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भारत-अमेरिका समझौते के निहितार्थ:संभावित ‘तबाही’ और राजनीतिक भूचाल

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 -तेजपाल सिंह ‘तेज’

            समकालीन भारत में आर्थिक नीति, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आंतरिक राजनीति एक-दूसरे से गहराई से संबद्ध हो चुकी हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता केवल व्यापारिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि उसका प्रभाव देश की सामाजिक संरचना, कृषि व्यवस्था, औद्योगिक ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी पड़ता है। हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच घोषित पाँच वर्षीय व्यापार समझौते ने इसी प्रकार की व्यापक बहस को जन्म दिया है। वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग द्वारा इस समझौते को लेकर व्यक्त की गई आशंकाएँ इसे एक सामान्य आर्थिक करार से कहीं अधिक गंभीर विषय बनाती हैं। उनका विश्लेषण संकेत देता है कि यह समझौता भारत की कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था, घरेलू उद्योग और राजनीतिक स्थिरता के लिए दूरगामी और संभावित रूप से विनाशकारी परिणाम ला सकता है। प्रस्तुत निबंध का उद्देश्य इसी समझौते का शैक्षणिक और समालोचनात्मक अध्ययन करना है।

            भारत इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ राजनीतिक घटनाक्रम, आर्थिक निर्णय और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति एक-दूसरे में गहराई से उलझते दिखाई दे रहे हैं। संसद का सत्र चल रहा है, देश का बजट हाल ही में पेश हुआ है, और इसी बीच भारत-अमेरिका के बीच एक बहुचर्चित पांच वर्षीय समझौते की खबर सामने आई है। यह समझौता न केवल आर्थिक दृष्टि से, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी दूरगामी प्रभाव डालने वाला बताया जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के अनुसार, यह समझौता भारत को संभावित विनाश के कगार पर ले जा सकता है। प्रश्न यह है कि यह आशंका क्यों और किन आधारों पर व्यक्त की जा रही है?

 अध्ययन की पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ

            भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते पर संसद में विस्तृत चर्चा अपेक्षित होती है। किंतु जिस समय यह भारत–अमेरिका समझौता सार्वजनिक हुआ, उस समय न केवल संसद में इस पर कोई सार्थक बहस नहीं हुई, बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति पर प्रश्न उठाया जाना इस बात का संकेत है कि सरकार और संसद के बीच संवाद की प्रक्रिया में असामान्यता उत्पन्न हुई। श्रवण गर्ग के अनुसार, यह स्थिति किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं, बल्कि राजनीतिक असहजता और संभावित जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।

 संसद, प्रधानमंत्री और ‘खतरे’ की राजनीति

            संसदीय सत्र के दौरान यह असामान्य स्थिति देखने को मिली कि प्रधानमंत्री लगातार पाँच दिनों तक लोकसभा में उपस्थित नहीं हुए, जबकि राष्ट्रपति के अभिभाषण और प्रमुख मुद्दों पर चर्चा चल रही थी। स्वयं लोकसभा अध्यक्ष द्वारा यह प्रश्न उठाया गया कि प्रधानमंत्री सदन में क्यों नहीं आए। इससे यह संकेत गया कि सरकार के भीतर और बाहर कुछ ऐसा घटित हो रहा है, जो सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया से अलग है। श्रवण गर्ग का तर्क है कि यह ‘खतरा’ किसी व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैरेटिव नियंत्रण से संबंधित है। संसद में यदि इस भारत-अमेरिका समझौते पर खुली बहस होती, तो सरकार को असहज सवालों का सामना करना पड़ता।

 

भारत-अमेरिका समझौता: समय, संदर्भ और संदेह

            यह समझौता अमेरिका में शुक्रवार रात जारी किया गया, उस समय जब भारत में संसद नहीं चल रही थी, शेयर बाज़ार बंद थे और सार्वजनिक विमर्श लगभग शून्य था। यह पाँच वर्षों के लिए है और 2031 तक प्रभावी रहेगा—चाहे 2029 में सरकार बदले या नहीं। सबसे अहम सवाल यह है कि मोदी सरकार ने ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017–2021) में ऐसा समझौता क्यों नहीं किया? और अब ही क्यों? श्रवण गर्ग के अनुसार, इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं—

·         अमेरिका में चल रहे कुछ कानूनी और राजनीतिक दबाव

·         बड़े उद्योगपतियों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मामलों की छाया

·         और भारत पर रणनीतिक व आर्थिक दबाव

            यह समझौता पाँच वर्षों के लिए प्रभावी होगा और 2031 तक लागू रहेगा। इसकी एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह किसी भावी निर्वाचित सरकार को भी बाध्य करेगा, जिससे लोकतांत्रिक विकल्प सीमित हो जाते हैं। समझौते के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं—

·         अमेरिका से भारत द्वारा लगभग 100 से 500 अरब डॉलर तक का आयात

·         अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में भारी कटौती या पूर्ण उन्मूलन

·         ऊर्जा, विमान, तकनीकी उपकरण, कोकिंग कोयला और बहुमूल्य धातुओं की अनिवार्य खरीद –समझौते के समय और तरीके पर भी प्रश्न उठते हैं। इसे ऐसे समय जारी किया गया जब भारत में संसद सत्र निष्क्रिय था, वित्तीय बाज़ार बंद थे और सार्वजनिक विमर्श लगभग अनुपस्थित था।

 कृषि-प्रधान भारत और समझौते का संभावित प्रभाव

   भारत की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। लगभग 70–80 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। ऐसे में किसी भी कृषि-सम्बंधित आयात नीति का सीधा प्रभाव ग्रामीण भारत पर पड़ता है।

समझौते के अंतर्गत अमेरिका से मक्का, ज्वार, सोयाबीन तेल, फल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और शराब जैसे उत्पादों के आयात पर शुल्क में भारी छूट दी जा रही है। अमेरिकी कृषि उत्पाद बड़े पैमाने पर सब्सिडी प्राप्त होते हैं, जिससे वे भारतीय उत्पादों की तुलना में अत्यंत सस्ते पड़ते हैं।

इसका संभावित परिणाम यह होगा कि—

·         घरेलू किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाएगा

·         बागवानी और नकदी फसलों का बाज़ार सिकुड़ेगा

·         ग्रामीण बेरोज़गारी और ऋण संकट बढ़ेगा

            भारत एक कृषि-प्रधान देश है, जहाँ लगभग 70–80 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़े हैं। इस समझौते के तहत अमेरिका से आने वाले कृषि और औद्योगिक उत्पादों पर शुल्क या तो घटाए जाएंगे या शून्य कर दिए जाएंगे। मक्का, ज्वार, सोयाबीन तेल, फल, शराब, और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ—ये सभी अमेरिकी बाज़ार से सस्ती दरों पर भारत पहुँच सकते हैं। इससे भारतीय किसानों, बागवानी क्षेत्र और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि सस्ता अमेरिकी सोयाबीन तेल भारतीय बाज़ार में भर गया, तो देश के 17 लाख टन घरेलू उत्पादन का क्या होगा?

 

घरेलू उद्योग और विनिर्माण पर प्रभाव

            जहाँ एक ओर भारत अपने बाज़ार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल रहा है, वहीं अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर उच्च शुल्क बनाए रखे हैं। वस्त्र, चमड़ा, हस्तशिल्प, रत्न-आभूषण और प्लास्टिक जैसे क्षेत्रों पर 18% से 25% तक शुल्क लागू हैं। इसके अतिरिक्त, गैर-शुल्क बाधाएँ—जैसे कठोर लाइसेंसिंग नियम, नियामकीय जटिलताएँ और तकनीकी मानक—भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाज़ार में प्रवेश को कठिन बनाती हैं। यह स्थिति व्यापार संतुलन को भारत के विरुद्ध झुका देती है।

 

विनिर्माण, निर्यात और गैर-शुल्क बाधाएं

            जहाँ भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए अपने बाज़ार खोल रहा है, वहीं अमेरिका ने भारतीय वस्त्र, चमड़ा, रत्न-आभूषण, प्लास्टिक, रबर और हस्तशिल्प जैसे उत्पादों पर 18% से 25% तक शुल्क बनाए रखे हैं। इसके अतिरिक्त, लाइसेंसिंग और नियामकीय प्रक्रियाओं जैसी गैर-शुल्क बाधाएं भी बनी हुई हैं, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी चुनौती हैं। समझौते के अनुसार, भारत को अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदने होंगे—ऊर्जा, विमान, विमान पुर्जे, कोकिंग कोयला, बहुमूल्य धातुएँ और तकनीकी उपकरण। इसका सीधा असर देश के व्यापार संतुलन, बजट घाटे और मुद्रा भंडार पर पड़ेगा।

 

 बजट, जवाबदेही और राजनीतिक परिणाम

            यह समझौता बजट पेश होने के बाद सामने आया, इसलिए बजट में इसके प्रभावों का कोई प्रावधान नहीं किया गया। वित्त मंत्री द्वारा जिस 4.3% राजकोषीय घाटे की प्रशंसा की जा रही है, वह आने वाले समय में दबाव में आ सकता है। विदेश मंत्री और वाणिज्य मंत्री के बयानों में भी स्पष्टता का अभाव दिखाई देता है, जिससे यह आशंका और गहराती है कि सरकार के भीतर ही समन्वय की कमी है। श्रवण गर्ग का मानना है कि आगे चलकर दोषारोपण का खेल शुरू होगा, बलि के बकरे ढूँढे जाएंगे, और राजनीतिक जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की जाएगी।

राजकोषीय घाटा और बजटीय दबाव

यह समझौता ऐसे समय में सामने आया जब केंद्रीय बजट पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका था। अतः इसके संभावित आर्थिक प्रभावों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया।

यदि भारत को अमेरिका से बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ा, तो—

·         व्यापार घाटा बढ़ेगा

·         विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा

·         राजकोषीय घाटा निर्धारित लक्ष्यों से अधिक हो सकता है

इस स्थिति में सरकार के लिए सामाजिक कल्याण योजनाओं और बुनियादी ढाँचे पर व्यय बनाए रखना कठिन हो जाएगा।

लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और शासन का प्रश्न

शैक्षणिक दृष्टि से किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल उसके आर्थिक परिणामों से नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रिया से भी किया जाता है। इस समझौते के संदर्भ में पारदर्शिता का अभाव, संसदीय विमर्श की कमी और मंत्रियों के परस्पर विरोधाभासी बयान लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

यदि निर्णय कुछ सीमित राजनीतिक और कॉर्पोरेट हितों के दबाव में लिए गए हैं, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत होगा।

उपसंहार

            भारत–अमेरिका व्यापार समझौता केवल एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक करार नहीं है, बल्कि यह भारत की कृषि संरचना, औद्योगिक भविष्य, बजटीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है। श्रवण गर्ग द्वारा व्यक्त की गई आशंकाएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि यदि इस समझौते की शर्तों की पुनर्समीक्षा नहीं की गई, तो इसके परिणाम दीर्घकाल में गंभीर हो सकते हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र में ऐसे समझौतों पर खुली बहस, पारदर्शिता और व्यापक सहमति अनिवार्य है। अन्यथा, आर्थिक विकास के नाम पर लिया गया निर्णय सामाजिक असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है—जो किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।

            भारत-अमेरिका के बीच हुआ यह समझौता केवल एक व्यापारिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह देश की कृषि, उद्योग, बजट, और राजनीतिक स्थिरता से गहराई से जुड़ा हुआ है। यदि श्रवण गर्ग की आशंकाएँ सही साबित होती हैं, तो इसके परिणाम केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी दूरगामी होंगे। ऐसे में यह आवश्यक है कि सरकार संसद के भीतर और बाहर इस समझौते पर खुली, पारदर्शी और तथ्यपूर्ण चर्चा करे। लोकतंत्र में निर्णय जितने बड़े हों, उतनी ही बड़ी उनकी जवाबदेही भी होनी चाहिए—वरना ‘संभावित तबाही’ केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि वास्तविकता बन सकती है।

(संभावित ‘तबाही’ और राजनीतिक भूचाल की कहानी-श्रवण गर्ग की जुबानी : : https://youtu.be/JpBeEqvjE34?si=F6xEfnQD5HPVUJ9i)

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Ramswaroop Mantri

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