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*क्या भारत अब भी मानसिक गुलामी में है?*

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(मैकाले, मोदी और हमारी सामाजिक सच्चाइयाँ)

–      तेजपाल सिंह ‘तेज’

          क्या आज़ाद भारत अब भी अपने मन के भीतर गुलामी ढो रहा है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में कहा कि मैकाले ने भारत को मानसिक गुलामी में जकड़ दिया है और हमें 2035 तक इससे मुक्त होना होगा। सवाल उठता है—मैकाले कौन था? और उसका असर आज भी इतना बड़ा कैसे है कि देश के सबसे ताकतवर नेता को लगभग दो सौ साल बाद भी चैन नहीं? इन्हीं सवालों से शुरू होता है सत्यहिंदी के कार्यक्रम सुनिए सच में वरिष्ठ पत्रकार श्री पंकज श्रीवास्तव का विश्लेषण।

एक फिल्मजो सच बोलने की कीमत चुका रही है:

          बात शुरू होती है ज्योतिबा फुले पर बनी फिल्म से, जो उनके जन्मदिन पर रिलीज ही नहीं हो पाई। कारण? सेंसर बोर्ड को उसमें दिखाई गई सच्चाई पसंद नहीं आई—जाति व्यवस्था, मनुस्मृति, पेशवाई के दमन, और दलितों पर हुए अत्याचारों का ज़िक्र। यह सब इतिहास में दर्ज बातें हैं, पर सेंसर को ये सब “आपत्तिजनक” लगा। ब्राह्मण संगठनों ने कहा—फिल्म “ब्राह्मणों को नकारात्मक दिखाती है।” बहुजन संगठन बोले—“यह फिल्म RSS की हिंदू राष्ट्र परियोजना की असलियत बताती है, इसलिए रोकी जा रही है।” यानी सच वही है, जिसे सत्ता सुविधाजनक माने; बाकी काट दिया जाए। क्या यही मानसिक गुलामी का आधुनिक रूप नहीं?

ज्योतिबासावित्रीबाई फुले: जिन्होंने सदी में रोशनी दिखाई:

          19वीं सदी के पुणे में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने उस सामाजिक घुटन को तोड़ने की कोशिश की, जिसे हज़ारों सालों की जातिगत व्यवस्था ने पुख्ता कर रखा था। उन्होंने—

·        1848 में देश का पहला बालिका विद्यालय खोला,

·        बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई,

·        विधवा विवाह का समर्थन किया,

·        और सत्यशोधक समाज बनाया।

          फुले ने अपनी किताब गुलामगिरी में साफ लिखा कि अंग्रेजी शासन ने उन वर्गों को शिक्षा और मानवता दी, जिन्हें सदियों से ब्राह्मणवादी कानूनों (मनुस्मृति) ने वंचित रखा था।
यह बात आज भी बहुतों को चुभती है।

फिर आता है प्रधानमंत्री का मैकाले वाला बयान:

          मोदी कहते हैं कि मैकाले ने भारतीय शिक्षा को नष्ट करके गुलामी की मानसिकता पैदा की।” तो देखते हैं, मैकाले ने किया क्या था। थॉमस बैबिंगटन मैकाले 1834 में भारत आए। उन्होंने 1835 में एक दस्तावेज़ लिखा—Minutes on Education—जिसमें कहा कि—

·        संस्कृत, अरबी, गुरुकुल, मदरसा—सब “बेकार” हैं,

·        शिक्षा केवल अंग्रेज़ी माध्यम में हो,

·        सरकारी धन पारंपरिक भारतीय शिक्षा पर न खर्च हो,

·        और ऐसा वर्ग तैयार किया जाए, जो “रक्त से भारतीय लेकिन विचारों से अंग्रेज़” हो।

