(आचार्य प्रशांत एवं राणा यशवंत के बीच हुए संवाद में व्यक्त विचारों पर आधारित )
-तेजपाल सिंह ‘तेज’
“अगर डॉ. भीमराव आंबेडकर आज होते…” — यह वाक्य न केवल एक अनुमान है, बल्कि एक आत्मपरीक्षणात्मक चुनौती भी है। यह प्रश्न हमें हमारे सामाजिक विवेक, राजनीतिक ईमानदारी, और ऐतिहासिक दृष्टिबोध की परीक्षा लेने को मजबूर करता है। क्या आज का भारत, जो संविधान का हवाला तो देता है, पर उसका मर्म भूल चुका है—वो आंबेडकर को समझने, स्वीकार करने और उनके साथ न्याय करने की क्षमता रखता है? जिस देश में डॉ. आंबेडकर को बार-बार गुमनामी में धकेला गया, और फिर बाद में उन्हें राजनीतिक आइकन के रूप में अपने-अपने हितों के अनुसार इस्तेमाल किया गया—उस देश में आज उन्हें केवल पूजना काफी नहीं, उन्हें पढ़ना, समझना और जीना आवश्यक है।
“अगर डॉ. भीमराव आंबेडकर आज होते…” यह प्रश्न जो अन्तर्मन को ही नहीं झकझोरता – बल्कि हमारी लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक विवेक और ऐतिहासिक ईमानदारी की एक गहन परीक्षा है। आज हम एक ऐसे समय में खड़े हैं, जब आंबेडकर के नाम का सबसे अधिक प्रयोग हो रहा है, पर उनके विचारों का सबसे अधिक परित्याग भी। वे संविधान निर्माता के रूप में पूजे जाते हैं, लेकिन उनके विचार और दर्शन, विशेषतः जाति उन्मूलन, आर्थिक समानता और धर्म की आलोचना—इन पर खामोशी है। इस लेख का उद्देश्य है यह पड़ताल करना कि यदि डॉ. अंबेडकर आज होते, तो वे भारत को किस दृष्टि से देखते, और क्या हम उन्हें फिर से बहिष्कृत न कर देते?
1. डॉ. आंबेडकर: एक मानवतावादी चिंतक, न कि केवल दलित नेता:
आचार्य प्रशांत ठीक कहते हैं कि आंबेडकर केवल एक जाति या समुदाय के नहीं थे। उन्होंने पूरे भारत, पूरे मानव समाज की मुक्ति की बात की। वे मानवतावाद के हर पहलू को छूते हैं—राजनीति, समाज, धर्म, अर्थशास्त्र, और न्याय। उनका दृष्टिकोण किसी एक ‘आंदोलन’ तक सीमित नहीं था। पर अफसोस, आज वे या तो दलित राजनीति के प्रतीक बनकर सीमित कर दिए गए हैं, या फिर हिंदू समाज की आलोचना करने वाले ‘विवादास्पद’ व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।
आचार्य प्रशांत के शब्दों में कहें तो आंबेडकर का दृष्टिकोण “सिर्फ़ एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं था”। उन्होंने समाज के उन सभी वर्गों की बात की जो व्यवस्था के द्वारा शोषित और बहिष्कृत किए गए थे—दलित, महिलाएं, आदिवासी, श्रमिक, किसान, अल्पसंख्यक। उनका मानवतावाद किसी संप्रदाय या वर्ग का गुलाम नहीं था। यही कारण है कि वे Annihilation of Caste में धर्म और व्यवस्था की गहरी आलोचना करते हैं, तो The Problem of the Rupee जैसी किताब में अर्थशास्त्र की गूढ़ व्याख्या भी करते हैं। वे बहुआयामी व्यक्ति थे—आर्थिक चिंतक, विधिवेत्ता, शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक और सामाजिक क्रांतिकारी। “I measure the progress of a community by the degree of progress which women have achieved.” — Dr. B.R. Ambedkar
