दौर। शहर में अब अफसर माफियाराज खत्म करने की कसमें खा रहे हैं। सारे विभाग मिलकर माफिया पर कहर बनकर टूट रहे हैं, लेकिन वर्षों तक भूमाफिया को मिले ‘फ्री हैंड” के कारण कहीं श्मशान तो कहीं सड़क गायब हो गई। पश्चिम क्षेत्र में श्मशान की जगह मल्टियां तन गईं। चंदन नगर जैसी अवैध बस्ती के कारण शहर की रिंग नहीं जुड़ पाई, लेकिन ऐसा करने वाले माफिया का बाल भी बांका नहीं हो सका। पीपल्याराव, बांक, बिलावली तालाब जैसे ग्रीन बेल्ट के क्षेत्रों में भूमाफिया हरियाली खा गए और अवैध बसाहट उगा चुके हैं। अपने अवैध साम्राज्य से पैसा कमाकर माफिया राजनीति की राह भी पकड़ लेते हैं, ताकि वे कार्रवाई से बचे रहें। अकसर ऐसा ही होता आया है कि माफिया बंगले बनवाकर, रियल एस्टेट के दफ्तर खोलकर सफेदपोश बन जाते हैं और उनसे पीड़ित जनता कागजों के पुलिंदे लेकर न्याय की उम्मीद में दफ्तरों के चक्कर काटती है।
25 साल में पांच बड़े अभियान, नतीजा सिफर..
भूमाफिया के खिलाफ सरकार का यह पहला अभियान नहीं है। बीते 25 वर्ष में पिछली सरकारों ने पांच बड़े अभियान चलाए लेकिन पीड़ित लोगों को न राहत मिली न प्लाट। 1994 से भूमाफिया के चुंगल से आम लोगों को बचाने की कोशिशें जारी है लेकिन ये हर बार तंत्र पर हॉवी होकर बच निकलते हैं। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 7 अगस्त 1994 को रवींद्र नाट्यगृह में खुला मंच आयोजित किया था। तत्कालीन राज्यपाल मो.शफी कुरैशी व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव ने शिविर का शुभारंभ किया था। तब शिविर में घोषणा की गई थी कि जब तक हमारी सांस रहेगी भू-माफिया से लड़ते रहेगें। पीड़ितों को पैसा नहीं लौटाया तो हथकड़ी लगाकर घुमाएंगे। सुबह 11 बजे से आधी रात तक चली सुनवाई में 994 शिकायतें मिली थी। उपमुख्यमंत्री ने सहकारिता विभाग के उपंजीयक और अकेंक्षक को तत्काल निलंबित कर दिया था। दो कॉलोनाइजरों को भी सुनवाई के दौरान ही पुलिस को सौंप दिया गया था। बाद में 276 शिकायतों के निराकरण का दावा करते हुए शेष शिकायतें अन्य विभागों को भेजने की बात कही गई थी, लेकिन लोगों को राहत नहीं मिली।
2004 में भी लगा था समाधान शिविर : इसके बाद तत्कालीन भाजपा सरकार ने वर्ष 2004 में एक सामाधान शिविर तत्कालीन सहकारिता मंत्री गोपाल भार्गव ने लगाया था। तब शिविर में 1717 पीड़ितों ने शिकायत की थी। इन्हें संबधित गृहनिर्माण संस्थाओं को भेजा गया था। बाद में जानकारी दी गई कि 893 शिकायतों का निराकरण करने या जवाब दने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जो लोग कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है अगले शिविर में मंत्रीजी उन्हें खुद सुनेंगे। बाद में सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक भी शिविर ही नहीं आयोजित किया गया। वर्ष 2009 में इंदौर विकास प्राधिकरण से अनुबंधित महात्मा गांधी गृह निर्माण संस्था में प्लॉट आवंटन को लेकर हुए विवाद के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इंदौर में तत्कालीन संभागायुक्त बसंत प्रताप सिंह और तत्कालीन आईजी संजय राणा को भूमाफिया के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई के निर्देश दिए थे। चार-पांच संस्थाओं पर कार्रवाई और भूमाफिया बॉबी छाबड़ा सहित कुछ लोगों की गिरफ्तारी के बाद मुहिम ठंडे बस्ते में चली गई। इसी अभियान का दूसरा चरण तत्कालीन प्रभारी डीआईजी पवन श्रीवास्तव ने चलाया था। इसके बाद से ही शिकायतें धूल खा रही है। नौ जुलाई 2009 को तत्कालीन संभागायुक्त ने बैठक लेकर गृह निर्माण सहकारी संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की थी।
सदस्यों की जमीन मिलीभगत कर बेचने के भी आरोप : कार्रवाई के दौरान ये तथ्य भी सामने आए थे कि देवी अहिल्या, नवभारत, जागृति, नवलखा श्रमिक सहित कई संस्थाओं ने सदस्यों के हक की जमीन बेच दी है। इस पर शासन ने भोपाल से जांच कमेटी भेजकर व्यापक जांच करवाई थी और जांच रिपोर्ट भी शासन को सौंप दी गई थी।
2012 में फिर अभियान चलाया : भूमाफिया के खिलाफ अभियान का तीसरा चरण तत्कालीन कलेक्टर आकाश त्रिपाठी ने जमीन की धोखाधड़ी की बढ़ती शिकायतों के बाद शुरू किया। तब नौ नवंबर से 21 दिसंबर 2012 तक 10 थाना क्षेत्रों में शिविर आयोजित कर शिकायतें ली गईं।
अवैध कॉलोनियों के गढ़ बन गए इलाके : 2012 के पहले तक शहर में बड़े पैमाने पर अवैध जमीन और कॉलोनियों का कारोबार तेजी से फला-फूला था। एरोड्रम क्षेत्र में दर्जनों अवैध कॉलोनियां काट दी गईं। एक ही प्लॉट नोटरी पर कई लोगों के बेचने के बाद विवाद और खूनी संघर्ष की भी दर्जनों शिकायतें थानों में दर्ज हुईं। वर्ष 1994 से 1998 के बीच सबसे ज्यादा अवैध कॉलोनियां बना दी गईं। 2012 तक ही इस इलाके में 100 से ज्यादा अवैध कॉलोनियां तैयार हो चुकी थीं। इनमें सीलिंग की जमीन भी अवैध कॉलोनाइजरों के निशाने पर रही। फर्जी नोटरी के जरिए रजिस्ट्री भी हुई।
सूची बनाकर प्लॉट भी बांटे, कुछ को ही मिले : तत्कालीन संभागायुक्त प्रभात पाराशर ने गृहनिर्माण संस्थाओं की सूची बनाकर पीड़ित सदस्यों को प्लॉट दिलवाने शुरू किए। वरीयता सूची बनाकर प्लॉट देने की कवायद शुरू की। कुछ को प्लॉट मिले भी लेकिन ज्यादातर खाली हाथ रहे।