          नतीजा—अंग्रेज़ी शिक्षा की नींव पड़ी, पश्चिमी विज्ञान आया, और आधुनिक स्कूल खुले।लेकिन मैकाले की नज़र से जो वर्ग सिर्फ “क्लर्क” बनना था, वही आगे चलकर गांधी, नेहरू, पटेल और अंबेडकर बन गया। यानी, आधुनिक भारत को खड़ा करने वाला ढांचा, मैकाले की बनाई शिक्षा व्यवस्था से ही निकला। विडंबना देखिए—मैकाले ने गुलाम बनाना चाहा, पर उसकी शिक्षा ने गुलामी तोड़ने वालों को ही जन्म दिया।

 मैकाले का दूसरा बड़ा असर: भारतीय दंड संहिता (IPC):

          मैकाले ने 1837 में IPC का पहला मसौदा तैयार किया। 1862 से लागू यह कानून आज भी भारत और पाकिस्तान में चल रहा है। इसने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया—सभी के लिए समान अपराध और समान दंड। जबकि मनुस्मृति में:

·        ब्राह्मणों को कई अपराधों पर दंड नहीं,

·        और शूद्रों को कठोरतम सज़ाएँ–दर्ज थीं। तो क्या आज फिर वही “दंड व्यवस्था” वापस लाने की कोशिश है?

क्या सच में मैकाले हटेगाया कुछ और?

          अगर प्रधानमंत्री सच में मैकाले को हटाना चाहते हैं तो–

·        क्या आधुनिक विज्ञान बंद होगा?

·        क्या शिक्षा गुरुकुल–मदरसे के हवाले होगी?

·        क्या अंग्रेज़ी छोड़कर संस्कृत–हिंदी को अनिवार्य किया जाएगा?

·        क्या कानून फिर से जाति आधारित हो जाएंगे?

·        क्या दंड फिर ऊँची–नीची जाति के हिसाब से तय होंगे?

          यदि नहीं, तो फिर मैकाले को बार-बार क्यों कोसा जा रहा है? पंकज श्रीवास्तव कहते हैं—यह “मानसिक गुलामी” का नारा कहीं मध्ययुगीन असमानताओं को वापस लाने की भूमिका तो नहीं?

RSS और विदेशी विचारों का प्रभाव:

          यह भी दिलचस्प है कि जिस RSS को “स्वदेशी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” का प्रतीक बताया जाता है, उसके शुरुआती नेताओं पर यूरोपीय फासीवाद का असर था। बी.एस. मुंजे—जो हेडगेवार के गुरु माने जाते हैं—1931 में मुसोलिनी से मिले। RSS की शाखाएँ, वर्दियाँ और अनुशासन—कई आलोचक इन्हें मुसोलिनी की Blackshirts की नकल बताते हैं। तो फिर विदेशी प्रभाव केवल मैकाले तक सीमित कैसे हुआ?

आज की मानसिक गुलामी कैसी दिखती है?

·        लोकतंत्र में नेताओं की अंधभक्ति

·        आरक्षण के खिलाफ लगातार माहौल बनाना

·        जातिगत श्रेष्ठता का जहर फैलाना

·        धर्म के नाम पर नफरत बोना

·        स्त्रियों को घर की चारदीवारी में सीमित करना

·        और शिक्षा का तेज़ी से निजीकरण

यह सब गुलामी नहीं, बल्कि दूसरों को गुलाम बनाए रखने की मानसिकता है। जिससे मुक्ति पाना कहीं ज़्यादा कठिन है।

अंत में एक सीधी बात:

          अगर मानसिक गुलामी का मतलब है—

·        विज्ञान को कमजोर करना,

·        इतिहास को छुपाना,

·        समानता को कुचलना,

·        और लोकतंत्र को व्यक्ति-पूजा में बदलना—तो यह गुलामी मैकाले की नहीं, हमारे अपने समाज की पैदा की हुई है। पंकज श्रीवास्तव के शब्दों में—गुलामी से मुक्ति का नाराकहीं भारत को असमानता और धर्मांधता की ओर ले जाने का उपक्रम तो नहीं?”

(श्री पंकज श्रीवास्तव के विचारों पर आधारित धाराप्रवाह लेख https://youtu.be/UXEssyra5kE?si=vynajd5htDFCPDVU)

Ramswaroop Mantri

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