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इंसनियत है धर्म : दो मूलभूत मुद्दे

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 पुष्पा गुप्ता

क्या मुसलमान चार बीबियां रखते हैं और तमाम बच्चे पैदा करते हैं? क्या मुसलमान लोग हिन्दुओं को अशुद्द बनाते हैं? आइए देखते हैं.
दोनों सवालों के सोदाहरण जबाब लोकप्रिय शब्दशिल्पी हिमांशु कुमार ने दिया है.

(1). 04 बीवियों, 40 औलादों वाले मुसलमान और हम हिन्दू :
04 बीबियों और 40 बच्चों वाला तो छोड़ो, 10 बच्चों वाला मुसलमान भी मैंने नहीं देखा। अलबत्ता मेरे खुद के ताऊ जी के 18 बच्चे हुए। दादी के 10 हुए।
मेरा एक हिंदू दोस्त चौदह भाई बहन थे। मैं ऐसे बहुत सारे हिंदुओं को जानता हूं जिनके पिता की एक से ज्यादा पत्नियां थीं। मेरा एक साथी है जिसकी तीन बीवियां हैं, वह मुसलमान नहीं है।
फिर भी हम लगातार बकर बकर करते रहते हैं कि मुसलमान चार शादियां करते हैं और उनके 40 बच्चे होते हैं।

हमें आंख खोल कर अपने आसपास की सच्चाई से कुछ नहीं सीखना होता। कोई कुछ बता दे उसी को सच मानकर जीवन गुजार देते हैं।
वैसे तो हमारे धर्म ने हमें यही सिखाया है कि प्रश्न मत करो, तर्क मत करो, श्रद्धापूर्वक चुपचाप सब स्वीकार कर लो। उसने हमारे दिमागों को कुंद कर दिया है।
मैंने एक बार कहा कि आजकल मुसलमान ट्रेनों में नॉनवेज खाना ले जाने में डरने लगे हैं कि कोई बीफ का इल्जाम लगाकर उन्हें लिंच न कर दे।
इस पर हमारे एक रिश्तेदार बोले- तो यह लोग भी तो पाकिस्तान में हिंदुओं को परेशान करते हैं।
मैंने जवाब दिया- पाकिस्तान में मुसलमान क्या कर रहे हैं, उसके लिए भारत के मुसलमान से बदला लिया जाएगा क्या?
वह बोले- हां हैं तो यह सब एक ही।
मैंने कहा- अगर एक मुसलमान की गलती की सजा दूसरे को दी जा सकती है, तो फिर तो यह नियम हिंदू पर भी लागू होना चाहिए।
फिर तो हाथरस में अगर हिंदुओं ने बलात्कार किया तो सजा आपको दी जा सकती है।
बोले- क्यों हमें कैसे दी जा सकती है? हम अलग हैं वह अलग हैं।
मैंने कहा- यह तो कमाल है! आप एक मुसलमान की गलती की सजा दूसरे मुसलमान को देने के लिए तैयार हैं, लेकिन एक हिंदू की गलती की सज़ा दूसरे हिंदू को देने के लिए तैयार नहीं हैं।
हिंदू के लिए एक नियम मुसलमानों के लिए दूसरा नियम देश ऐसे कैसे चलेगा?
लेकिन वे आखिर तक ना ना में सिर हिलाते रहे। मुझ से सहमत नहीं हुए।

टीवी और व्हाट्सएप ने दिमागों को बिल्कुल सोचने लायक नहीं छोड़ा है. अब हम सामान्य तर्क इस्तेमाल करने की हालत में भी नहीं बचे हैं।
सत्ताधारी दल को ऐसी ही बेवकूफ जनता चाहिए जो न तर्क इस्तेमाल कर सके न सवाल उठा सके।इससे उसकी सत्ता को कभी खतरा नहीं पैदा होता।
मैं इस बात से डरता हूं कि अगर देश की जनता आपस में धर्म के आधार पर एक दूसरे से इतनी नफरत करेगी और सामान्य तर्क का भी इस्तेमाल नहीं करेगी तो आखिर यह देश कैसे बचेगा?


(2). मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं की अशुद्धि :
गावों में बसते भारत में आज भी मुसलमानों की शादियों में हिंदुओं के लिए एक पंडाल अलग से लगता है, जिसमें हिंदू हलवाई अलग से खाना बनाता है और हिंदू पड़ोसी उसमें खाते हैं।
लेकिन मैंने एक भी शादी ऐसी नहीं देखी, जिसमें हिंदुओं ने मुसलमानों के लिए अलग से हलाल खाने की व्यवस्था की हो।
अगर उदार हिंदू मुसलमानों को अपनी शादी में बुलाते भी हैं, तो मुसलमान खुद ही खुशी-खुशी शाकाहारी खाना खाते हैं। वह कभी इस बात की शिकायत नहीं करते कि हमारे लिए अलग व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

मैंने अनेक जगह सांप्रदायिक हिंसा के बाद राहत का काम किया है। पीड़ित मुसलमान यह जानने के बाद कि मैं हिंदू हूँ. मेरे लिए दुकान से कोल्ड ड्रिंक मंगवाते थे, क्योंकि उन्हें स्वाभाविक तौर पर लगता है कि मैं उनके घर की बनी हुई चाय नहीं पीऊंगा।

यह देख कर मेरा दिल बहुत टूटता था और मैं अक्सर चाय नापसंद करने वाला होकर भी उनका यह वहम तोड़ने के लिए उनके घर की चाय पीता था।
अपने किसी मुसलमान दोस्त को लेकर हिंदू मंदिर में जाने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई।
अलबत्ता मैं खुलेआम बिना डरे अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ उनकी मस्जिद में गया। मैं आराम से एक तरफ बैठा रहा। उन लोगों ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी नमाज पढ़ी। उन्हें एक हिंदू के वहां बैठे रहने से कोई परेशानी नहीं हुई।

शुद्धतावाद हिंदू धर्म का मूल आधार है। यहां शुद्धता के नाम पर दूसरी जातियों, वर्णों से नफरत की गई। महिलाओं को पाप योनि कहा गया। यहां तक कि अपने ही शरीर के बाएं हिस्से को अशुद्ध कहा गया है।
जो सबको अशुद्ध कहकर दूर करता जाएगा, वह अकेला हो जाएगा और कमजोर हो जाएगा। यही हिंदू धर्म का सबसे बड़ा संकट है।
हिंदू धर्म के सामने खतरा मुसलमानों, ईसाइयों या कम्युनिस्टों की तरफ से नहीं है। इसके भीतर से है। वह इसकी बनावट में ही मौजूद है।

यह दूसरों को स्वीकार ही नहीं कर सकता। यह सब को दुत्कारता है. अपने ही धर्म के दलितों को जानवरों से भी बुरी हालत में रखने की वजह से लोग बराबरी की तलाश में या तो मुसलमान बने या ईसाई बने।
खुद में सुधार करने की बजाए अगर आप दूसरों की मस्जिदों पर हमला करते फिरेंगे, और उन पर झंडा लगाकर खुद को फैलाने की कोशिश करेंगे, तो वह कोशिश बेकार जाएगी।

आपके अपने जो लाखों मंदिर हैं, उनमें आप अपने ही धर्म को मानने वाले करोड़ों दलितों के घुसने पर रोक लगा कर बैठे हुए हैं। प्रेम धर्म है दंगा करना धर्म नहीं है।
आप सोचते हैं दंगा करने से आपका धर्म फैल जाएगा तो आप गलतफहमी में हैं।

Ramswaroop Mantri

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