अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*तत्काल कार्यवाही वाह वाह?

Share

शशिकांत गुप्ते

प्रशासनिक व्यवस्था में इतनी चुस्ती होनी चाहिए। आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम के लिए यदि कानूनी प्रक्रिया का निर्वाह करें तो कईं महीने या वर्ष भी लग सकतें हैं। समय को जाया न करते हुए, सीधे कार्यवाही की जा रही है। यह देख सच में वाह क्या बात है, यह प्रशंसात्मक वाक्य उच्चारने का मन करता है। कानूनी प्रक्रिया की कागजी कार्यवाही न्यायलत में जाएगी,न्यायलय में तारीख़ पर तारीख़ लगते रहेगी। गवाह के साथ और पुरावे पर बहस होगी। पक्ष और विपक्ष का समय और धन का भी व्यर्थ व्यय होगा?
संत कबीर साहब ने इस दोहे में यही संदेश दिया है।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥

प्रलय कब होगा इसकी गणना करने में व्यर्थ समय नष्ठ नहीं करना चाहिए। प्रलय का प्रतीक वाहन युक्त यंत्र है, बुलडोजर।
धन्य है बूलडोज़र को ईजाद कर निर्मित करने वाला इंसान। बुलडोजर को निर्मित करने वाला भी यह देख अचंभित होता होगा कि, बुलडोजर का इतना अच्छा और न्याय पूर्ण उपयोग भी हो सकता है?
न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए जो शॉर्टकट खोजा गया है,उसका का श्रेय बुलडोजर को ही है।
इस प्रशंसनीय कार्य की जितनी स्तुति की जाए कम है।
विरोधियों को बस विरोध करने का मुद्दा चाहिए।
इसीलिए आज मैं अपने व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी के पास नहीं गया। मेरे मन उक्त विचार चल ही रहे थे,उसी समय अचानक सीतारामजी का ही आगमन हुआ।
सीतारामजी मेरा लिखा हुआ पढ़कर हँसते हुए, अपनी व्यंग्यकार वाली मानसकिता में आ गए।
सीतारामजी ने कहा आज मैं कुछ भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करूंगा सिर्फ पुरानी फिल्मों के गीतों की पंक्तियां सुनाऊंगा।
सन 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म नास्तिक के इस गीत की पंक्तियां सुनों इस गीत के गीतकार है,प्रदीपजी
लाज आती है मुझे ये कहतें हुएं
प्रभु अंधा न बन आंख होते हुए
मुझे डसने को आया है देख जरा
किसी बस्ती से जहरीला नाग
क्या पत्थर के भगवान तू है कहाँ
तेरी दुनिया में लग जाए आग

सीतारामजी ने कहा यहाँ स्पष्टिकरण देना अनिवार्य समझते पुनः लिख रहा हूँ कि, यह गीत गीतकार प्रदीपजी ने लिखा है। प्रदीपजी ने मेरे वतन के लोगों जरा याद करो कुर्बानी…. गीत भी लिखा है।
इसीतरह सन 1956 में प्रदर्शित फ़िल्म फंटूस* के गीत की कुछ पंक्तियों का स्मरण होता है। इसे लिखा है गीतकार साहिर लुधियानवी ने
दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना
जहाँ नहीं चैना वहाँ नहीं रहना
लाख यहाँ झोली फैला ले
कुछ नहीं देंगे इस जग वालें
पत्थर के दिल मोम न होंगे
चाहे जितना नीर बहाले

इसी तारतम्य में सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म आशिक के गीत की पंक्तियों का भी स्मरण होता है। गीतकार हसरत जयपुरी ने यह गीत लिखा है।
पत्थर दिल है ये जग वाले
जाने ना कोई मेरे दिल की जलन

सन 1981 में प्रदर्शित फ़िल्म सनम तेरी कसम में गीतकार गुलशन बावरा ने लिखे गीत की पंक्तिया भी याद आती है।
शीशे के घरों में देखों तो
पत्थर दिल बसतें हैं
जो प्यार को खेल समझतें हैं
और तोड़ के दिल को हँसते हैं

सबसे महत्वपूर्ण पंक्तिया तो सन 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म पत्थर के सनम की है। गीत, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है।
पत्थर के सनम, तुझे हमने मुहब्ब्त का खुदा जाना
बड़ी भूल हुई, अरे हमनें, ये क्या समझा ये क्या जाना
मैने सीतारामजी से पूछा आप कहना क्या चाहतें हो?
पत्थर को क्यों इतना महत्व दे रहे हो?

सीतारामजी ने मेरे सवाल का जवाब निम्न शेर कहकर दिया।
इस दर का हो या उस दर का हर पत्थर पत्थर है लेकिन
कुछ ने मेरा सर फोड़ा हैं कुछ पर मैं ने सर फोड़ा है

शायर ज़ुबैर अली ताबिश
उपर्युक्त मेरे कथन को गम्भीरता से पढ़ोगे, पढ़कर समझने की कोशिश करोगे तो सब समझ जाओगे।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें