शैलेंद्र चौहान
आज की वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए यह अनुभूति तीव्र होती जाती है कि सत्ता-संरचनाओं, सार्वजनिक विमर्श और जनमानस पर एक प्रकार की उग्रता, आवेगशीलता और व्यक्तिवादी सनक का प्रभाव बढ़ रहा है। “सनकियों की बादशाहत” कोई मनोवैज्ञानिक आरोप भर नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिघटना का संकेत है, जिसे दार्शनिक और अकादमिक दृष्टि से समझना आवश्यक है।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना होगा कि ‘सनक’ से आशय क्या है। यहाँ सनक किसी चिकित्सकीय विकार का संकेत नहीं, बल्कि उस राजनीतिक-नैतिक प्रवृत्ति का नाम है जिसमें तर्क, संस्थागत संतुलन और संवाद की संस्कृति को दरकिनार कर व्यक्तित्व-केन्द्रित निर्णय, उग्र वक्तव्य और भावनात्मक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता दी जाती है। आधुनिक लोकतंत्र, जिसकी सैद्धांतिक नींव विवेक, कानून के शासन और संस्थागत नियंत्रण-प्रतिनियंत्रण यानी चेक्स एंड बैलेंसेस पर टिकी है, वह इस प्रवृत्ति से स्वभावतः असहज होता है।
राजनीतिक दर्शन के स्तर पर यदि हम देखें तो आधुनिक राज्य की अवधारणा सामाजिक अनुबंध की धारणा से विकसित हुई, जहाँ नागरिक अपनी स्वायत्तता का एक अंश संस्थाओं को सौंपते हैं ताकि सामूहिक जीवन सुरक्षित और न्यायपूर्ण रह सके। परंतु जब संस्थाओं की विश्वसनीयता कम होती है—भ्रष्टाचार, असमानता या निर्णयहीनता के कारण—तब नागरिकों का विश्वास औपचारिक संरचनाओं से हटकर करिश्माई व्यक्तित्वों पर केंद्रित होने लगता है।
20वीं सदी में एडॉल्फ़ हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी के उदय को इसी संदर्भ में समझा गया है: आर्थिक संकट, राष्ट्रीय अपमान और सामाजिक असुरक्षा ने तर्कशील लोकतंत्र को कमजोर कर उग्र नेतृत्व को अवसर दिया। यह उदाहरण केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि चेतावनी के रूप में प्रासंगिक है।
समकालीन संदर्भ में इस प्रवृत्ति के कई कारण दिखाई देते हैं। पहला कारण है आर्थिक असमानता का विस्तार। वैश्वीकरण और नवउदारवादी अर्थव्यवस्था ने पूँजी के प्रवाह को तो तीव्र किया, परंतु समान अवसरों का वितरण सुनिश्चित नहीं कर सकी। जब व्यापक जनसमुदाय स्वयं को हाशिए पर अनुभव करता है, तब वह जटिल नीतिगत समाधानों की अपेक्षा सरल, भावनात्मक और आक्रामक भाषणों से अधिक प्रभावित होता है। ‘समाधान’ की बजाय ‘दोषारोपण’ की राजनीति लोकप्रिय हो जाती है।
दूसरा कारण है डिजिटल युग का संप्रेषण-संकट। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों ने सूचना का लोकतंत्रीकरण किया, पर साथ ही सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली कर दी। एल्गोरिद्मिक संरचनाएँ उत्तेजना और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती हैं क्योंकि वही अधिक क्लिक और सहभागिता उत्पन्न करते हैं। परिणामतः सार्वजनिक विमर्श में संयम और गहराई के स्थान पर तीव्रता और सनसनी का वर्चस्व स्थापित होता है। यह वातावरण उग्र व्यक्तित्वों को वैधता प्रदान करता है।
तीसरा कारण सांस्कृतिक अस्मिता का संकट है। तीव्र वैश्विक परिवर्तन—प्रवास, तकनीकी क्रांति, सांस्कृतिक अंतःक्रिया—ने पारंपरिक पहचान-ढाँचों को चुनौती दी है। इस चुनौती के प्रत्युत्तर में कई समाजों में रक्षात्मक अस्मितावाद उभरा है। जब पहचान को संकटग्रस्त बताया जाता है, तब तर्कशील बहस की जगह भावनात्मक आवेग ले लेता है। इस प्रक्रिया में “अन्य” का निर्माण होता है, जिसे समस्याओं का कारण ठहराया जाता है।
दार्शनिक स्तर पर यह स्थिति आधुनिकता की उस अंतर्विरोधी प्रकृति को भी उजागर करती है, जिसमें एक ओर विवेक और विज्ञान का विस्तार है, तो दूसरी ओर अर्थहीनता और अलगाव का अनुभव भी बढ़ा है। जब व्यक्ति स्वयं को विशाल तकनीकी-सांस्कृतिक तंत्र में नगण्य अनुभव करता है, तब वह किसी प्रबल नेतृत्व में अपनी शक्ति का प्रतिरूप देखने लगता है। यह मनोवैज्ञानिक आकांक्षा राजनीतिक संरचनाओं को प्रभावित करती है।
परंतु यह भी ध्यान देना चाहिए कि “सनकियों की बादशाहत” सर्वव्यापी और स्थायी सत्य नहीं है। इतिहास में उग्रता और विवेक के बीच निरंतर द्वंद्व चलता रहा है। जहाँ अतिवाद उभरता है, वहीं प्रतिरोध की शक्तियाँ भी जन्म लेती हैं—नागरिक आंदोलनों, स्वतंत्र पत्रकारिता, न्यायपालिका और अकादमिक विमर्श के रूप में। लोकतंत्र की आत्म-संशोधन क्षमता इसी में निहित है कि वह अपने संकटों से सीखता है।
अंततः प्रश्न केवल यह नहीं कि सनकी नेतृत्व क्यों उभर रहा है, बल्कि यह भी कि नागरिक समाज किस प्रकार अपनी आलोचनात्मक चेतना को सुदृढ़ कर सकता है। शिक्षा, आलोचनात्मक चिंतन और सांस्कृतिक संवाद की पुनर्स्थापना अनिवार्य है। साहित्य और दर्शन की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे जटिलता को स्वीकार करते हैं, सरल नारों का प्रतिरोध करते हैं और मनुष्य की बहुआयामी प्रकृति को सामने लाते हैं।
इस प्रकार “सनकियों की बादशाहत” एक युगीन संकट का संकेत अवश्य है, पर यह नियति नहीं है। यह एक ऐतिहासिक क्षण है, जो हमें लोकतांत्रिक मूल्यों, तर्कशीलता और नैतिक साहस की पुनर्परिभाषा के लिए बाध्य करता है। प्रश्न यह नहीं कि सनक कितनी प्रबल है, बल्कि यह कि विवेक कितनी दृढ़ता से स्वयं को संगठित कर पाता है। इतिहास अंततः उसी के पक्ष में जाता है जो संस्थाओं को मजबूत करता है, संवाद को जीवित रखता है और भय के स्थान पर स्वतंत्रता को चुनता है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)






Add comment