,मुनेश त्यागी
आजकल आईपीसी की धारा 124a यानी राजद्रोह की चर्चा जोरों पर है। पिछले दिनों हमने सरकार और हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक लोगों द्वारा अपने विरोधियों को देशद्रोही/राजद्रोही कहते सुना है और यह अभियान आज भी जारी है। आइए जानते हैं कि दरअसल वास्तव में राजद्रोह क्या है?
जो आदमी, सरकार के खिलाफ लोगों में देश विरोध की भावना बढ़ाता है, सरकार के खिलाफ दुश्मनी, नफरत और गैरवफादारी की बात करता है, हिंसा की बात करता है और उत्तेजना फैलाता है, वह राजद्रोह यानी देशद्रोह है। सरकार के खिलाफ विद्रोह की कविता या लेख देशद्रोह की श्रेणी में आते हैं। सरकार के खिलाफ हिंसा भड़काना राजद्रोह है। जो कथन या हरकत कानून और शांति और सांप्रदायिक सौहार्द को खंडित करता है, वह देशद्रोह की श्रेणी में आता है।
देशद्रोह वक्ता के इरादों से व्यक्त होता है जो केवल सरकार विरोधी हो। कोई भी भाषण, राज्य की सुरक्षा या पब्लिक ऑर्डर के लिए हानिकारक नहीं होना चाहिए अगर वह राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक ऑर्डर के लिए हानिकारक है तो वह देशद्रोह श्रेणी में आएगा।
अब हम यहां पर बताना चाहते हैं कि भारत का भला चाहने वाले पत्रकार, लेखक, कवि और राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा की गई आलोचना राजद्रोह की श्रेणी में नहीं आती है। कानूनी तरीके से सरकार बदलने की बात करना देशद्रोह नहीं है। सद्भावना पूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना करना देशद्रोह नहीं है। कुछ लोग के नारे में सशस्त्र क्रांति की बात करना भी देशद्रोह है। लोगों द्वारा लगाए गए नारे, जो हिंसा भड़काने की बात नहीं करते हैं,जो सरकार को धमकी नहीं देते हैं, वे देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आते हैं। जो भाषण या कविता देश विरोधी नहीं है, वह देशद्रोह की परिभाषा में नहीं आती है। मंत्रियों या मंत्री या सरकार की कटु आलोचना करना, भ्रष्टाचार, महंगाई का विरोध करना भी राजद्रोह या देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आते हैं। दूसरी तरह की सरकार बनाने का सुझाव देना भी राजद्रोह की परिभाषा में नहीं आता है। सरकारों की आलोचना करना देशद्रोह नहीं है। सरकार, विधायिका या कार्यपालिका की कठोर आलोचना भी देशद्रोह नहीं है। पत्रकारों, प्रकाशकों, भाषण कर्ताओं द्वारा सरकार की कटु आलोचना भी देशद्रोह नहीं है।
जनतांत्रिक देशों में सरकार की कटु आलोचना को लेकर सरकारें अति संवेदनशील नहीं हो सकती। सरकार की आलोचना और निंदा भी देशद्रोह की परिभाषा में नहीं आते हैं। भारत का सर्वोच्च न्यायालय पिछले कई दिनों से राजद्रोह यानी देशद्रोह के बारे में बात कर रहा है। न्यायालय ने कई अवसरों पर कहा है कि सरकार की आलोचना करना, जन विरोधी नीतियों की आलोचना करना, राजद्रोह या देशद्रोह की परिभाषा में नहीं आते हैं। सरकार की जनविरोधी नीतियों की आलोचना करने वाले को, देशद्रोही कहना संविधान की आत्मा और चेतना का गला घोंटने जैसा है।
राजद्रोह या देशद्रोह के कानून को अंग्रेजों ने 1870 में, भारत में अपनी गुलामी थोपने और बरकरार रखने के लिए प्रयोग किया था और भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए और अंग्रेजी राज के खिलाफ आजादी की मांग करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों और भारत के क्रांतिकारियों के खिलाफ राजद्रोह के मुकदमे का प्रयोग किया गया था। अब आजादी के 75 वर्ष बाद भी इस विदेशी मूल के कानून की क्या जरूरत रह गई है? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के लगातार प्रयास के बावजूद भी मोदी सरकार इस देशविरोधी, जनविरोधी, जनतंत्र विरोधी और संविधान विरोधी कानून को लेकर पशोपेश में है और अपना स्पष्ट रुख सर्वोच्च न्यायालय के सामने नहीं रख पा रही है।
हमारा देश और समाज भी किन विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है कि सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने वालों को, सच को सच कहने वालों को और गलत को गलत कहने वालों को, क्रांति की बात करने वाली मार्क्स और माओ की किताब रखने वालों को राजद्रोह का आरोप लगाकर जेल में बंद किया कर रखा है। सरकार और सरकारी पक्ष के लोगों द्वारा देशद्रोही ठहरा दिया जाता है, उन्हें जेलों तक में ठूंस दिया जाता है। उन पर सरकार द्वारा मनमाने मुकदमे लाद दिए जाते हैं और उनका जीवन बर्बाद कर दिया जाता है। हालत यहां तक खराब हो गए हैं की हनुमान चालीसा पढ़ने वालों के खिलाफ भी देशद्रोह के मामले दर्ज किए जा रहे हैं। देश में यह बिल्कुल आश्चर्यचकित करने वाली स्थिति है आज अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, महंगाई, भेदभाव, अंधविश्वास, धर्मांधता और पाखंडों का विरोध करने वालों को भी देशद्रोही और राजद्रोही कह दिया जाता है और कहा जा रहा है। किसानों, मजदूरों और जनता के हितों की बात करने वालों को भी नहीं बख्शा जा रहा है उन्हें भी हिंदुत्ववादियों द्वारा खुलेआम और बिना रोक-टोक के देशद्रोही और राजद्रोही ठहराया जा रहा है और कहा जा रहा है।
2010 से 867 केसों में 13,306 लोगों को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया है और अचंभे की बात यह है कि इनमें से 70 फ़ीसदी केस 2014 के बाद दायर किए गए हैं जिनमें केवल 13 लोगों को दोषी पाया गया है और बाकी निर्दोष लोगों को जेल में बंद कर उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी गई है। सुप्रीम कोर्ट इन परिस्थितियों को लेकर बहुत चिंतित है। इसीलिए उसने देशद्रोह के कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए पूरे देश में इस कानून के प्रयोग पर रोक लगा दी है।
यह सब भारतीय संविधान के बुनियादी मूल्यों और मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। यह मानवाधिकारों का खुल्लम खुल्ला निषेध है। आज इस कानून के दुरुपयोग को लेकर हालात इतने खराब हो गए हैं की सुप्रीम कोर्ट को इसके दुरुपयोग पर रोक लगाने पड़ी है और राजद्रोह के अंतर्गत fir दर्ज करने पर रोक लगा दी है। इसके विरोध में भारत के कानून मंत्री ने अदालत को लक्ष्मण रेखा न उलांघने की चेतावनी/नसीहत दी है। यहीं पर हम कहना चाहेंगे कि अब इस विदेशी मूल के कानून की कोई जरूरत नहीं रह गई है। सरकार को इस जनविरोधी कानून को एकदम और अविलंब खत्म कर देना चाहिए।
सच में यह वह भारत नहीं है जिसकी कल्पना हमारे क्रांतिकारी शहीदों और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने और आजादी के दीवानों ने की थी। आखिर में हम तो ही कहेंगे,,,,,
यह दाग दाग उजाला
यह डसी डसी सी सुबह,
वो इंतजार था जिसका
यह वह भारत तो नहीं।
राजद्रोह के संविधान विरोधी और जन विरोधी कानून को अविलंब खत्म करो






