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मध्यप्रदेश में जैविक खेती की दुश्वारियां…7.73 लाख किसान कर रहे हैंजैविक खेती , लेकिन उत्पाद बेचने के लिए मंडी नहीं

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भोपाल मध्यप्रदेश में 7.73 लाख किसान जैविक खेती तो कर रहे हैं, लेकिन जैविक उत्पाद बेचने के लिए मंडी और बाजार नहीं है। जैविक उत्पाद बाहर की मंडियों में जाते हैं। इसका फायदा बिचौलिए कमा रहे हैं। प्रदेश में जैविक खेती की दुश्वारियों पर पढ़िए खास रिपोर्ट…

पहले दो किसानों की जुबानी जानिए उनकी कहानी…

दिनकर राय जबलपुर के खबरा मझौली के रहने वाले हैं। उन्होंने कहा, मैं 6 साल से 30 एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती कर रहा हूं। 20 एकड़ में जैविक गन्ना उगाता हूं। इससे तैयार गुड़ मुंबई में 240 रुपए किलो बिकता है, लेकिन आधी रकम बिचौलियों की जेब में चली जाती है। क्योंकि ऑर्गेनिक उत्पाद बेचने के लिए मध्यप्रदेश में बाजार ही नहीं है। सुविधाओं के नाम पर किसानों के लिए कुछ भी नहीं है।

बालकृष्ण विश्वकर्मा विदिशा के रहने वाले हैं। बालकृष्ण ने कहा, 15 एकड़ में 7 साल से औषधीय, सब्जी व अनाज की खेती कर रहा हूं, लेकिन बेचने के लिए बाजार नहीं है। भोपाल मंडी में रासायनिक खेती से पैदा हो रही सब्जी का ही भाव जैविक सब्जियों को मिलता है। औषधीय और अनाज की कीमत जरूर सामान्य से 30% अधिक मिल जाती है। जैविक खेती की सबसे बड़ी समस्या बाजार न होना है।

अब देशभर में मध्यप्रदेश की स्थिति जान लीजिए…

मध्यप्रदेश ऑर्गेनिक फार्मिंग में देशभर में नंबर वन है। एसोचैम की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में जैविक खेती की बहुत संभावनाएं हैं। जैविक खेती के माध्यम से 23 हजार करोड़ की सम्पदा निर्मित हो सकती है। इससे 60 लाख रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। प्रदेश की 45% कृषि भूमि जैविक खेती के लिए उपयुक्त है। इसके बावजूद जैविक खेती कर रहे किसानों को अलग से कोई सुविधा नहीं है।

जानिए, क्या कहा था CM शिवराज सिंह चौहान ने

पिछले दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि सभी मंत्री प्राकृतिक खेती करें। इसके बाद ये शब्द काफी सुर्खियों में आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिवराज सिंह को प्राकृतिक खेती की सलाह दी थी। सीएम शिवराज सिंह ने गंगा की तर्ज पर नर्मदा के दोनों तटों पर जैविक/ प्राकृतिक खेती कराने की घोषणा की है। प्रदेश में 2011 में जैविक नीति भी बनी। 313 विकासखंडों में 3130 गांवों में जैविक खेती भी हो रही है, लेकिन किसानों को जैविक बीज से लेकर मार्केट तक तलाशने पड़ते हैं।

दो कृषि विश्वविद्यालय भी हैं, लेकिन मदद नहीं

जैविक हल्दी और औषधीय खेती करने वाले जबलपुर के अम्बिका पटेल कहते हैं कि प्रदेश में 2001 से ऑर्गेनिक खेती पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन सरकार मदद नहीं दे पा रही है। प्रदेश में दो कृषि विश्वविद्यालय हैं। इसके बावजूद जैविक खेती का प्रमाणिक तरीका नहीं बता पाए।

एसोचैम की 2020-21 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे प्रदेशों के मुकाबले मध्यप्रदेश से सबसे ज्यादा जैविक खेती होती है। यहां 17 लाख 31 हजार 653 हेक्टेयर में प्राकृतिक खेती हो रही है। पिछले साल 5 लाख 636 मीट्रिक टन जैविक सामग्री दूसरे देशों को एक्सपोर्ट की गई थी। इसकी लागत करीब 2,683 करोड़ रुपए थी।

