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इंदौर के 100 साल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नरेंद्र तोमर:पिता ने फकीर को दान किया बेटा, फिर उनसे खरीदा

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इंदौर

इंदौर के सैकड़ों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने आजादी की लड़ाई लड़ी। इनमें से 5-7 सेनानी ही जीवित हैं। हम बात करेंगे शहर के सबसे उम्रदराज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की।

इंदौर शहर से 25 किलोमीटर दूर पिवड़ाय गांव के रहने वाले नत्थूसिंह उर्फ नरेंद्र सिंह तोमर का जन्म 4 मार्च 1923 को हुआ। नरेंद्र सिंह तोमर ​​​​​​आजादी के संग्राम में मात्र 18 वर्ष की उम्र में जेल चले गए थे। नाथूराम गोडसे ने जब महात्मा गांधी की हत्या की तो इन्हें नाथूराम नाम से इतनी घृणा हो गई कि अपना नाम बदल लिया। सभी दस्तावेज में आधिकारिक रूप से नत्थू सिंह से नरेंद्र सिंह करवा लिया।

नरेंद्र तोमर 100 साल 6 महीने के हो चुके हैं। उनके चेहरे पर दुश्मनों को पराजित करने के बाद वाली लालिमा आज भी दिखाई देती है। नरेंद्र सिंह अब बोल और सुन नहीं पाते हैं, लेकिन किसी के आने-जाने पर मुस्कुराकर अभिवादन जरूर स्वीकार करते हैं। दैनिक भास्कर ने उनसे बात की तो इतना ही जवाब मिला कि आजादी सुनकर अच्छा लगता है। हालांकि, वे मौजूदा माहौल से नाराज भी थे। आजादी की वर्षगांठ के अवसर पर आज उसी योद्धा की कहानी…

गांव पिवड़ाय में बलभद्र सिंह तोमर (उर्फ कन्हैया सिंह) और कावेरी देवी के घर एक क्रांतिकारी का जन्म हुआ था। नाम रखा गया ‘नत्थू सिंह’। नत्थू सिंह के जन्म से पहले इनके दो भाई और दो बहनों की मृत्यु हो चुकी थी।

पिता कन्हैया सिंह अपने बच्चों की मौत से विचलित थे। इसी दौरान उनकी भेंट एक महात्मा से हुई। उन्होंने सुझाव दिया कि अब तुम्हारे घर में जो भी बच्चा जन्म ले, उसे किसी फकीर को दान कर देना। कन्हैया सिंह ने नत्थू सिंह के जन्म लेते ही उन्हें पास में रहने वाले एक फकीर कासम शाह को दान कर दिया। वहां रीति-रिवाज के अनुसार उनकी नाक का छेदन किया गया और नाम रखा गया ‘नत्थू शाह’

महात्मा जी के कहे अनुसार सवा महीने बाद नत्थू शाह से नत्थू सिंह बने

जन्म के सवा महीने बाद महात्मा के बताए अनुसार​​​​​ सवा मन अनाज, सवा मन गुड़, सवा किलो चांदी और सवा तोला सोना देकर कन्हैया सिंह ने नत्थू को कासम शाह से खरीद लिया। कासम शाह ने नत्थू के लौटाने के साथ इस्लामिक रीति अनुसार इबादत के लिए इनके घर में दरगाह भी स्थापित करवाई जो आज भी है।

नत्थू सिंह उर्फ (नरेन्द्र सिंह तोमर) के साथ उनके बेटे योगेंद्र सिंह।

नत्थू सिंह उर्फ (नरेन्द्र सिंह तोमर) के साथ उनके बेटे योगेंद्र सिंह।

नरेंद्र तोमर के बेटे योगेंद्र बताते हैं कि पिताजी ने बहुत विपरीत परिस्थितियों में जिंदगी जी। पिता जी हमेशा कहते थे कि प्रतिभा परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती है। गुलामी का वक्त था, ग्रामीण समाज बहुत पिछड़ा हुआ था। लोगों का सामाजिक और आर्थिक स्तर बहुत ही निम्न स्तर का था। उन दिनों गांवों में महिलाएं अपने घर में उपयोग आने वाला आटा हाथ चक्की से पीसती थीं।

नत्थू ​​​​सिंह को शुरुआत से गीत के प्रति अलग प्रेम था। समय के साथ-साथ गाने के प्रति रुझान बढ़ता गया। बिना किसी संगीत क्लास के नत्थू ग्रामीण अंचल के पारंपरिक लोकगीत और उस समय प्रचलित फिल्मी गाने बहुत ही मधुर स्वर में गाते और लोगों की खूब शाबाशी बंटोरते।

1929 में नत्थू सिंह ने गांव कम्पेल के एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई शुरू की। दूसरी कक्षा में पढ़ने के दौरान नत्थू के शिक्षक ने बताया कि अंग्रेजों ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे राष्ट्र भक्तों को फांसी पर लटका दिया है। उन दिनों केवल अखबार के माध्यम से जानकारी मिला करती थी, लेकिन अखबार भी शहरों में कुछ पढ़े-लिखे लोगों के यहीं आते थे। यह खबर सुनते ही नत्थू ​​​​सिंह भावुक हो गए।

गीत गाकर देशभक्ति की अलख जगाते थे

तब कांग्रेस के नेता आते थे तो वे लोगों को समझाते थे कि देश को आजाद करना है। ऐसे में लोगों में आजादी के प्रति अलग अलख जगे। इसके लिए भीड़ एकत्रित हो तो दादा (पिता) के गीत स्टेज पर गाए जाते थे। 5वीं कक्षा के बाद पिता नत्थू सिंह और उनसे 2 साल छोटे भाई मोहन का दाखिला इंदौर में करवा दिया।

उस समय देश आजादी के लिए तड़प रहा था, महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन और सत्याग्रह का दौर था। गांधी जी ने जैसे आम आदमी की नब्ज थाम ली थी। जगह-जगह सभाएं होती थीं। नत्थू भी नेताओं की सभाओं में जाने लगे। इंदौर में बड़ी सभाएं उन दिनों के सुभाष चौक, अब राजबाड़ा में होती थी, वो उनमें शामिल होते।

नत्थू ​​​​सिंह ने अपने सुरीले गीतों के चलते इन सभाओं में जगह बना ली। सब नेताओं ने नियम बना लिया कि भीड़ इकट्ठा करनी है तो तोमर जी को देश भक्ति गीत गाने के लिए बुलाओ। लोग इकट्ठा होते नेताओं के भाषण होते और तोमर जी गीत गाते। नत्थू ​​​​सिंह के लिखे और गाए गीत अब किताबों में छपकर बहुत ही लोकप्रिय हो गए थे।

नत्थूसिंह द्वारा लिखित पुस्तकों का उनके घर में संग्रह है।

नत्थूसिंह द्वारा लिखित पुस्तकों का उनके घर में संग्रह है।

नत्थू ​​​​सिंह को 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेजों ने किया था गिरफ्तार

सन 1939 तक नत्थू ​​​​सिंह मालवा प्रांत में बहुत ही लोकप्रिय हो गए थे। उनकी राष्ट्र भक्ति और लोकप्रियता से अंग्रेजी हुकूमत की नजर इनकी तरफ पड़ी। फरवरी 1941 में 18 वर्ष की आयु में नत्थू सिंह की शादी माधोसिंह कुशवाह की बेटी पानकुंवर से हो गई। ससुर रेलवे में माल बाबू थे। युवा नत्थू को शादी के कुछ दिन बाद ही अंग्रेज सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। उनको तीन महीने की सजा हुई।

जेल में भी गीत लिखने का क्रम जारी था। 1941 से 1945 तक तीन बार तीन-तीन महीने की सजा हुई। तब अंग्रेजी कोर्ट ने नत्थू ​​​​सिंह को एक साल के लिए जिलाबदर कर दिया। इस दौरान वो भोपाल में अपने चचेरे भाइयों के साथ रहे और वहां भी गीत लिखते रहे।

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। देश को राजनीतिक आजादी तो मिली, लेकिन अब सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर बहुत ही खराब स्थिति थी। गरीबी, अंधविश्वास और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव था, देश के टुकड़े भी असहनीय दर्द देकर गए। आजादी के बाद तोमर जी अपने गांव लौटे, लेकिन इंदौर के अपने लोगों के सम्पर्क में रहे।

नरेंद्र तोमर शहर में घूमकर साइकिल से वापस गांव जाते-आते। प्रतिदिन लगभग यही काम रहता। गांव लौटने के बाद ग्रामीण अंचल के विकास के लिए गीत लिखना शुरू कर दिया। आजादी और मालवी गीतों को मिलाकर 600 से अधिक गीत लिखे हैं।

