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हिंदी गजल सम्राट दुष्यंत कुमार की याद में

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मुनेश त्यागी

हिंदी में ग़ज़ल का आगाज करने वाले हिंदी के महान कवि गजलकार दुष्यंत कुमार ( दुष्यंत कुमार त्यागी) को उनकी पुण्यतिथि (३० दिसंबर १९७५) पर, शत शत नमन, वंदन और क्रांतिकारी सलाम।

कैसे लिख दूँ दुष्यंत कुमार... - Death Anniversary of Dushyant Kumar


हिंदी में ग़ज़ल की शुरुआत करने वाले महान कवि और गजलकार दुष्यंत कुमार ने अपनी जिंदगी में हर मौके के अनुसार सैकड़ों, हजारों शेर और गजलों की रचना की है, और ग़ज़ल को ठेठ उर्दू से निकालकर हिंदी में लाए हैं। हिंदी में यानी जनता की आम भाषा में ग़ज़ल कहने का सबसे पहले श्रेय गजल सम्राट दुष्यंत कुमार को ही जाता है। उनके कुछ खास शेरों को मैं आप सबके साथ साझा कर रहा हूं, देखियेगा जरा ,,,,,,,

यह सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ
होगा,
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।
यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों
इस दीए में तेल की भीगी हुई बाती तो है।

कैसी मशालें लेकर चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वह भी सलामत नहीं रही।
हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग
रो रो के बात कहने की आदत नहीं रही।

गजब है सच को सच कहते नहीं वो
कुरानो उपनिषद खोले हुए हैं।
मजारों से दुआएं मांगते हो
अकीदे किस तरह पोले हुए हैं।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं है आदमी, हम झुंझुने हैं।

रहनुमाओं की अदाओं पर फिदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो।
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।

आप दीवार गिराने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे यह तो हद है।

मस्लहत आमेज होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत तू अभी नादान है।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।

मुझ में रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं
हर गजल अब सल्तनत के एक बयान है।

मेरी जुबान से निकली तो सिर्फ नज्म हुई
तुम्हारे हाथ में आई तो एक मशाल हुई।

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है।

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए
इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिए।

गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में
सरकार के खिलाफ यह साजिश तो देखिए।

रौनके जन्नत जरा भी मुझको रास आई नहीं
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।

मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं।

और यह ग़ज़ल। इस ग़ज़ल का कमाल है, यह गजल शायद दुनिया में सबसे ज्यादा गायी गई है, मीटिंगों का आगाज होने पर, सभाओं में, बैठकों में, स्कूलों में, कॉलेजों में, यूनियनों में, विधान सभा के पटल पर, संसद के पटल पर, क्रांतिकारी आंदोलनों में, संघर्ष के मैदानों में, किसानों मजदूरों नौजवानों विद्यार्थियों और महिलाओं के आंदोलनों में, यह ग़ज़ल सबसे ज्यादा गायी जाती है। इसका कोई तोड़ नहीं है। कोई भी क्रांतिकारी प्रोग्राम शुरू होता है तो उसका आगाज भी इसी ग़ज़ल से होता है और यहीं पर गजल सम्राट दुष्यंत कुमार, कबीर ,तुलसी, मीर और गालिब की पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। उनके अभिनंदन में, उन्हीं की यह सबसे मशहूर ग़ज़ल पेश कर रहा हूं,,,,

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए।

आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी
शर्त मगर थी कि बुनियाद दिल्ली चाहिए।

हर गली हर गांव से हर सड़क हर शहर से
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

मेरे सीने में ना सही तेरे सीने में ही सही
हो कहीं भी मगर आग जलनी चाहिए।

Ramswaroop Mantri

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