6 साल में नेचुरल फार्मिंग के 6 लाख किसान बढ़े

एसोचैम की ही 2015 की रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में जैविक खेती 1.70 लाख किसानों को आजीविका मुहैया कराती है, लेकिन राज्य में कमजोर सुविधाओं की वजह से उनकी आय में इजाफा नहीं हुआ। 2020-21 में जैविक खेती करने वाले किसान बढ़ कर 7.73 लाख हो गए। देश की बात करें, तो मौजूदा समय में 43.38 लाख किसान 39 लाख हेक्टेयर में जैविक खेती कर रहे हैं।

जबलपुर के गांधी भवन परिसर में महीने के दूसरे और आखिरी रविवार को जैविक मंडी लगती है। किसान जैविक उत्पाद यहां बेच सकते हैं।

जबलपुर के गांधी भवन परिसर में महीने के दूसरे और आखिरी रविवार को जैविक मंडी लगती है। किसान जैविक उत्पाद यहां बेच सकते हैं।

आइए समझते हैं जैविक खेती होती क्या है?

जैविक खेती में रासायनिक उर्वरक या पेस्टिसाइड्स का प्रयोग नहीं होता। गोबर और गौ-मूत्र से तैयार जैविक खाद का प्रयोग करना होता है। एनओपी (नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन) के मानक के मुताबिक बहुवर्षीय फसलों में 36 महीने और मौसमी फसलों में 24 महीने बाद का प्रोडक्ट जैविक कहलाता है।

जैविक प्रमाणीकरण क्यों है जरूरी?

MPSOCA (मप्र राज्य ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी) के एमडी जीपी प्रजापति के मुताबिक जैविक खेती से पहले उसका प्रमाणीकरण कराना होता है। इसके बाद ही किसान अपने उत्पाद विदेशों में निर्यात कर सकते हैं। वर्तमान में यहां 234 किसान या समूह रजिस्टर्ड हैं। प्रदेश में मौजूदा समय में 2.50 लाख हेक्टेयर में जैविक खेती हो रही है। न्यूनतम 4 हेक्टेयर खेती करने वाले किसान पंजीयन करा सकते हैं। इससे छोटे किसान 25 या 500 लोगों का समूह बनाकर समूह पंजीयन करा सकते हैं। हर साल इसका नवीनीकरण कराना पड़ता है।

जैविक उत्पाद की जांच की क्या है व्यवस्था?

MPSOCA को कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के मापदंडों के मुताबिक न्यूनतम 5 % आवेदकों की फसल, मिट्‌टी या पानी के सैंपल की एनबीएल द्वारा अप्रूव्ड लैब से जांच कराई जाती है। जांच का उद्देश्य फसल उत्पादन में या प्रोसेसिंग के समय मिलाए गए पेस्टिसाइड्स का पता लगाना होता है।

फॉर्मर ये गलती करते हैं, तो उनके उत्पाद जैविक नहीं

  • जैविक खेती के लिए देसी बीज का ही प्रयोग करना होता है।
  • पहले साल, जो बीज बोया हो, उसे ही आगे भी बोएं।
  • खेत में दूसरे खेत का पानी बहकर न आए।
  • सिंचाई के लिए भूजल का ही उपयोग करें।
  • खेत के चारों ओर बाड़ या खेत के अंदर तीन मीटर चौड़ी पट्टी में अन्य फसल बोएं, जिससे रसायनों का प्रभाव रोक पाएं।
  • जैविक फसलों के उत्पादन में काम आने वाले स्प्रे पंप से रासायनिक दवाओं का छिड़काव न करें।
  • फसल कटाई के बाद मिलावट (अन्य किस्में, धुल, मिट्टी आदि) नहीं होना चाहिए।
  • किसान को जैव उत्पाद को संभाल कर अन्य फसल के बीजों से अलग सुरक्षित स्थान में भंडारण करना होगा।

जैविक प्रोडक्ट असली है या नकली, कैसे पहचानें

किसानों से जैविक उत्पाद खरीदने वाले प्रोसेसिंग यूनिट के संचालकों को भी MPSOCA में रजिस्ट्रेशन कराना होता है। किसान या प्रोसेसिंग करने वाली एजेंसी जैविक उत्पाद को पैक में ही बेच सकते हैं। पैकेट पर प्रोडक्ट की जानकारी, सर्टिफाई संस्था का लोगो और रजिस्ट्रेशन नंबर अंकित करने का प्रावधान है। ग्राहक इसे चेक करके ही जैविक प्रोडक्ट खरीदे।