कम्पेल का पास पिवड़ाय गांव पर नत्थू सिंह का घर।

कम्पेल का पास पिवड़ाय गांव पर नत्थू सिंह का घर।

नाथूराम ने गांधी जी को गोली मारी तो नत्थू सिंह ने अपना नाम ही बदल दिया

आजादी के बाद जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी, तब नत्थू सिंह को बहुत आघात पहुंचा। चूंकि गांधी जी के हत्यारे का नाम नाथूराम था, इसलिए इस नाम से इनको नफरत हो गई। तब से अपना नाम बदलकर नरेन्द्र सिंह तोमर कर दिया।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने आजादी की रजत जयंती पर सभी स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। उसमें भी बदला हुआ नाम नत्थू सिंह उर्फ नरेंद्र सिंह तोमर ही लिखा गया है। जब उज्जैन में इंदिरा गांधी ने एक वृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को गले में ताम्रपत्र पहनकर घूमते देखा तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने सभी सेनानियों के लिए सम्मान निधि स्वरूप 250 रुपए प्रति माह की पेंशन शुरू की। इस पर नरेंद्र सिंह ने उसे लेने से यह कहकर मना किया कि हम देश को आजाद कराने के लिए इसलिए जेल नहीं गए थे कि हमें मुआवजा मिले।

रजत जंयती के अवसर पर ताम्र पत्र से सम्मानित नरेन्द्र सिंह।

रजत जंयती के अवसर पर ताम्र पत्र से सम्मानित नरेन्द्र सिंह।

पत्नी ने गांव में पहला कन्या शाला खुलवाया

गांवों में बालिकाओं का शैक्षणिक स्तर निम्न था। नरेंद्र सिंह की पत्नी प्राइमरी स्कूल की प्रधान अध्यापिका भी। उन्होंने इस दौरान गांव में पहले कन्या शाला खुलवाया। अब गांव और देश धीरे-धीरे विकास कर ही रहा था कि 1962 में भारत-चीन युद्ध छिड़ गया। देश के सीमावर्ती इलाकों से युद्ध के कारण लोग पलायन करने लगे।

तब तोमर को मध्यप्रदेश के गांधी स्मारक निधि की ओर से शांति सैनिक बनाकर हिमाचल प्रदेश के किन्नौर भेजा गया। वहां जाकर भी तोमर जी ने अपने गीतों से लोगों को समझाया, हिम्मत बंधाई और पलायन से रोका। वहां भी राष्ट्र प्रेम के गीत लिखे। वहां के रीति रिवाज, रहन-सहन और बोली भी सीखी।

एक साल तक वहां रहकर लौटे और मध्यप्रदेश में हरिजन सेवक संघ से जुड़े और हरिजनों के उत्थान के लिए कार्य किए। गांव लौटकर अपनी खेती में जुट गए। इसी दौरान सन 1966 में उनके पिता का निधन हो गया।

नरेंद्र सिंह ने कई प्रकार की कलाकृतियां भी बनाई हैं।

नरेंद्र सिंह ने कई प्रकार की कलाकृतियां भी बनाई हैं।

आज भी नियमित दिनचर्या और संतुलित आहार

101 साल की उम्र के चलते अब शरीर थक चुका है, लेकिन कुछ देर बैठ लेते हैं और कही गई बातों को समझ लेते हैं। कुछ साल पहले पैरालिसिस अटैक के आने के कारण तब से बोल नहीं पाते। परिवार के लोग खुद इन्हें अपने हाथों से चाय-नाश्ता, भोजन कराते हैं।

नरेंद्र तोमर के बेटे योगेंद्र सिंह बताते हैं कि वहां समय-समय पर इबादत की जाती है। घर में मंदिर में जिस तरह से पूजा की जाती है, ठीक उसी तरह दरगाह में भी अगरबत्ती लगाते हैं। हमारे लिए देश ही पूजा है। आजादी की लड़ाई मे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी का बराबर का योगदान था और आज यह आजादी भी सभी के लिए बराबर हैं।

नरेंद्र तोमर के बेटे योगेंद्र सिंह बताते हैं कि वहां समय-समय पर इबादत की जाती है। घर में मंदिर में जिस तरह से पूजा की जाती है, ठीक उसी तरह दरगाह में भी अगरबत्ती लगाते हैं। हमारे लिए देश ही पूजा है। आजादी की लड़ाई मे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी का बराबर का योगदान था और आज यह आजादी भी सभी के लिए बराबर हैं।

Ramswaroop Mantri

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