जौरा – जगदीश शुक्ला )- शीर्श लेख की उपरोक्त पंक्तियों को आज हमारे अपने आदरणीय भाई जी ने सचमुच चरितार्थ कर दिखा दिया। वे अपने ही अंदाज में सचमुच इस असार दुनियां को अलविदा कहकर अपने आखिरी सफर को मुकम्मल करने रवाना हो गये। कदाचित यही उनका संतत्व था कि सब कुछ होते हुए भी यायावरी को अपना साध्य एवं कर्म को उन्होंने अपना साधन बनाया। इसके साथ ही गांधीवाद के एक एसे युग का भी अवसान हो गया जो अपने कथ्य को दूसरों से अमल में लाने के उपदेश देने से पूर्व उसको अपने आचरण में उतारकर मुकम्मल करने में विश्वास करती है। एसे कर्मवीर योद्वा द्वारा चंबल को अपनी कर्मस्थली बनाने से शायद चंबल की धरती भी अपने आपको कृतार्थ मानती है।
देश और दुनियां में शांति़.सद्भाव एवं भाईचारे का अलख जगाते हुए देश के युवाओं को राश्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराने बाले संस्कार दूत भाई जी जीवन की अथक यात्रा से थक कर अपनी अनंत यात्रा पर रवाना हो गये। लगता है भाई जी के दुखद निधन के साथ ही चंबल अंचल के भाल पर लिखा सन् 70 के दशक में हिंसा पर अहिंसा की विजय का साक्षी बागी समर्पण का गौरवपूर्ण इतिहास भी अचानक थकहार कर कहीं सोने चला गया। इसके साथ ही वह आवाज सदैब के लिये मौन हो गई जो देश के युवाओं में अपने मधुर गीत एवं प्रार्थनाओं से सभी धर्म एवं संप्रदायों का सम्मान प्रतिश्ठित कर राश्ट्र प्रेम के भावों से झंकृत कर देती थी। सच पूछो तो भाई जी के रूप में हम सभी ने बहुत कुछ खो दिया।
देश के युवाओं के चेतना पुंज,चंबल अंचल के एतिहासिक बागी समर्पण के सूत्रधार,अहिंसा के तीर्थ के रूप में देश और दुनियां को शांति,सद्भाव एवं अहिंसा का आलोक बिखेरता महात्मा गांधी सेवा आश्रम के संस्थापक गांधीवादी संत डा.एस.एन.सुब्बाराव के अवसान से देशभर के गांधी वादी आदर्शों के पहरूए आहत हैं वहीं चंबल अंचल का जर्रा-जर्रा व्यथित है। किसी को गुमान भी नहीं था कि मानव एवं राश्ट्र सेवा के लिये समर्पित गांधीवाद का यह अनूठा पथिक यूं अचानक अपना सामान समेट अपनी अनंत यात्रा के लिये रूखसत हो जायेगा। गुरूवार की अनसुबह असमय बजी मोबाईल की घंटी ने मुझे आशंकाओं से भर दिया क्यांकि कुलदीप तिवारी ने बुधवार की रात ही मुझे आदरणीय भाई जी की िंचंताजनक हालत की जानकारी दी गई थी। वही हुआ जिसका डर था फोन पर भाई जी के जयपुर में शांत होने की खबर मिलते ही मन गहरे अवसाद से भर गया। जैसे-तैसे अपने आप को संभाला तो भाई जी के सानिध्य की मीठी यादें दस्तक दे रहीं थीं। एक एसा मुकम्मल इंसान जिसने अपना समूचा जीवन चंबल अंचल की सेवा के लिये समर्पित ही नहीं किया अपितु चंबल अंचल को अपनी कर्मस्थली बनाकर उसे अपनी मातृभूमि से अधिक मान और प्रतिश्ठा दी। चंबल की धरती से उन्होंने अपना जो रिश्ता अपनी युवावस्था में बनाया उसे एक सच्चे सपूत की तरह अंतिम समय तक निबाहा। शायद भाई जी का यही महानता थी जिससे एक बार मिल लिये उसे सदैब के लिये अपना बना लिया। किसी से भी कितने ही अंतराल के बाद मुलाकात हो उसे नाम से पुकार कर घर गृहस्थी और आसपास के सभी लोगों की कुशल क्षेम पूछना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति में शामिल था। भाई जी के यूं अचानक रूखसत होने के साथ ही शायद हम सभी गंभीर नैतिक संकट से घिर गये हैं। स्याह अंधेरों के घिरते इस दौर में हमें आदरणीय भाई जी के सानिध्य की शायद अभी और अधिक जरूरत थी। दुनियां के दस्तूर को पूरा करते हुए वे अब हम से बहुत दूर जा चुके हैं। गांधीवादी आदर्शों को आत्मसात कर उन्हें अपना जीवन सहचर बनाने बाले एक मुकम्मल इंसान फिर से इस दुनियां में आने के लिये हमें कदाचित अभी लंबा इंतजार करना होगा। बागी समर्पण के सूत्रधार रहे आदरणीय भाई जी को चंबल की धरती का कोटि कोटि प्रणाम एवं आदरांजलि। हमारी इस बेबसी को किसी अनाम शायर ने कुछ इस तरह बयां किया है।
हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पर रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा……
जय जगत जय भारत
जगदीश शुक्ला
पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक जौरा जिला मुरैना
जय जगत जय भारत
जगदीश शुक्ला
पत्रकार एवं स्वतंत्र लेखक जौरा जिला मुरैना