2. राजनीति में प्रवेश: आंबेडकर की मजबूरी, न कि प्राथमिकता:
डॉ. आंबेडकर मूलतः राजनीतिज्ञ नहीं थे। उन्होंने अपनी यात्रा एक अर्थशास्त्री, प्रशासक, शिक्षाविद्, और विधिवेत्ता के रूप में शुरू की। परंतु बार-बार उन्हें जातिगत भेदभाव, अस्वीकार्यता, और छूआछूत ने यह एहसास दिलाया कि संस्थागत बदलाव के बिना कोई व्यक्तिगत उपलब्धि टिक नहीं सकती। उनका राजनीति में आना एक वैचारिक युद्ध में उतरने जैसा था। वे जानते थे कि अगर समाज बदलना है, तो सत्ता के केंद्र में जाना होगा। लेकिन आज हम क्या कर रहे हैं? उनकी विचारधारा की राजनीति नहीं, बल्कि उनके नाम की राजनीति कर रहे हैं।
डॉ. आंबेडकर मूलतः राजनीति में नहीं आना चाहते थे। वे एक विचारक और चिंतक थे, जिन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डबल पीएचडी की थी। उन्होंने न्यायपालिका, प्रशासन, शिक्षा और निवेश सलाह जैसे क्षेत्रों में काम किया। लेकिन जातिगत भेदभाव ने उन्हें मजबूर किया कि वे राजनीति को परिवर्तन का माध्यम बनाएं। राजनीति में उनका प्रवेश महज सत्ता की चाहत से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की आवश्यकता से प्रेरित था। 1927 का महाड़ सत्याग्रह, 1930 का कालाराम मंदिर सत्याग्रह, 1932 का पुणे समझौता और 1956 का धर्म परिवर्तन—ये सभी घटनाएँ एक क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यक्रम की निरंतरता थी।
3. पुणे समझौता और गांधी-आंबेडकर का द्वंद्व:
1932 का पुणे समझौता एक ऐतिहासिक मोड़ था। डॉ. आंबेडकर अलग निर्वाचक मंडल की मांग कर रहे थे, ताकि दलित समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की गारंटी मिल सके। गांधीजी ने इसके विरोध में उपवास किया। अंततः समझौता हुआ—जो दलितों के लिए आज भी विवाद का विषय है। यह टकराव केवल दो व्यक्तित्वों का नहीं था, बल्कि दो विचारों का था। गांधी समाज को भीतर से सुधारने की बात कर रहे थे, आंबेडकर उसे बुनियादी तौर पर बदलना चाहते थे।
1932 में ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘Communal Award’ के तहत दलितों को पृथक निर्वाचक मंडल दिए जाने की योजना बनी। आंबेडकर इसके पक्ष में थे, लेकिन गांधीजी ने इसके विरोध में अनशन कर दिया। अंततः पुणे समझौता हुआ जिसमें दलितों को पृथक निर्वाचक मंडल न देकर आरक्षित सीटें दी गईं। इस समझौते ने दलित राजनीति की दिशा बदल दी। गांधीजी का भय था कि पृथक निर्वाचक मंडल से हिंदू समाज विभाजित हो जाएगा, जबकि आंबेडकर का मानना था कि यह एकमात्र उपाय था जिससे दलित वर्ग को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिल सकता था।
4. क्या कांग्रेस ने आंबेडकर को किनारे किया?
