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*कांग्रेस का मनरेगा को लेकर मोदी सरकार के बदलाव पर देशव्यापी आंदोलन के निहितार्थ*

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   –परमजीत बाबी सलूजा 

नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में C.W.C. की  विस्तारित बैठक में कांग्रेस नेतृत्व ने केंद्र सरकार की मनरेगा के मौजूदा प्रारूप में नकारात्मक बदलाव को अपने कार्यकर्ताओं, सहयोगी दलों के साथ आम जनता में ले जाने का फैसला किया है। 05 जनवरी से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने पर सहमति बनी है। पार्टी 25 करोड़ मनरेगा रजिस्टर्ड मजदूरों, किसानों, ग्रामीण भारत में इसे लेकर पहुंचेगी। 

2006 से यूपीए सरकार द्वारा संचालित इस गारंटीड रोज़गार योजना पर मोदी जी की नियत शुरू से सकारत्मक नहीं रही। उन्होंने भरी संसद में इस ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाली योजना का मजाक उड़ाया था। यह अलहदा विषय है कि कोविड महामारी के दौर में यही योजना ने संजीवनी का काम किया था। फिर भी राजनैतिक विद्वेष के चलते मोदी सरकार इस पर बजट कम करती रही। अब तो हद ही हो गई जब इस संसद के शीतकालीन सत्र में यकायक इस योजना का नाम और प्रारूप बदलने का बिल संसद में पेश कर दिया यहां तक कि कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान तक को इसकी भनक नहीं लगने दी, साफ है कि यह बिल प्रधानमंत्री कार्यालय से सीधे संसद में लाया गया। बहुमत के हनक में इसे पास भी करवा लिया गया। इस योजना का नाम महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (MNREGA) से बदल कर विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण (VB – G – RAM – G) रख दिया है। नाम परिवर्तन से इस विचारधारा की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति संकुचित और कुंठित सोच खुलकर सामने आ गई पर उनके लोगों ने इसके पीछे ऐसे ऐसे कुतर्क पेश किए जो न केवल हास्यास्पद हैं बल्कि शर्मनाक भी है, जैसे गांधी जी राम जी से बहुत प्रभावित थे, वे उन्हीं के भजन गाते थे, उनके अंतिम शब्द भी हे राम थे हम इस योजना को राम जी के नाम पर रख गांधीजी को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।  बात केवल नाम बदलने तक रहती तो उतना विरोध नहीं है पर जिस प्रकार से मोदी सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना की आत्मा को ही मार दिया, इसे केंद्रीयकृत कर दिया, ग्रामीण रोजगार की गारंटी को ही खत्म कर दिया, प्रबल विरोध इन्हीं मुद्दों पर है।

यूपीए सरकार की मनरेगा योजना सारी दुनिया का इकलौता ऐसा  कार्यक्रम था जिसमें वर्ष के सौ दिन अपने गांव से पांच कि मी की परिधि में रोजगार देने का बाकायदा कानून था,  यह केवल एक सरकारी योजना भर नहीं थी। इस गारंटी एक्ट की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि ग्रामीण महिलाओं को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सक्षम बनाने हेतु इसमें 1/3 हिस्सा महिलाओं को रोजगार देने का तथा बिना लैंगिक भेद के समान पारिश्रमिक देने का प्रावधान किया गया था। सरकार अगर निश्चित समय अवधि में रोजगार देने में विफल होती है तो रजिस्टर्ड मजदूरों को मुआवजा देने का प्रावधान भी था। ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने इस योजना के चलते बड़ी छलांग लगाई थी, जिससे देश के समग्र विकास ने तेज़ रफ्तार पकड़ी थी। इस महती  योजना की प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खूब सराहना हुई थी। विकासशील भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह योजना गेम चेंजर साबित हुई थी, इसने कई परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर लाने में मदद की थी। 

