संप्रदाय के बाद अब जातियों में बंट रहा है समाज*
हरनाम सिंह
भक्ति काल से सूफी संतों द्वारा देश में वर्ण व्यवस्था को चुनौती मिलती रही थी। इसके पूर्व भी तथागत गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी का उदय इस स्थापित वर्ण व्यवस्था के विरोध में ही माना गया है। हमारे समाज में ईश्वर के अस्तित्व और उसके स्वरूप पर सवाल उठते ही रहे हैं। चार्वाक से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक ने अपने लेखन में प्रमाणित करने का प्रयास किया था कि मानव विकास के किस सोपान पर आकर इंसान ने ईश्वर- अल्लाह के निर्माण की अवधारणा को स्वीकार किया। वर्तमान में जब वैश्विक स्तर पर नास्तिकता का तेजी से विस्तार हो रहा है तब भारत में धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर आए दिनों लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। वर्ण व्यवस्था के समर्थकों और विरोधियों में द्वंद और संघर्ष बढ़ रहा है। विगत दिनों पिछड़ी जातियों के समूहों द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय का घेराव इसी का परिणाम समझा जा सकता है।
वर्ष 1950 में जब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपनी 22 प्रतिज्ञाओं में हिंदू देवी देवताओं को पूजने से इनकार किया था, तब उनके खिलाफ कहीं किसी थाने में एफ आई आर दर्ज नहीं हुई थी। लेकिन वही प्रतिज्ञा 66 वर्ष बाद जब दोहराई गई तो बवाल खड़ा हो गया। जानकारों का मानना है कि निजीकरण की नीतियों के अमानवीय प्रभाव से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इरादतन ऐसे मुद्दे उछाले जा रहे हैं। अशिक्षित- अर्ध शिक्षित जनता को सांप्रदायिक आधार पर सफलतापूर्वक विभाजित करने के बाद अब धर्म – वर्ण और जाति के नाम पर बांटा जा रहा है।
*नीतियों में बदलाव*
आजादी मिलने के बाद देश में वर्ण और जाती व्यवस्था के अभिशाप से मुक्त होने तथा सामाजिक समरसता के लिए शासन स्तर पर प्रयास किए गए थे। अंतरजातीय विवाह करने पर सरकार द्वारा नव दंपति को न केवल संरक्षण दिया जाता था अपितु प्रोत्साहन के रूप में सम्मानजनक धनराशि भी प्रदान की जाती थी। वर्ष 2014 में केंद्र में संघ की विचारधारा वाली भारतीय जनता पार्टी के शासन में आते ही इस नीति का क्रियान्वयन बंद कर दिया गया। लव जिहाद के झूठ को इतना प्रचारित और विस्तारित कर दिया गया है कि अंतर धार्मिक विवाह होना असंभव हो गया है। ऐसी ही स्थिति विभिन्न वर्णों में भी देखी गई है। खाप पंचायतों के फैसले, ऑनर किलिंग के नाम पर हत्याएं वर्णो के द्वन्द का ही एक स्वरूप है। देश में धर्म और जाति के नाम पर राज्य आश्रय प्राप्त अनेक संगठन कानून को अपने हाथ में लेकर लोगों को धमकाते हैं कि विवाह अपने वर्ण और धर्म में ही किए जाएं। ऐसी ही नीतियों का परिणाम है कि आए दिनों भावनाएं आहत होने के नफरती प्रचार के माध्यम से समाज विशेष, व्यक्ति विशेष के बहिष्कार की मुहिम चलाई जाती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकेल कसी जाती है। सारा देश वैचारिक स्तर पर दो भागों में बांट चुका है। एक तरफ नफरत करने वाले हैं तो दूसरी तरफ ने करुणा, दया, भाईचारा और मानवीय मूल्यों के साथ संविधान पर भरोसा करने वाले लोग हैं।
*वर्ग संघर्ष बनाम वर्ण संघर्ष*
देश में धर्म आधारित राष्ट्र निर्माण का विचार हिंदू महासभा सहित अनेक धार्मिक संगठनों और उनके नेताओं का था। अतीत की स्मृतियों की जुगाली कर रही मुस्लिम लीग ने ऐसे विचारों को लपक लिया। हिंदू राष्ट्र निर्माण के विचार को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ली जोकि इटली के फासिस्ट तानाशाह मुसोलिनी से प्रेरित रहा है। संघ के प्रमुख नेता मुंजे मुसोलिनी से मिलने भी गए थे। मुस्लिम लीग और संघ दोनों ने आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया। दोनों संगठन एक दूसरे को निपटाने के लिए ही अंग्रेजों का सहयोग कर रहे थे।
