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आंदोलनजीवी और परजीवी के निहितार्थ…..

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सुसंस्कृति परिहार

इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि देश का राजनीतिक व प्रशासनिक माहौल बिगड़ चुका है। व्यवस्था में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसका असर कुल मिलाकर न्याय तंत्र पर भी पड़ता है। कोर्ट में महत्वपूर्ण मामले वर्षों से लटके हुए हैं। अपराधियों का दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा है। सरकार सही मुद्दों पर हो रहे आंदोलनों को दबाने की बजाय उनकी हकीकतों को जाने और अपनी बिगड़ी व्यवस्था को सुधारे तथा ऐसी  बात भी ना करे जो आपके वा अपनों द्वारा किए आंदोलनों पर उंगली उठाकर  सबको कटघरे में खड़ा कर दे । 

  पिछले दिनों हमारे साहिबाने हिंद ने राज्यसभा मेंम्बरानों के बीच जिस लहज़े में किसान आंदोलन कारियों को सहयोग देने करने वालों को जी भर कोसा उससे तो यह बू आती है कि उनकी मंशा साफ़ है कि किसी भी आंदोलन को बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता सहयोग ना करें ।वे इसे लोगों की नई जमात बताते हैं जो परजीवी हैं और बिना आंदोलन के जी नहीं सकते ।वे ये तक कह जाते हैं कि वे आंदोलन पैदा भी करते हैं ताकि उनको काम मिलता रहे । साहिब के तमाम शब्द आंदोलनकारियों को भारी पड़ गए । सिर्फ किसान आंदोलनकारियों को नहीं बल्कि जनहित में आंदोलन करने वाले लोग भी हैरानी में है । 

                   क्या हमारे लोकतांत्रिक देश में यह गांधी जी और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार भी हमसे छिनने वाला है । आंदोलन के निहितार्थ को देखें तो पाते हैं कि देश को ना सिर्फ आज़ादी दिलाने तथा बहुत से जनहितकारी कानून बनवाने के लिए देश में अनेकों आंदोलन हुए हैं जिन्हें उस दौरान के बुद्धिजीवियों और श्रमजीवी संगठनों के नेताओं का बराबर मार्गदर्शन मिला है ।अभी भी कहा जाता है कि दलित और पिछड़े वर्ग को सही नेतृत्व वा मार्गदर्शन मिला  होता तो आज उनकी हालत बदतर नहीं होती । किसान भी अब तक इसी श्रेणी में था लेकिन उसके किसान नेता देवीलाल, चरणसिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेताओं की बदौलत उन्हें काफी कुछ मिल गया और इसलिए भी देश को खाद्यान मामले में आत्मनिर्भर होने उनकी ज़रूरत थी जबकि वे कृषि कानूनों का क ख ग भी नहीं जानते थे ।आज ख़ुशी होती है पंजाब के पढ़े-लिखे किसानों ने कृषि बिल उर्फ व्यापार कानून को समझा और स्वप्रेरित आंदोलन की बुनियाद रखी ।बाद में समाजसेवी और बुद्धि जीवी भी जुड़ गए । सोशल मीडिया और और अगोदी मीडिया ने भी इसे उछाला । राजनैतिक दलों ने दूरी रखी पर जब उन लांछन लगे तो वे भी साथ हो लिए । लंबे खिंच रहे आंदोलन और तकरीबन 200से अधिक किसान मौतों ने अन्तर्राष्ट्रीय जगत को आंदोलन को समर्थन दिया ।यह जागृति स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। 

               पर यहां बात सिर्फ आंदोलन की नहीं बात तो है उनसे जुड़े मज़बूत इरादों वाले मजबूत साथियों की है वे नहीं चाहते सुको का वकील या पूर्व जज या मुख्यमंत्री, मंत्री, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृति कर्मी ,सोशल , डिजिटल मीडिया ,अन्य पार्टी के नेतागण और तमाम जनतंत्र की आवाज़ बुलंद करने वाले,लेखक ,ब्लागर,कवि ,समालोचक या प्रगतिशील साथी आंदोलनों का साथ दें । निर्भया जघन्य कृत्य हो या अन्ना हजारे का आंदोलन उसमें स्वप्रेरित हज़ारों ऐसे लोग  शामिल रहे । दोनों सफ़ल भी हुए एक ने कानून बनवा लिया और दूसरे ने सरकार गिरा दी । इसलिए लगता है साहिब जी घबराए हुए हैं । इसीलिए धड़ाधड़ राजद्रोह के मुकदमे और ई डी के छापों से डराने का उपक्रम जारी है
          आज सबसे बड़ा ख़तरा साहिब जी को यही है कि कुछ प्रांतों में विधानसभा चुनाव  हैं उन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है । ये याद  रखना चाहिए आंदोलन संगठित सत्ता तंत्र या व्यवस्था द्वारा शोषण और अन्याय किए जाने के बोध से उसके खिलाफ पैदा हुआ संगठित और सुनियोजित अथवा स्वतःस्फूर्त सामूहिक संघर्ष है। इसका उद्देश्य सत्ता या व्यवस्था में सुधार या परिवर्तन होता है। यह राजनीतिक सुधारों या परिवर्तन की आकांक्षा के अलावा सामाजिक, धार्मिक, पर्यावरणीय या सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी चलाया जाता है। यूं तो अलग-अलग राज्यों में किसान सरकारों के खिलाफ लामबंद होते रहे हैं। इन आंदोलनों से सत्ता के शिखर हिलते भी रहे हैं और गिरते भी रहे हैं। मध्यप्रदेश के मंदसौर में 2017 में हुए किसान आंदोलन को लोग अभी भूले नहीं होंगे, जहां पुलिस की गोली से 7 किसानों की मौत हो गई थी। 15 साल बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लिए काफी हद तक राज्य के किसानों की भूमिका को ही अहम माना जाता है। इसी तरह कर्ज माफी और फसलों के डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन मूल्य की मांग को लेकर तमिलनाडु के किसानों ने 2017 एवं 2018 में राजधानी दिल्ली में अर्धनग्न होकर एवं हाथों में मानव खोपड़ियां और हड्डियां लेकर प्रदर्शन किया था। अब कहा जा रहा मिल बैठकर बात कर लेंगे । कैसे मुनासिब है साहिब जी अब तक के सभी झूठ चीत्कार करने लगते हैं ।    इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि देश का राजनीतिक व प्रशासनिक माहौल बिगड़ चुका है। व्यवस्था में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसका असर कुल मिलाकर न्याय तंत्र पर भी पड़ता है। कोर्ट में महत्वपूर्ण मामले वर्षों से लटके हुए हैं। अपराधियों का दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा है। सरकार सही मुद्दों पर हो रहे आंदोलनों को दबाने की बजाय उनकी हकीकतों को जाने और अपनी बिगड़ी व्यवस्था को सुधारे तथा ऐसी  बात भी ना करे जो आपके वा अपनों द्वारा किए आंदोलनों पर उंगली उठाकर  सबको कटघरे में खड़ा कर दे ।           

Ramswaroop Mantri

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