आज आवश्यकता इस बात की है कि न्यायपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों की पुनर्समीक्षा करे। कानून का प्रयोग समान रूप से हो, जमानत और पैरोल का आधार मानवीय और न्यायसंगत हो, और असहमति को देशद्रोह या साजिश के रूप में देखने की प्रवृत्ति पर रोक लगे। केवल तभी न्यायालय लोकतंत्र के सच्चे संरक्षक की भूमिका निभा सकेगा। अन्यथा, न्याय यदि मज़ाक बन गया, तो लोकतंत्र भी केवल एक औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाएगा।न्याय का उद्देश्य केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि समाज में विश्वास पैदा करना भी होता है। जब न्यायिक प्रक्रिया से आम नागरिक का विश्वास उठने लगता है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। यदि अपराधी यह समझने लगें कि प्रभाव, सत्ता और पहचान के बल पर वे कानून से बच सकते हैं, और यदि विचार, शिक्षा तथा असहमति को अपराध बना दिया जाए, तो यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है।
डॉ. अशोक कुमारी
भारतीय संविधान में लोकतंत्र की नींव चार प्रमुख स्तंभों पर टिकी हुई मानी जाती है—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। विधायिका का कार्य कानून बनाना है, कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है, न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या कर न्याय प्रदान करती है और मीडिया जनता तथा सरकार के बीच सेतु बनकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करती है। इन चारों स्तंभों के संतुलित और स्वतंत्र रूप से कार्य करने पर ही लोकतंत्र की मजबूती निर्भर करती है। किंतु आज के समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठा है कि क्या वास्तव में लोकतंत्र के ये चारों स्तंभ अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से कर पा रहे हैं।
इन चारों स्तंभों में न्यायपालिका को लोकतंत्र की आत्मा माना जाता है। आम नागरिक की अंतिम आशा न्यायालय ही होता है, जहाँ उसे सत्ता, ताकत और प्रभाव से ऊपर उठकर न्याय मिलने की उम्मीद रहती है। न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले न केवल किसी एक व्यक्ति या मामले को प्रभावित करते हैं, बल्कि वे समाज की दिशा और भविष्य की न्यायिक सोच को भी तय करते हैं। यही कारण है कि न्यायिक निर्णयों को ऐतिहासिक माना जाता है और भविष्य में उन्हीं के आधार पर नए मामलों में निर्णय लिए जाते हैं। परंतु हाल के वर्षों में न्यायपालिका के कुछ फैसलों ने इस संस्था की निष्पक्षता और भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
ऐसा प्रतीत होने लगा है कि न्यायालय का रुख कई मामलों में अपराधियों के प्रति नरम और असहाय नागरिकों के प्रति कठोर होता जा रहा है। विशेष रूप से तब, जब अपराधी प्रभावशाली, राजनीतिक रूप से जुड़े या सामाजिक रूप से शक्तिशाली हों। बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में दोषी पाए गए व्यक्तियों को जमानत, पैरोल या अंतरिम राहत मिलना, जबकि दूसरी ओर असहमति की आवाज़ उठाने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कठोर कानूनों के तहत वर्षों तक बिना ट्रायल जेल में बंद रखा जाना, न्यायिक व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर प्रश्न चिह्न लगाता है।
यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के अंतर्गत उमर ख़ालिद, नताशा नरवाल, सुधा भारद्वाज, शरजील इमाम जैसे लोगों को केवल भाषण, लेखन या कथित साजिश के आधार पर लंबे समय तक जेल में रखा गया। इन मामलों में न तो शीघ्र सुनवाई हुई और न ही जमानत को एक सामान्य अधिकार के रूप में देखा गया। इसके विपरीत, हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में सजा पाए अपराधियों को बार-बार पैरोल मिलती रही।
गुरमीत राम रहीम, जिसे 2017 में हत्या और बलात्कार के मामलों में 20 वर्ष की सजा सुनाई गई थी, वह सजा मिलने के बाद भी अनेक बार पैरोल पर जेल से बाहर आया। चुनावों के समय उसका लंबे समय तक जेल से बाहर रहना यह दर्शाता है कि कानून का व्यवहार सभी के लिए समान नहीं है।
