।जबकि आज तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई।फर्जी वीडियो  सामने आ गया लेकिन संविधान बचाने की बात कहने वाले अभी भी जेल में हैं।शरजील के साथ का सुलूक भी याद करिए। लापता मुजीब की मां का दर्द भी महसूस करिए।हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित प्रतिभाशाली छात्र रोहित वेमुला के साथ कितनी ज़ुल्म ज़्यादतियां हुईं कि उसे आत्महंता बनना पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय में हुए सितम पर भी हम ख़ामोश रहे।
आज वही सरकार रेल्वे की NTPC  परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर अपनी गलती ना मानते हुए छात्रों को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ और बिहार के पटना,गया, नवादा, जहांनाबाद में बुरी तरह पिटवाई है। उत्तर प्रदेश में तो चुनावी दौर है तब इस तरह बेरोजगार नौजवानों की पिटाई होना दो तरह के संकेत देता है या तो पुलिस ने पूरी तरह सोच रखा है कि सरकार को बदनाम कर उसे गिराना है और वे बेरोजगारों को उत्तेजित कर योगी का खेल बिगाड़ना चाह रहे हैं।दूसरा यह कि वे युवाओं को चिन्हित कर उन्हें भविष्य में रोजगार से विमुख कर देना चाहते हैं । गणतंत्र दिवस पर युवाओं के मौलिक अधिकारों के प्रति सरकार का ये रवैया निंदनीय है। पुलिस का लाज  में घुसकर तोड़फोड़ के जो दृश्य आए हैं उन्हें देखकर यही लगता है कि शायद पुलिस आतंकवादियों को तलाश रही है।दूसरे दिन पुलिस अधिकारी लाज के बाहर आकर माफी मांगकर ताली बजवाता है।बड़ी धोखे हैं बाबू जरा संभलना।एक दिन पहले संगम पर बताया जाता है कि हज़ारों युवक और युवतियां सरकार के विरोध में मुंडन कराने गए थे उन्हें भी बुरी तरह खदेड़ा गया।
बिहार पटना में वाममोर्चे के युवा जत्थे ने रोजगार आवेदनों के नि: शुल्क होने की आवाज़ उठाई उन पर भी दमनात्मक कार्यवाही की गई।यहां तक पांच कोचिंग सेंटर को भी लपेटे में लिया।तीन माले विधायक भी घेरे में हैं। बेरोजगार परीक्षा की रीतिनीति के विरोध में छात्रों ने आक्रोशित होकर चार जगह रेल इंजन और खाली बोगियों में आग लगाई।समय रहते उनको समझाया जा सकता था।शायद ये कृत्य बच जाता। 28जुलाई को बिहार बंद को महागठबंधन का पूरा समर्थन मिला।सभी वाम विद्यार्थी संगठन और एन एस यू आइ के आव्हान पर बंद किया गया था।

7 lakh unemployed increase in Madhya Pradesh in one year | एक साल में बढ़े  7 लाख बेरोजगार, 28 लाख पहुंचा बेरोजगारी का आंकड़ा, 34 हजार को ही मिला रोजगार  | Patrika News


बाद में रेलमंत्री ने जो कुछ कहा उस पर बेरोजगारों को भरोसा नहीं ।वे आंदोलन जारी रखने वाले हैं। याद  करिए इकलौता चैनल एनडीटीवी ने बेरोजगार मसले और परीक्षाओं पर लगभग छै महीने लगातार जिस तरह दिखाया उस वक्त उन्हें टोल किया गया।कुछ जगहों पर नौकरियां इस कारण मिली। लेकिन युवाओं का ध्यान पूरी तरह भाजपा के आई टी सेल ने बांध के रखा ।वे ख़ामोश रहे। चुप-चुप अपनी नियुक्ति के इंतजार और भाजपा को जिताने की कसरत में लगे रहे। इससे मोहभंग ज़रूरी है। बिहार में तो भाजपा सदस्य बेरोजगारों की खौल भी सोशल मीडिया ने दिखाई।

आज युवा बेरोजगार और छात्र जागा है उसे किसानों की तरह एक मज़बूत युवा बेरोजगार संघर्ष मोर्चा बनाकर अहिंसात्मक तरीके से सबसे पहले कारपोरेट से वे सब रोजगार केन्द्र वापस लेने का उपक्रम करना चाहिएजो बड़ी संख्या में रोजगार देने वाले हैं। निजीकरण पर पूरी तरह जब रोक लगेगी तब रोजगार के अवसर नहीं निकलेंगे ,बेरोजगार इसी तरह सालों साल परीक्षाओं के कुचक्र में उलझे रहेंगे।बेरोजगार किसी भी विभाग का हो उनके साथ हुए अन्याय को सामूहिक मुद्दा में शामिल किया जाए।जो विभिन्न संस्थाओं से बाहर किए गए बेरोजगार हैं उन्हें भी साथ लें। चूंकि इस सरकार ने छात्रसंघ चुनाव ख़त्म कर दिए हैं इसलिए जुझारू साथियों के चयन जिम्मेदारी छात्रों को सौंपी जाए। किसान मोर्चे से मार्गदर्शन लें जिसमें पांच सौ से अधिक किसान संगठन शामिल थे।
जो कहते हैं छात्रों को राजनीति में नहीं आना चाहिए उनसे सवाल कीजिए फिर वोट का अधिकार क्यों ? दुनिया के सबसे बड़े और श्रेष्ठ नेता विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ से ही निकले हैं।यह ज़रूरी है कि छात्रों को वोट देने से पहले अपनी वैचारिक स्थिति बनानी होगी। इसके लिए उन्हें अध्ययन भी करना होगा।याद करिए जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को ।जब तक झूठे, और संविधान विरोधी लोग आते रहेंगे हैं बेरोजगारी के सवाल का हल मुमकिन नहीं। 2024 चुनाव से पहले इस मसले पर सबको जुटना होगा।

Ramswaroop Mantri

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