एनडीए सरकार की ग्रामीण रोजगार की नई योजना संसद के इस शीतकालीन सत्र में लाई गई है जिसमें पुराने सारे प्रावधानों को या तो हटा दिया गया है या बेहद कमज़ोर कर दिया गया है। सरकार के प्रस्तावित बिल में रोजगार गारंटी प्रावधान ही नहीं है। ऐसे में इसके सुचारू रूप से चलने पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए हैं कि सरकार कैसे काम देगी ? पहले इस योजना में केंद्र सरकार की राशि आंबटन में 90 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, राज्य सरकारों को केवल 10 फीसदी ही देने होते थे, पर अब केंद्र सरकार 60 प्रतिशत और राज्य सरकारें 40 प्रतिशत राशि का भुगतान करेंगे। राज्यों की वित्तीय स्थिति में यह मुमकिन नहीं है कि वह अपने बजट की बड़ी राशि इस पर व्यय कर सकें, साफ है कि बजट के अभाव में यह योजना दम तोड़ देगी। मनरेगा में योजना ग्रामों में जरूरत के हिसाब से बनती थी पर नए बिल के मुताबिक केंद्र सरकार तय करेगी कि कहां क्या काम कराए जाएंगे, ऐसे में रोज़गार गारंटी स्वतः ही खत्म कर दी गई है। केन्द्र और राज्यों में टकराव की स्थिति अलग बनेगी। नए बिल में न्यूनतम मजदूरी पर भी रुख साफ नहीं है। केंद्र तय करेगा कि कितनी मजदूरी देनी है। इससे केंद्र तथा राज्यों में टकराव बढ़ेगा।

यहां से अनेक गंभीर सवाल खड़े होते हैं कि क्या मोदी सरकार केवल पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर इस योजना को समाप्त करना चाहती है या और भी कोई वजह है ? इसका कोई ठोस  जवाब केंद्र सरकार के पास नहीं है। वह अपने चिरपरिचित अंदाज में मुद्दे को भटका रही है पर इस बार यह उसे बहुत भारी पड़ सकता है।सरकार की इस पहल से एक बात तो साफ है कि उसके समक्ष गंभीर आर्थिक संकट है और वह इस महती योजना को बजट देने की स्थिति में नहीं है। वह अपनी नाकामी का ठीकरा राज्यों पर फोड़कर अपना पिंड छुड़ाना चाहती है। इसी बदनीयती से वह नया बिल लेकर आई है, फिर वो अपनी जनता से देश की आर्थिक स्थिति को लेकर झूठ क्यों बोलती है ? क्यों झूठे आंकड़ों से भरमाने का जतन करती है ? क्यों विश्व में डंका बजने का प्रलाप करती है ? सरकार का दोहरा मापदंड इसी से स्पष्ट है कि एक तरफ वह पूंजीपतियों के ऋण माफ करने में कोताही नहीं बरतती पर ग्रामीण भारत के मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने, किसानों को M.S.P. देने में उसके हाथ पांव फूल जाते हैं वह भी तब जब पैसा भारत की जनता के टैक्स के हैं। 

देश की जनता के लिए यह चेतावनी है कि देश की आर्थिक दशा बिल्कुल सही नहीं है। पहले नोटबंदी का विनाशक फैसला लिया गया जिससे देश में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा सेक्टर MSME पूरी तरह से तबाह हो गया जिसके चलते शहरों में रोज़गार मुहैया कराने का बड़ा साधन लगभग खत्म सा हो गया तथा आर्थिक स्थिति बेपटरी हो गई जो आज तक सही दिशा में नहीं आई है। देश भयंकर बेरोज़गारी के चपेट में आ गया। कोढ़ में खाज तब आया जब वैश्विक महामारी कोविड ने भारत को भी चपेट में ले लिया था। बदहवास सरकार को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था, 80 करोड़ लोगों को फौरी राहत के नाम पर मुफ्त राशन मुहैया कराया गया जो सरकार का  राजनैतिक लाभ लेने तथा रोजगार मुहैया कराने में विफल रहने के कारण आज भी जारी है, अफसोसजनक तो यह है कि सरकार इसे भी अपनी उपलब्धि बताती है कि मोदी जी 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रहे हैं जबकि यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है।बेरोजगारी तथा मुफ्तखोरी के बाद अब मनरेगा को बंद करने की दिशा में बढ़ती हुई सरकार देश को गहरे आर्थिक संकट की ओर धकेल रही है, क्योंकि MSME के बंद होने से शहरी बेरोज़गारी भयंकर रूप से बढ़ी और अब मनरेगा बंद होने से ग्रामीण बेरोज़गारी भयावह रूप से बढ़ेगी। कृषि क्षेत्र की बदहाली भी जगजाहिर है, ऐसे में देश  आर्थिक संकट के उन झंझावतों में फंसेगा जिससे लंबे अरसे तक ऊबर पाना संभव नहीं है। निश्चित है कि  इससे देश की जनता को कई विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा।