इसी तरह कुलदीप सेंगर जैसे दोषी को मुआवज़े के बाद रिहा किया जाना, पीड़ितों के न्याय और समाज की संवेदनाओं पर गहरा आघात है। दिसंबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक आदेश में सेंगर की आजीवन सजा को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया और उन्हें जमानत प्रदान की।
कोर्ट का तर्क था कि विधायक होने के बावजूद सेंगर को “पब्लिक सर्वेंट” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, इसलिए कुछ सख्त कानूनी प्रावधान लागू नहीं होते।कानूनी तकनीकी आधार पर दिया गया यह फैसला आम जनता के लिए चौंकाने वाला था। एक ऐसा व्यक्ति, जिसे नाबालिग के विरुद्ध गंभीर अपराध का दोषी ठहराया जा चुका है, उसे राहत देना न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है? यह मामला केवल एक व्यक्ति की सजा या जमानत तक सीमित नहीं है।
यह उस व्यवस्था का प्रतिबिंब है जहाँ महिलाओं के खिलाफ अपराधों में न्याय की गति और संवेदनशीलता पर बार-बार सवाल उठते हैं। लोकतंत्र में न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह सबसे कमजोर के पक्ष में खड़ी हो, लेकिन इस तरह के फैसले से पता चलता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था महिला विरोधी है। इसके विपरीत, उमर ख़ालिद और शरजील इमाम जैसे शिक्षित शोधार्थियों को पाँच-पाँच वर्षों से अधिक समय तक जेल में रखा गया, जबकि उन पर लगे आरोप अब तक न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हो पाए हैं।
न्यायालय के ऐसे फैसलों का प्रभाव केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर समाज पर पड़ता है। भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को सर्वोच्च नैतिक अधिकार प्राप्त है। शाहबानो केस, विशाखा केस, बोधिसत्व गौतम केस और बिलकिस बानो केस जैसे निर्णयों ने यह दिखाया है कि न्यायालय समाज को दिशा देने की क्षमता रखता है। किंतु जब उसी न्यायपालिका से ऐसे फैसले आने लगें, जो पीड़ितों की बजाय अपराधियों को राहत दें, तो इससे समाज में गलत संदेश जाता है।
भारत जैसे समाज में, जहाँ महिलाओं की सामाजिक स्थिति आज भी संघर्षपूर्ण है, न्यायिक ढील और पक्षपात के परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। वर्ष 2011 से लेकर 2019 तक महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में निरंतर वृद्धि हुई है। बलात्कार, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव आज भी व्यापक सामाजिक समस्याएँ हैं। आंकड़े बताते है की 2020 में 3,71,503 महिलाओं से जुड़े अपराध दर्ज़ हुए, 2023 में यह संख्या बढ़कर 4,48,211 हो गया। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या लगातार सबसे अधिक रही है।
इन आंकड़ों के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि अनेक मामले कभी दर्ज ही नहीं हो पाते। सामाजिक दबाव, भय, लोक लाज और पारिवारिक कारणों से विशेषकर घरेलू हिंसा और यौन अपराधों की पीड़ित महिलाएँ चुप रहने को मजबूर होती हैं। ऐसे माहौल में यदि न्यायालय द्वारा दोषी अपराधियों को रिहा किया जाता है और उनका सामाजिक सम्मान तक किया जाता है—जैसा कि बिलकिस बानो केस के दोषियों की रिहाई के बाद देखने को मिला—तो यह समाज में अपराधियों का मनोबल बढ़ाने जैसा होता है।
न्याय का उद्देश्य केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि समाज में विश्वास पैदा करना भी होता है। जब न्यायिक प्रक्रिया से आम नागरिक का विश्वास उठने लगता है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। यदि अपराधी यह समझने लगें कि प्रभाव, सत्ता और पहचान के बल पर वे कानून से बच सकते हैं, और यदि विचार, शिक्षा तथा असहमति को अपराध बना दिया जाए, तो यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है।
अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि न्यायपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों की पुनर्समीक्षा करे। कानून का प्रयोग समान रूप से हो, जमानत और पैरोल का आधार मानवीय और न्यायसंगत हो, और असहमति को देशद्रोह या साजिश के रूप में देखने की प्रवृत्ति पर रोक लगे। केवल तभी न्यायालय लोकतंत्र के सच्चे संरक्षक की भूमिका निभा सकेगा। अन्यथा, न्याय यदि मज़ाक बन गया, तो लोकतंत्र भी केवल एक औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाएगा।