क्या करने वाली है सरकार
प्रदेश सरकार जैविक नीति के तहत गौ-पालन करने वाले को महीने में 1500 से 2 हजार रुपए देने की तैयारी में है। किसानों से जैविक उत्पाद खरीदने के लिए सरकार नीति लाने की तैयारी में है।

जैविक खेती के लिए एमपी में अब तक हुए प्रयास

  • एमपी में 2001 से जैविक खेती ग्राम पंचायत स्तर पर शुरू कराई गई।
  • अब तक 313 विकासखंडों में 3130 ग्राम पंचायतों में जैविक खेती हो रही है।
  • 2011 में प्रदेश सरकार जैविक नीति लेकर आई।
  • वर्तमान में खमरिया जबलपुर में 80 हेक्टेयर और बुरहानपुर में 6 हेक्टेयर में जैविक बीज का उत्पादन होता है।
  • इन केंद्रों से सोयाबीन, धान, अरहर, उड़द, मूंग, तिल, मक्का, कोदो, कुटकी, ज्वार के बीज उपलब्ध कराए जाते हैं।
  • जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय 16 तरह के जैविक खाद तैयार कर रहा है।
  • देश की पहली जैविक खेती इकाई इंदौर में शुरू हुई थी।
  • मप्र राज्य जैविक प्रमाणीकरण संस्था भोपाल में खुली है।
  • मंडला में 47 हेक्टेयर भूमि में जेएनकेवी जैविक कृषि अनुसंधान केंद्र संचालित कर रहा है।
  • खंडवा में 2018 में जैविक कपास अनुसंधान केंद्र खुला।

अमरीका-यूरोप व अरब देशों में जाता है जैविक उत्पाद
एपीडा के मुताबिक देश ने 2020-21 में 8 लाख 88 हजार 179 मीट्रिक टन जैविक खाद्य सामग्री विदेशों में 7,078 करोड़ रुपए में निर्यात की। इसमें मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी 5 लाख मीट्रिक टन रही। इसके बदले प्रदेश को 2,683 करोड़ रुपए मिले।

किन देशों में सबसे ज्यादा सप्लाई

अमरीका, यूरोपीय संघ, कनाडा, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम, न्यूजीलैंड प्रमुख हैं। जैविक निर्यात में एमपी का योगदान 40 % का है। ये रकम किसानों के हाथों में नहीं पहुंच पाती।

जैविक कपास का भी तेजी से मार्केट बढ़ रहा है।

जैविक कपास का भी तेजी से मार्केट बढ़ रहा है।

20 % की दर से बढ़ रहा जैविक मार्केट

देश में जैविक खाद्य उद्योग 20 % की दर से बढ़ रहा है। इससे जैविक खाद्यान्न से जुड़ी कंपनियों को अवसर उपलब्ध होंगे। इन उत्पादों में जैविक तेल, अनाज, जूस और डेयरी उत्पाद शामिल हैं। देश के महानगरों में ऑर्गेनिक फार्मेसी का चलन बढ़ गया है। इससे फार्मा कंपनियों के लिए नए अवसर खुले हैं।

किसानों की मदद में ये कर सकती है सरकार

  • प्रदेश में ऑर्गेनिक प्रोडक्ट बेचने का अधिकृत मार्केट नहीं है।
  • बाजार में बिक रहे ऑर्गेनिक उत्पाद को लेकर लोगों में भरोसा नहीं।
  • लोग ब्रांड पर भरोसा करते हैं। एक आम किसान के लिए ये संभव नहीं।
  • खादी ग्रामोद्योग की मदद से इसकी मार्केटिंग हो सकती है।
  • हर किराना दुकान में 10 % ऑर्गेनिक उत्पाद रखने का नियम बने।
  • जैविक की गुणवत्ता की जांच के लिए प्रदेश स्तर पर लैब बनाना होगा।
  • जैविक आधारित लघु उद्योग को प्रोत्साहित करना होगा।
  • सरकार चाहे, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी कर सकती है।
  • खरपतवार नियंत्रण के लिए जैविक तरीका बताना होगा।

Ramswaroop Mantri

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