मोदी जी पूर्ण रूप से आत्ममुग्ध होकर तानाशाही तरीके से काम कर रहे हैं। इनके प्रत्येक काम में आप इसकी छाप देख सकते हैं। सबसे पहले  देश पर सहसा ही नोटबंदी थोप दी गई जिसकी तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली और तत्कालीन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल को भनक तक नहीं लगने दी गई। इससे देश को और जनता को कितना नुकसान हुआ, सर्वविदित है, फिर फ्रांस से राफेल विमान खरीदी पर पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के करार को पलटते हुए, नए करार के जरिए खरीदी की गई, इस डील की भनक मोदी जी ने तत्कालीन रक्षामन्त्री मनोहर पारिकर को लगने तक नहीं दी। अपनी ही जिद के चलते देश को ऐसा बेतरतीब टैक्स संग्रहण जीएसटी दिया जिससे आज भी व्यापारी, उद्योगपति परेशान हैं, इस पर भी किसी से गंभीर मंत्रणा नहीं की गई थी। विपक्ष को विश्वास में लिए बगैर बंगलादेश को कई सौ एकड़ जमीन दे दी। कोविड के समय सहसा ही मीडिया में आकर बिना किसी तैयारी के, किसी से मशविरा किए देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी, सारा देश रुक गया, उस दौर में देश की जनता भयंकर कष्ट भोगी थी।  रक्षामन्त्री राजनाथ सिंह और सेना से सलाह किए बगैर ही चीन को यह कहकर क्लीन चिट दे दी कि न कोई आया है, न कोई घुसा है, न किसी ने कब्जा किया है।  बिना सेना से सलाह लिए पाकिस्तान की एजेन्सी आईएसआई को पठानकोट हमले की जांच के लिए बुला लिया। तत्कालीन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और किसानों से मशविरा किए बगैर तीन कृषि कानून लेकर आ गए, जिसका किसानों द्वारा प्रबल विरोध करने पर मेरी तपस्या में कमी रह गई कहकर बिल वापस ले लिया। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना बड़ी बहादुरी से आगे बढ़ रही थी पर सहसा ही सीज़फायर कर दिया गया, क्यों किया गया? किसके इशारे पर किया? यह आज भी रहस्य है, और अब मनरेगा को यकायक बंद करने वाला बिल लेकर आ गए, जिसमें कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान तक से कोई मंत्रणा नहीं की गई। मोदी जी के शासन चलाने का यही तरीका है जो पूर्व में गुजरात के मुख्यमंत्री काल से अनवरत जारी है। मनरेगा का मुद्दा इस बार उन्हें भारी पड़ने जा रहा है। 

कांग्रेस ने बिल्कुल सही समय में इस मुद्दे को पकड़ा है, इसके जरिए उसे अपनी खोई हुई राजनैतिक जमीन वापस मिल सकती है बशर्ते कांग्रेसी पूरे मनोयोग से अपने आलाकमान का साथ देते हुए, उसके दिशानिर्देश पर, ग्रामीण जनता, बड़े किसानों, भूमिहीन किसानों, सीमांत किसानों, दिहाड़ी मजदूरों, गांवों के छोटे दुकानदारों के साथ कदमताल करते हुए हर विपरीत परिस्थिति के लिए अपने को तैयार करें, अब समय एसी कमरों में बैठकर राजनीति करने का नहीं बल्कि सड़कों पर पसीने बहाने का है। मोदी जी ने कांग्रेस को फिर से खड़े होने का बड़ा मौका दिया है, इसे किस तरह से कांग्रेस भुना पाएगी, देखना दिलचस्प होगा क्योंकि एक तो कांग्रेस देश में विश्वास के संकट से गुजर रही है दूसरा कई राज्यों में उसका संगठन मृतप्राय सा है। इतना तय है कि नेक नियति से कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता इस मुद्दे पर जमीन में उतर गए तो उन्हें कांग्रेस कार्यकर्ताओं का समर्थन तो मिलेगा ही, ग्रामीण जनता भी स्वस्फूर्त जुड़ने लगेगी। कांग्रेसी मनरेगा के साथ ही स्थानीय समस्याओं को पुरजोर तरीके से उठाकर जनता में अपनी खोई प्रतिष्ठा को पुनः अर्जित कर सकते हैं। जनता के हितों की लड़ाई में उन्हें हर कुर्बानी के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा। गेंद अब कांग्रेस के पाले में है कि क्या वह इसे जनांदोलन में तब्दील कर पाएगी ? अगर हां तो निश्चित ही वह यहां से सत्ता वापसी की ओर रुख करेगी। इस यज्ञ में उसे साथी विपक्षी दलों का भी पूरा समर्थन मिलना तय है। देश भी सकारत्मक बदलाव हेतु देशव्यापी जनांदोलन के लिए तैयार है। 

Ramswaroop Mantri

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