अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

मधु लिमये की याद में!

Share

-विनोद कोचर

  ये एक सुखद और एक तरह से, क्रांतिकारी संयोग ही था कि आपातकाल के बंदीवास के दौरान मुझे दो महीनों तक बालाघाट जेल में रखने के बाद सरकार ने मुझे25अगस्त 1975को और मधुजी को, रायपुर जेल में दो महीनों तक रखने के बाद,  7सितंबर1975को नरसिंहगढ़ जेल में भेज दिया।

        सोचता हूँ कि अगर ये संयोग नहीं मिलता तो मेरे जैसे, आरएसएस के पूर्ण प्रशिक्षित और कई संघ शिविरों में प्रशिक्षक रह चुके,14वर्ष की संघ आयु वाले स्वयंसेवक का क्या होता?

                     आज मेरे पास इस सवाल का यही जवाब है कि अगर जेल में मुझे मधुजी का सान्निध्य नहीं मिला होता तो मैं शायद अभी तक राष्ट्रवाद की हिन्दूराष्ट्रवादी जहरीली और नशीली नागिन के मोहपाश में लिपटे रहकर ,अन्य स्वयंसेवकों की तरह गांधी का आलोचक और गोडसे का प्रशंसक बनकर छद्म आत्मगौरव के नशे में झूम रहा होता😢

                    आरएसएस पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने और स्वयंसेवकों को जेल से रिहा करने के लिए गिड़गिड़ाहट की भाषा में इंदिरा गांधी को , आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बाळासाहेब देवरस द्वारा लिखा गया पत्र तथा हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के अवैध घोषित चुनाव को, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में किये गए संशोधन द्वारा बेअसर करने के बाद, सुप्रीमकोर्ट द्वारा वैध घोषित करते हुए श्रीमती गांधी को दी गई क्लीन चिट पर इंदिरा गांधी को बधाई देने वाला पत्र पढ़कर, जेल में ही मेरी संघ के प्रति आस्था चरमराने लगी थी।

                मीसाबंदी स्वयंसेवकों का पारिवारिक और कारोबारी चिंता में डूबकर, छाती पीट पीटकर रोना चिल्लाना भी मैंने देखा तो संघियों की खोखली देशभक्ति ने भी मुझे शर्मसार किया।

           इसके अलावा, मधुजी के साथ घंटों लंबी बातचीत के जरिये और जेल में बिताई गई उनकी जीवन शैली के जरिये भी मेरा वैचारिक कायाकल्प हिन्दूराष्ट्रवाद से भारतीय समाजवाद की तरफ होता चला गया और मुझे पता ही नहीं चला कि कब और कैसे मैं समाजवादी आंदोलन की विचारधारा में दीक्षित हो गया!

    आपातकाल के खिलाफ जेल में ही अपने लेखन के जरिये, मधुजी ने जो बेमिसाल लड़ाइयां लड़ीं उनका भी मैं चश्मदीद गवाह बन गया।

               मधुजी के सत्संग में नरसिंहगढ़ जेल में14नवंबर1976तक मैं रहा और पढ़ने लिखने का शौकीन होने के कारण, सिर्फ मधुजी की ही बदौलत मुझे जीवन में पहली बार महात्मा गांधी और डॉ राममनोहर लोहिया के जीवन, चरित्र, लेखन और कर्मों का अध्ययन करने मिला क्योंकि आरएसएस ने ये ज्ञान न उस समय और न ही उसके बाद आजतक कभीं भी अपने स्वयंसेवकों को मुहैया  कराया।

                      मधुजी के निजी सहायक की भूमिका निभाते हुए मुझे उनके,जेल में लिखे गए लेखन की हिंदी व अंग्रेजी की फेयर प्रतियां भी अपने स्वाक्षरों से तैयार करने का सुअवसर भी मिलता चला गया।

           14नवंबर1976को बीमारी के इलाज के लिए भोपाल जेल जाने के पहले मधुजी अपनी काफी किताबें,पढ़ने के लिए मेरे पास छोड़कर गए थे जिन्हें1977में हुए लोकसभा चुनावों के बाद ,उनके बुलावे पर दिल्ली जाकर ही मैं वापस कर पाया था।

       दिल्ली में भी मधुजी के, 15AB पंडारा रोड स्थित सरकारी बंगले में11दिनों तक मैं मधुजी के साथ रहा और वहाँ भी उनके कई पेंडिंग कामों को उनके निर्देशानुसार निबटाता रहा।मधुजी चाहते थे कि मैं दिल्ली में उनके साथ ही उनके घर में रहूं लेकिन अपरिहार्य परिवारिक कारणों से ये मेरे लिए संभव नहीं था।

          आज मधुजी की तमाम यादें और प्रेरक जीवन मेरे दिलोदिमाग में चलचित्र की तरह तैर रहे हैं।

महादेवी वर्मा के शब्दों में:-

क्या भूलूँ क्या याद करूँ?
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
अगणित उन्मादों के क्षण हैं।
याद दुखों के आंसू लाती,
दिल का दुख भारी कर जाती!
रजनी की सूनी घड़ियों को
किन किन से आबाद करूँ?

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें