शशिकांत गुप्ते
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
क्रांतिकारी संत कबीरसाहब के उक्त दोहे का यकायक स्मरण नहीं हुआ।एक कटु सत्य है, संसार में विचरण करने वाले सभी प्राणियों में मनुष्य जैसा स्वार्थी प्राणी अन्य कोई नहीं है।
कबीरसाहब के दोहे का आशय भी यही है,मनुष्य स्वार्थवश भगवान का स्मरण करता है।
स्वार्थवश सिर्फ भगवान को ही नहीं अपने पुरखों को भी स्वयं के मतलब के लिए याद करता है।
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अंसख्य देशभक्तों ने अपनी शहादत दी।
इनदिनों जानबूझकर कुछ नादान, नासमझ,लोगों के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर मूर्खतापूर्ण संवाद बोलकर महान क्रांतिकारियों का अपमान किया जा रहा है। अपमान करने वाला व्यक्ति तो सुनियोजित षडयंत्र की चाबी से चलने वाला खिलौना होता है।
राजनीति में निहितस्वार्थ ( Vested interest ) के लिए विभिन्न वादें दावों के साथ किए जातें हैं।वादों को लुभावने शब्दों से श्रृंगारित कर विज्ञापनों के माध्यम से प्रचारित किया जाता है। वादों को जुमले कह देने के बाद भी भावनात्मक महौल पैदाकर बहुमत प्राप्त करने को बहुत बड़ी उपलब्धि समझा जाता है।
स्वार्थपूर्ति के लिए एक ओर बिसरा मुंडा और टंट्या भील जैसे क्रांतिकारियों को इतिहास में दबे पन्नो से बाहर निकाल कर उनका सम्मान किया जा रहा है, दूसरी ओर आजादी का अपमान करते हुए कहा जा रहा है कि स्वतंत्रता तो भीख में मिली है।
राजनीति में दोहरे चरित्र का अभिनय नाटकीय ठंग से बखूबी किया जा रहा है।
एक ओर इतिहास में जानबूझकर गुम किए गए क्रांतिकारियों ढूंढ ढूंढ कर उनका सम्मान सरकारी खर्च से कर वाहवाही लूटी जा रही है। दूसरी ओर राष्ट्रपिता महात्मागांधी के पुतले सांकेतिक गोली मार कर कृतिम खून निकाल कर मिठाईयां बांटी जाती है।
आज स्वार्थवश गांधीजी को भी याद किया जाता है।संविधान की स्तुति की जाती है।
आमजन के दुःख को नजरअंदाज कर नित नए वादे नई योजनाओं की घोषणा के माध्यम से आमजन की भावनाओं को भुनाने में सफलता प्राप्त करने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है।
आमजन की हरतरह की समस्याओं के लिए, यंत्र, तंत्र और मंत्र मौजूद हैं। धरा पर बैठकर मानव ने प्रत्येक भगवान को विभाग ( Portfolio) आवंटित कर दिए हैं।
अमुक समस्या के लिए यह भगवान फलां समस्या के लिए अमुक भगवान।
आज़तक ऐसा कोई मंत्र,यंत्र,या तंत्र ही नहीं बना है जो समस्या पैदा ही न होने दे?
इसीलिए संत कबीरसाहब का दोहा पुनः याद आ रहा है।
दुःख में सुमिरनदुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
शशिकांत गुप्ते इंदौर





