शशिकांत गुप्ते
सन 1959 में प्रदर्शित फिल्म अनाड़ी के इस गीत का स्मरण हुआ। इस गीत को लिखा है, गीतकार शैलेन्द्रजी ने।
गीत के बोल है।
किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसीके वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है
उक्त पंक्तियों के शाब्दिक अर्थ में सिर्फ भावार्थ छिपा है।
कल्पनातीत संदेश है,किसी के सिर्फ मुस्कुराहट में कोई कुर्बान हो सकता है?
काश वास्तविक जीवन में यह संभव हो पाता?
वास्तविक जीवन में तो वर्तमान में व्यवस्था की गलत नीतियों के कारण आमजन की मुस्कुराहट गायब हो रही है।
मेरे मित्र व्यंग्यकार सीतारामजी ने कहा,गायब नहीं हुई,व्यवस्था द्वारा छीनी गई है।
माना अपनी जेब से फ़कीर हैं
फिर भी यारों दिल के हम अमीर हैं
उक्त पंक्तियों को वर्तमान संदर्भ में यूं लिखा जाना चाहिए।
वास्तव में तो हम फ़कीर ही हैं
लेकिन विज्ञापनों में जरूर हम अमीर है
इसके उपरांत भी जले पर नमक
की तरह ये पंक्ति याद आती है।
जीना इसिका नाम है
इस गीत अंतिम पंक्ति समस्याओं का कारण बयां करती है।
कहेगा “फूल” हर कली से बार बार
जीना इसिका नाम है
यहाँ फूल से मतलब गुल से नहीं है, यहाँ मतलब है,अंग्रेजी के fool से। समझने वाले full मतलब समझ लेंगे।
किसी शायर ने क्या खूब कहा है।
ये दुनिया अक्सर सस्ते में उन्हें लूट लेती है
खुद की क़ीमत का जिन्हें अन्दाज़ा नहीं होता
अंत में यही कहना उचित है।
नींद से जागो।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