इतिहास के पन्नों में यह साफ दिखता है कि कांग्रेस और आंबेडकर के संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे। वे संविधान सभा में भी कांग्रेस के समर्थन से नहीं, बल्कि मुस्लिम लीग की मदद से आए। नेहरू ने उन्हें संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष तो बनाया, लेकिन 1952 और 1954 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने उन्हें हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह द्वंद्व व्यक्तिगत नहीं, वैचारिक था।
आंबेडकर और कांग्रेस के बीच का संबंध सदा तनावपूर्ण रहा। वे न तो संविधान सभा में कांग्रेस के समर्थन से आए, न ही चुनावों में कांग्रेस ने उनका साथ दिया। 1952 और 1954 में वे लोकसभा चुनाव हारे—और दोनों बार नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने उन्हें हराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हालाँकि नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में कानून मंत्री बनाया और मसौदा समिति का अध्यक्ष भी, लेकिन यह रिश्ता औपचारिक रहा—न कि वैचारिक मेल का प्रतीक। “Congress is nothing but a Hindu organization.” — Dr. B.R. Ambedkar
5. आंबेडकर की पुस्तकों से विमुख समाज:
अंबेडकर की बौद्धिक ऊँचाई को हम आज भी नहीं समझ पाए:
डॉ. आंबेडकर की बौद्धिक उपलब्धियों को आज भी न तो स्कूलों में पढ़ाया जाता है, न ही समाज में उन्हें उचित स्थान दिया जाता है। उनकी पुस्तकें — “द प्रॉब्लम ऑफ रूपी”, “हू वेयर द शूद्राज”, “एनिहिलेशन ऑफ कास्ट”, “रिडल्स ऑफ हिंदूइज़्म”, और “बुद्ध एंड हिज़ धम्मा” — आज भी बहुसंख्यक भारतीयों के लिए अपरिचित हैं। जब आचार्य प्रशांत पूछते हैं: “क्या आपने अंबेडकर की कोई किताब पढ़ी है?” — तो यह सवाल पूरे देश के बौद्धिक दिवालियापन पर सवाल उठाता है।
डॉ. आंबेडकर ने लगभग 50,000 पुस्तकों का अध्ययन किया था और उन्होंने दर्जनों मौलिक ग्रंथों की रचना की–फिर भी आज उनकी रचनाएं मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से नदारद हैं। उनकी आलोचना तो होती है, पर बिना उन्हें पढ़े। आज भी कितने लोग यह जानते हैं कि अमर्त्य सेन ने डॉ. आंबेडकर को भारतीय अर्थशास्त्र का जनक कहा था? या यह कि उन्होंने “Problem of the Rupee” में भारत की मौद्रिक नीति का आधार खड़ा किया?
6. धर्म और सुधार की टकराहट: मनुस्मृति दहन से बौद्ध धर्म तक:
1927 में मनुस्मृति दहन, और फिर 1956 में बौद्ध धर्म ग्रहण—ये दोनों घटनाएं यह स्पष्ट कर देती हैं कि डॉ. आंबेडकर को हिंदू धर्म से कोई उम्मीद नहीं थी। वे केवल सुधार की बात नहीं करते थे, वे व्यवस्था के संहार की बात करते थे। बौद्ध धर्म उनका दार्शनिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उत्तर था—एक ऐसा धर्म जो समानता, करुणा और तर्क पर आधारित है।
बौद्ध धम्म को स्वीकारना डॉ. आंबेडकर की धार्मिक क्रांति थी। वे सुधारवादी ही नहीं, अपितु क्रांतिकारी भी थे। उनका यह कथन प्रसिद्ध है–“I was born a Hindu, but I will not die a Hindu.” हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था में उन्हें कोई संभावना नहीं दिखती थी। उनका मानना था कि जो धर्म इंसान को गुलाम बनाए, वह धर्म नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने 22 प्रतिज्ञाएं दिलाकर लाखों लोगों को धर्मांतरित किया।
7. आज की राजनीति में ‘आंबेडकर’ का दोहन:
आज डॉ. आंबेडकर के नाम पर राजनीति की जाती है, मूर्तियाँ लगाई जाती हैं, जयंतियाँ मनाई जाती हैं—पर उनके विचारों को लागू नहीं किया जाता। वे जिन संस्थाओं से लड़ रहे थे, वही संस्थाएं आज उन्हें ‘राष्ट्रनिर्माता’ कहकर पूजती हैं, पर उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी करती हैं। उनकी तस्वीरें संसद में लगी हैं, लेकिन उनके Annihilation of Caste को कोई पढ़ना नहीं चाहता।
8. अगर आज होते डॉ. अंबेडकर…
अगर डॉ. अंबेडकर आज होते तो वे शायद देश में बढ़ती धार्मिक कट्टरता और जातिगत हिंसा को देखकर फिर से संविधान सभा बुलाने की मांग करते। वे आर्थिक असमानता और कॉरपोरेट पूंजीवाद पर कठोर आलोचना करते। वे मनुवाद के पुनरुत्थान को देखकर पुनः Annihilation of Caste का संशोधित संस्करण लिखते। वे शायद कहते:–“मैंने जो संविधान लिखा था, वह आज खोखला हो गया है।”
9. हमें आंबेडकर को पूजने की नहीं, पढ़ने की ज़रूरत है:
अगर डॉ. अंबेडकर आज होते, तो वे शायद फिर से हमें एक नया संविधान लिखने की चेतावनी देते। वे शायद आज भी वही कहते जो उन्होंने 1949 में संविधान सभा में कहा था– “हमने राजनीतिक समानता दे दी है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता को ज्यों का त्यों रखा है। यह एक दिन लोकतंत्र को नष्ट कर देगी।”
आज उनकी पूजा हो रही है, लेकिन पूजा से परिवर्तन नहीं आते, विचार से आते हैं। डॉ. आंबेडकर ने कभी स्वयं को भगवान नहीं कहा, उन्होंने हमेशा आलोचना का स्वागत किया। उनका व्यक्तित्व एक संतुलित आलोचनात्मक विवेक का प्रतीक था। और सबसे जरूरी बात — हमें आंबेडकर के रास्ते पर चलना होगा, उनके कंधों पर खड़े होकर नहीं, उनके नक्शे को पढ़कर चलने के लिए।
आज डॉ. अंबेडकर की मूर्तियाँ तो हैं, पर उनकी चेतना नहीं। उनके विचार तो हैं, पर उनका क्रांतिकारित्व नहीं। हम उन्हें देवता बना चुके हैं, जिससे आलोचना, आत्मावलोकन और संवाद का दरवाज़ा बंद हो गया है। अगर हम सच में आंबेडकर को सम्मान देना चाहते हैं, तो हमें उनके विचारों को राजनीति, शिक्षा, धर्म, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था में लागू करना होगा। वरना यह समाज फिर उन्हीं गलियों में लौटेगा, जहाँ से आंबेडकर ने मुक्ति का मार्ग दिखाया था। “Cult of hero-worship is a sure road to degradation and eventual dictatorship.” — Dr. B.R. Ambedkar डॉ. आंबेडकर आज जीवित नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी जिंदा हैं। हमें उन विचारों को नमन करना है, केवल मूर्तियों को नहीं।
आज का भारत उन्हें पूजता है, पर नहीं समझता। उनकी विचारधारा को झंडा बनाता है, पर आचरण नहीं बनाता। हमें मूर्ति नहीं, मन में अंबेडकर चाहिए। हमें नारा नहीं, नवजागरण चाहिए।
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पाद टिप्पणियाँ ( (Footnote)
· Annihilation of Caste, डॉ. अंबेडकर का सबसे प्रसिद्ध भाषण, जिसे उन्होंने 1936 में जाट-पटेल सम्मेलन में पढ़ने से रोका गया।
· The Problem of the Rupee (1923), उनकी अर्थशास्त्र में ऐतिहासिक कृति है, जिसका आजादी के पहले मुद्रा-नीति पर गहरा असर रहा।
· डॉ. अंबेडकर के पास 50,000 से अधिक पुस्तकों का निजी संग्रह था, जो उन्हें एशिया के सबसे बड़े व्यक्तिगत पुस्तक-संग्रहकर्ताओं में स्थान देता है।
· 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया — उसी समय जब मंडल आयोग की राजनीति और बहुजन चेतना की लहर चल रही थी।





