संजय कनोजिया 5, जुलाई 1997 की दोपहर दिल्ली के बिहार निवास में श्री लालू प्रसाद यादव जी के आह्वान पर राष्ट्रीय जनता दल का उदय हुआ था..जहाँ सर्वसम्मति से श्री लालू जी को नेता व अध्यक्ष बनाया गया..शायद सब कुछ सही हो रहा होता तो राजद का उदय ना होता..चंद बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए, में पाठकों को समझाने हेतू थोड़ा पीछे की ओर ले जाना चाहूंगा..1995 के मध्य में जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एस.आर बोम्मई जी के खिलाफ भारी विरोध उत्त्पन हो गया था..में उस वक्त पार्टी संगठन में दिल्ली की युवा इकाई के महासचिव पद पर संगठन का काम करता था..बोम्मई जी के इस्तीफे की मांग को लेकर, पार्टी के युवा शाखा के राष्ट्रीय-महासचिव भाई डॉ. सुनीलम जी के नेतृत्व में, मैंने अपने युवा साथियों जो दिल्ली इकाई से जुड़े थे सबको लेकर पार्टी कार्यालय के गेट पर ही अनशन पर ही बैठ गए थे..सप्ताह भर के विरोध के बाद व वरिष्ठ नेताओं के विश्वाश को खो देने की वजह से बोम्मई साहब को इस्तीफ़ा देना पड़ गया और जनता दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादव जी को बनाया गया..!वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव के जो परिणाम आए तो नरसिंम्हा राव की कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और उसे मात्र 140 सीटों से ही संतोष करना पड़ा..लेकिन इन परिणामों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, उसे पहली बार 161 सीटें मिली और अटल बिहारी जी के नेतृत्व में भाजपा ने सबसे बड़े दल होने के कारण, बहुमत ना होने के बावजूद केंद्र में सरकार बना ली..परन्तु बहुमत सिद्ध ना करने के कारण अटल सरकार मात्र 13 ही दिन में गिर भी गई..दूसरी ओर इन 13 दिनों के भीतर ही सभी क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के प्रागण में संयुक्त-मोर्चे का निर्माण कर लिया, जिसका संयोजक आंध्र-प्रदेश के नेता श्री चंद्रबाबू नायडू को बनाया गया..क्षेत्रीय दलों में वामपंथी गुट सी.पी.एम.-32 सीटें, सीपीआई-12 सीटें व अन्य वाम गुट की सीटें जो कुल 66 थीं..दूसरे नंबर पर जनता दल-46 सीटें, सपा-18 सीटें व अन्य क्षेत्रीय दलों को लगाकर कुल 192 सीटें थीं और कांग्रेस ने, गैर-भाजपा सरकार बनाने हेतू अपना समर्थन पत्र संयुक्त मोर्चे की सरकार के लिए महामहिम राष्ट्रपति जी को दे दिया था..! तब सरकार बनाने की जिम्मेबारी संयुक्त-मोर्चे के पास आई, वामपंथियों के सबसे बड़े गुट होने के कारण ज्योतिबसु जी को प्रधानमंत्री बनाने पर आम राय बनी, परन्तु इस पेशकश को सी.पी.एम. के पोलित ब्योरों ने ठुकरा दिया और साथ ही मोर्चे को बाहर से समर्थन देने के अपने प्रस्ताव को रखा, जो की सी.पी.एम. की सबसे बड़ी राजनैतिक भूल समझी जाती है..वामपंथियों के बाद बॉल जनता दल की और आ गई क्योकिं जनता दल संयुक्त मोर्चे का दूसरे नंबर का बड़ा दल था..चूँकि जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालू यादव जी थे, अध्यक्ष होने के नाते पार्टी के केंद्रीय कार्यालय को भी सिर्फ श्री लालू जी ही चला भी रहे थे, पार्टी के चुनावों में आर्थिक मामले भी लालू जी ही देख रहे थे और जनता दल की 46 सीटों में से बिहार से ही 22 सीटें लालू जी जीतकर लाये थे, जबकि कर्णाटक से 16, उड़ीसा से 4, उ०प्र० 2 और 1 सीट जम्मू-कश्मीर की ही थी, याने सबसे ज्यादा सीटें लालू जी ही अकेले बिहार से लाए थे, और जब भी प्रधानमंत्री बनाने की बात घूम-फिर कर लालू जी तक आती, तभी बिहार के ही दूसरे कद्दावर नेताओं को भी ये लगता की बात घूम-फिरकर उनकी ही ओर आ जाए..किसी शायर की ये पंक्ति कि "हमें अपनों ने ही लूटा गैरों में कहाँ दम था" ऐसे ही मौकों के लिए लिखी गई है..अपनों की इसी उहाँ-पोहों में, राजनीति के सबसे बड़े कर्म-योगी, दूरदर्शी, योद्धा को प्रधानमंत्री बनने से वंचित कर दिया गया, हम जैसे कार्येकर्ताओं को आज भी वो मलाल झकझोरता है..बस यहीं से शुरू हुई आंतरिक कलह की सुरसुरी..! जब लालू जी पर बात नहीं बनी, तब पूरे संयुक्त-मोर्चे ने पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी.पी सिंह जी के नाम पर मोहर लगाकर उनकी सहमति लेने उनके घर गए, लेकिन सिंह साहब अपने घर से निकलकर 2-3 घंटे बड़े ही नाटकीय ढंग से कनॉट-प्लेस में अपनी गाडी में घुमते रहे..तब चंद्रबाबू नायडू जी ने, सिंह साहब से किसी तरह संपर्क साधा और पूछा यदि आप भी राजी नहीं तो आप ही बताओ किसे नेता चुने..तब अर्थशास्त्र अनुसार सिंह साहब ने, एच.डी. देवेगौड़ा जी का नाम सुझाया और देवेगौड़ा जी प्रधानमंत्री बन गए..कुछ दिन तक सब सामान्य चल रहा था..दूसरी ओर कांग्रेस ने भी अपना नया अध्यक्ष श्री सीताराम केसरी जी को बना दिया था..और जनता दल में भी संगठनात्मक चुनाव की गतिविधियां शुरू हो गईं थी और यहाँ लड़ाई जनता दल के नए अध्यक्ष को बनाने हेतू शुरू हो गई..क्योकिं लालू जी बिहार के मुख्यमंत्री होने के कारण ज्यादा समय संगठनात्मक क्रिया-कलाप के लिए नहीं निकाल पाते थे अतः कार्येकारी अध्यक्ष होने के नाते संगठन के काम श्री शरद यादव जी देखते थे..लेकिन उसवक्त की प्रस्थितियाँ श्री लालू जी के साहस की और परीक्षा लेना चाहती थी..क्योकि राजनीति को विज्ञान की उपमा दी गई है और विज्ञान में अक्सर समय-समय पर नए-नए प्रयोग होते रहते हैं..अतः पाठकों से माफ़ी चाहते हुए वर्तमान राजनितिक स्थितियों को देख व समझते हुए उन ज्वलंत बिंदुओं को में सार्वजनिक करना उचित नहीं समझता..क्योकिं उस वक्त के दिखने वाले दुश्मन आज दोस्त के रूप में खड़े है..उस वक्त की विपरीत प्रस्थितियों ने लालू जी को विवश कर दिया और हम सब लालू जी के आह्वान पर, 5,जुलाई 1997 की दोपहर बिहार निवास पहुंचे और लालू जी ने तब कहा था कि जो आज मेरे साथ है वही मेरा सच्चा साथी है, और अब यही रियल जनता दल है, राष्ट्रीय जनता दल है.."ये मेरे जैसे कार्येकर्ता का भी सौभाग्य है की में भी राष्ट्रीय जनता दल का संस्थापक कार्येकर्ता हूँ"..लालू जी नई पार्टी बनाने में चूक जाते तो यक़ीनन लालू जी को साजिशकर्ताओं ने राजनैतिक रूप से खत्म करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी..ऐसे नाजुक मौक़े पर कांग्रेस ने लालू जी का साथ दिया था..उसी साथ के एवज़ में लालू जी, बड़ी ही ख़ूबसूरती से कांग्रेस से दोस्ती निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ते..जबकि कांग्रेस अपने बड़े दल होने के गुमान में मित्रता का धर्म भूलकर कई बार फ्रंट-फुट पर खेलती है जिसके कारण कांग्रेस सहित उसके सहयोगियों को भी नुक्सान उठाना पड़ता है..लेकिन कभी लालू जी कांग्रेस के खिलाफ नहीं गए..अनंत खूबियों से लबरेज़ है लालू प्रसाद यादव ..!!
सब कुछ सही हो रहा होता तो राजद का उदय ना होता.





