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मैं इंदिरा का बेटा हूं : राजीव गांधी

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डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौ

    31 अक्टूबर 1984 को दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय ने लिया गया। किन्तु राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में सोनिया गांधी नहीं थीं। रशीद किदवई के अनुसार ‘‘राजीव गांधी जब एम्स पहुंचे तब सोनिया गांधी ने उन्हें रोकर आग्रह किया कि वो प्रधानमंत्री ना बनें। सोनिया ने उन्हें खतरे की तरफ आगाह किया। उसके जवाब में राजीव गांधी ने कहा कि ‘‘मैं इंदिरा गांधी का बेटा हूं, जो लोग मुझे नहीं पसंद करते हैं वो मुझे वैसे भी नहीं छोड़ेंगे।’ ये सुनकर सोनिया निरुत्तर हो गईं।’’
    जवाहर लाल नेहरू के नाती और इंदिरा गांधी के बड़े बेटे राजीव गांधी की राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी। उनकी पत्नी सोनिया गांधी भी यही चाहती थीं कि वो राजनीति से खुद को दूर रखें। इतने बड़े सियासी खानदान से होते हुए भी राजीव गांधी पायलट की नौकरी करते थे। भाई संजय गांधी की मौत के बाद हालात ऐसे बन गए कि मां की मदद के लिए उन्होंने राजनीति में कदम रखा। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में कई दिग्गज और वरिष्ठ नेता तो थे। रशीद किदवई बताते हैं, ‘‘राजीव गांधी के पास अनुभव नहीं था लेकिन तब कांग्रेस का जो कल्चर था उसमें इंदिरा के बेटे का विरोध करने की हिम्मत कौन करता। ना कांग्रेस संसदीय दल की मीटिंग हुई, ना वर्किंग कमेटी की मीटिंग हुई। सब आपाधापी में हुई। आज भी कांग्रेस में कोई विद्रोह नहीं कर सकता।’’
    राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को हुआ था. वो इंदिरा गांधी के बड़े बेटे थे. शुरुआत से ही उन्हें राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी. वो एक एयरलाइन में पाइलट की नौकरी करते थे। राजीव गांधी से कैम्ब्रिज से पढ़ाई पूरी की। यहीं उनकी मुलाकात सोनिया गांधी से हुई थी। दोनों ने 1968 में शादी रचा ली। भाई संजय गांधी के निधन के बाद राजीव राजनीति में अपनी मां के लिए आए। सोनिया गांधी भी उन्हें राजनीति में आने से रोकती रहीं लेकिन इंदिरा गांधी की अचानक मृत्यु के बाद राजीव को देश की बागडोर संभालनी पड़ी।
    इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्जेंडर ने अपनी किताब ‘माई डेज विद इंदिरा गांधी’ में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटों के भीतर उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के गलियारे में सोनिया और राजीव को लड़ते हुए देखा था।
    राजीव सोनिया को बता रहे थे कि पार्टी चाहती है कि ‘मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूँ’. सोनिया ने कहा हरगिज नहीं। ‘वो तुम्हें भी मार डालेंगे।’ राजीव का जवाब था, ‘मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मैं वैसे भी मारा जाऊँगा।’ सात वर्ष बाद राजीव के बोले वो शब्द सही सिद्ध हुए थे.
    अब से 30 वर्ष पूर्व 21 मई 1991 को राजीवगांधी को देशवासियों ने वक्त से पहले खो दिया। श्रीपेरंबदूर में एक धमाके में राजीव गांधी की मौत हो गई थी। श्रीलंका में प्रभाकरन के नेतृत्व में तमिल संगठन लिट्टे द्वारा वहां की सरकार के विरुद्ध विद्रोह चलाया जा रहा था। श्रीलंका के आग्रह पर विद्रोह से मुकाबला करने के लिए भारत ने वहां सहायतार्थ भेजी हुई थी। इस कारण लिट्टे भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी से खफा था और उसने राजीव गांधी की हत्या की साजिस रच डाली।
    10 वीं लोकसभा चुनाव 1991 के पहले चरण की वोटिंग हो चुकी थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए जोर-शोर से प्रचार अभियान में जुटे थे। इस कड़ी में तमिलनाडु के श्रीपेरंबदुर में 21 मई 1991 को कांग्रेस की जनसभा होनी थी। रैली में जबरदस्त भीड़ जुट चुकी थी, रात 10 बजकर 20 मिनट का समय हो रहा था, कांग्रेस जिंदाबाद के नारों से श्रीपेरंबदुर गूंज रहा था राजीव गांधी जनसभा को संबोधित करने के लिए मंच की ओर बढ़ चले थे।
    एक लगभग 30 साल की नाटी कद की सावली महिला राजीव गांधी की तरफ चंदन की माला लेकर बढ़ती है। हाथ मंे माला और चेहरे पर मुस्कान लेकर महिला राजीव गांधी के पैर छूने के लिए नीचे झुकती है और एक जोरदार धमाका होता है।
    एक पल में रैली का शोर संनाटे में बदल जाता है और चंद सेकेंडो के बाद चीखों का हाहाकार मच जाता हैं। धमाका इतना जबरदस्त था कि उसकी चपेट में आने वाले ज्यादातर लोगों के मौके पर ही परखच्चे उड़ गए। धमाके में जिंदा बचे लोगों की आंखें एक शख्स को ढूंढ रही थी वो थे भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी…. लेकिन इन आखों को कुछ नहीं मिला। राजीव गांधी सबकी आंखों से ओझल हो गये थे। धमाके से मची अफरा-तफरी के बीच राजीव गांधी का तलाश शुरू हुई तब देखा गया की राजीव गांधी का शरीर पीठ के बल जमीन पर पड़ा था। जी हां केवल शरीर जमीन पर पड़ा था राजीव गांधी का सिर धमाके में फट चुका था। मौजूद पत्रकारों के अनुसार राजीव गांधी के शरीर की पहचान उनके हाथ में पहनी हुई घड़ी से की गई।
    जॉर्ज 10 जनपथ घर के अंदर की तरफ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे. उन्होंने काँपती हुई आवाज में कहा ‘मैडम चेन्नई में एक बम हमला हुआ है।’ सोनिया जी ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, ‘इज ही अलाइव?’ जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया। रशीद बताते हैं- ‘इसके बाद सोनिया जी पर बदहवासी का दौरा पड़ा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीखघ् कर विलाप करते सुना। वो इतनी जोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे कांग्रेस नेताओं को वो आवाज साफ सुनाई दे रही थी. वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफजल थे।
    इंडो-श्रीलंका शांति समझौते के लिए राजीव गांधी 30 जुलाई 1987 को श्रीलंका गये हुए थे। वहां राष्ट्रपति भवन में उन्हें गार्ड आॅफ आनर के दौरन वहां के नौ सैनिक विजिथा रोहन विजेमुनी ने उन पर बंदूक की बट से हमला किया था। राजीव गांधी सही समय पर झुक गये थे, इस लिए राइफल का उन्हें हल्का सा धक्का लग पाया था। देश राजीव गांधी की सहादत को विस्मृत नहीं कर पायेगा।

Ramswaroop Mantri

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