शशिकांत गुप्ते
ना तीर न तलवार से मरती है सचाई*
जितना दबाओ उतना उभरती है सचाई
ऊँची उड़ान भर भी ले कुछ देर को फ़रेब
आख़िर में उसके पंख कतरती है सचाई
श्री उदयप्रताप सिंह की कविता की उक्त पंक्तियों का स्मरण हुआ।
यह पंक्तियां एकदम प्रासंगिक है।
इन पंक्तियों में किसी की आलोचना नहीं है,बल्कि ये पंक्तियां वैचारिक क्रांति में सलग्न लोगों में साहस का संचार करती है।
सन 1977 में एहतिहासिक सत्ता परिवर्तित के बाद महान क्रांतिकारी चिंतक,विचारक जयप्रकाशजी ने वैचारिक क्रांति का आव्हान किया था।
वैचारिक क्रांति के बगैर कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता है।विचारविहीनता का प्रत्यक्ष उदाहरण हम देख रहें हैं।आस्था के नाम पर अधर्म फैलाया जा रहा है।धर्मांधता की पराकाष्ठा ने आमजन के मूलभूत सवालों को दरकिनार कर दिया है।
बुनियादी समस्याओं को हाशिये पर रखते हुए, नित नई योजनाओं की घोषनाएँ की जा रही है।
आमजन को धैर्य रखने की सलाह दी जाती है।
आमजन सन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म सीमा के गीत की पंक्तियां जो गीतकार साहिर लुधियानवी ने लिखी है, गुनगुनाकर अपना मन बहला लेता है।
रातभर का मेहमान अंधेरा
किसके रोके रुका है सवेरा
इन पंक्तियों में आश्वासन है।आगे की पंक्तियों में वर्तमान व्यवस्था को देखतें हुए संदेह पैदा होता है।
रात जितनी भी संगीन होगी
सुबह उतनी ही रंगीन होगी
रात का संगीन होना बंदूक की नोक पर लगी हुई संगीन तरह हृदय में चुभता है।
संगीन का शाब्दिक अर्थ होता है।भारी,बोझल,अपराध की इंतहा और बंदूक की नोक पर लगा हुआ नुकीला हथियार।संगीन शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा जाता है न कि अमुक जुर्म संगीन जुर्म है।
वर्तमान व्यवस्था को देखते हुए प्रश्न उपस्थित होता है कि, संगीन रात की सुबह भी होगी अथवा नहीं?
उपर्युक्त मुद्दों पर व्यापक बहस होना चाहिए।बहस का निष्कर्ष वैचारिक क्रांति में परिवर्तित होना चाहिए।वैचारिक क्रांति से परिवर्तन को कोई रोक नहीं सकता है।
वैचारिक क्रांति के माध्यम से आमजन की अवधारणा स्पष्ट होती है।इसे सरलभाषा में समझने के लिए आमजन के Concept clear होतें हैं।
Concept clear होने से जहन में कोई भी किसी भी प्रकार की उलझन (Confusion) नहीं रहतीं है।
वैचारिक क्रांति का मूल मक़सद होता है।लोगों को मानस को हरएक क्षेत्र की विसंगतियों को समाप्त करने के लिए आंदोलित करना।हरएक क्षेत्र से तात्पर्य राजनैतिक,सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि।
विचारों की स्पष्टता के साथ जो भी आंदोलन होगा वह अहिंसक ही होगा।वैचारिक आंदोलन से धार्मिक कट्टरता भी समाप्त होगी।
आंदोलन की सफलता को व्यापक दॄष्टि से देखा जाना चाहिए।आंदोलन शब्द ही अंतहीन है।
डॉ लोहियाजी का नारा था।
जबतक भूखा इंसान रहेगा
धरती पर तूफान रहेगा
आंदोलन में सलग्न होकर सक्रियता रखने वालें लोग प्रख्यात साहित्यकार स्व. जयशंकर प्रसाद जी की इन पंक्तियों पर विश्वास करतें हैं।
वह पथ क्या,
पथिक कुशलता क्या
जिस पथ पर बिखरे शूल न हों
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या
जब धाराएँ प्रतिकूल न हों
शशिकांत गुप्ते इंदौर