स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कांग्रेस संगठन कर रहा था, जिसमें विभिन्न धर्मों के नेताओं के अलावा धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, वामपंथी विचारधारा के लोग भी शामिल थे। संघ और मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्र की थ्योरी 1947 में क्रियान्वित हुई। मुस्लिम लीग को तो पाकिस्तान मिल गया लेकिन हिंदूवादी संगठन हिंदू धर्म आधारित राष्ट्र प्राप्त नहीं कर सके। उसी का दंड उन्होंने राष्ट्र नायक महात्मा गांधी को दिया उन की हत्या कर के।
*सशक्त थे साम्यवादी*
वर्ष 1917 में व्लादीमीर इल्यिच लेनिन के नेतृत्व में सफल रूसी क्रांति का असर भारत में भी देखा गया था। समाजवादी समाज निर्माण का स्वप्न सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट नेता भी देख रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम में इन दलों की भूमिका और कुर्बानियों को देशवासियों ने मान्यता दी। 1952 में संपन्न पहले आम चुनाव में संसद में कांग्रेस के बाद सबसे बड़ा दल कम्युनिस्ट पार्टी ही था। पार्टी के लोकसभा में 16 तथा सोशलिस्ट पार्टी के 12 सांसद थे। इन चुनाव में भाजपा की पूर्वज जनसंघ के मात्र 3 सदस्य ही चुने गए थे।
1925 में हिंदू राष्ट्र का स्वप्न लेकर सक्रिय संघ निराश नहीं हुआ। सांस्कृतिक संगठन होने की आड़ में यह संगठन झूठ और प्रचार का सहारा लेकर आगे बढ़ता ही गया। 89 वर्ष बाद 2014 में उसे सफलता मिली। वर्ग संघर्ष के माध्यम से समाजवादी समाज की स्थापना के लक्ष्य पर वर्ण संघर्ष के माध्यम से हिंदू राष्ट्र की अवधारणा जीत गई। उसके राजनीतिक परिणाम आज सबके सामने है। शनै:शनै: वर्ग संघर्ष धीमा होता जा रहा है और वर्ण संघर्ष ने तेजी पकड़ ली है।
*अंबेडकर के नाम पर छद्म*
विकसित चेतना के साथ निरंतर एकताबद्ध होते दलित- पिछड़ों का ही असर है कि सभी राजनीतिक दल अंबेडकर की प्रशंसा करने पर विवश हैं। सांप्रदायिक संगठनो से तिलक तराजू और तलवार… की राजनीति टकरा रही है। राष्ट्रीय स्वयं संघ तो वैचारिक रूप से अंबेडकर से असहमत रहा है। इसी कारण भाजपा और संघ को अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं से एतराज है। बावजूद इसके वे इस विषय पर खुलकर नहीं बोलते। अंबेडकर को धर्मनिरपेक्ष संविधान निर्माण का श्रेय दिया जाता है। संघ अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान के मसौदे को पश्चिम से उधार लिया गया संविधान प्रचारित करते रहे हैं। वहीं संघ सदैव संविधान के स्थान पर मनुस्मृति की प्रशंसा करता है। समय के अनुसार उसने अपनी रणनीति बदली है एजेंडा नहीं।
जाति का उन्मूलन अंबेडकर का लक्ष्य था, उसी के आधार पर मंडल आयोग का गठन हुआ और देश में आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। मंडल आयोग की सिफारिशों का संघ ने सदैव विरोध किया है। यह सर्वविदित तथ्य है कि आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन के खिलाफ संघ और अन्य हिंदूवादी संगठनों ने राम मंदिर आंदोलन प्रारंभ किया। वर्ष 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का फैसला लिया। इसी वर्ष भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर के आंदोलन का अधिग्रहण कीया, लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली। उसके बाद का इतिहास सर्व ज्ञात है। वर्ण संघर्ष को सांप्रदायिकता ने बोथरा कर दिया। इस द्वंद में सर्वाधिक नुकसान वर्ग संघर्ष के माध्यम से समाजवाद के लक्ष्य को पूरा करने वालों को उठाना पड़ा।
.. संघ कई मुखोटे वाला अत्यंत सक्रिय और समृद्ध संगठन है। आम आदमी पार्टी ( आप ) के अरविंद केजरीवाल और संघ दोनों अंबेडकर की प्रशंसा करते हैं। अंबेडकर जयंती और पुण्यतिथि के आयोजनों में शामिल होते हैं। अपने कार्यालयों में अंबेडकर के चित्र लगाते हैं। लेकिन व्यवहार में दोनों संगठन चुनावी राजनीति में ही अंबेडकर का उपयोग कर रहे हैं। दोनों का अंबेडकर प्रेम खोखला है। संघ परिवार और आप पार्टी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप प्रमुख केजरीवाल स्वयं को कट्टर हिंदू प्रचारित करते हैं। उसी के चलते उन्होंने अंबेडकर की प्रतिज्ञाओं को दोहराने मात्र से अपने मंत्री से त्यागपत्र ले लिया।
सांप्रदायिक नफरत के विस्तार पश्चात अब देश वर्ण संघर्ष से झुलस रहा है। बांटो और राज करो कि विभाजन कारी नीति देशवासियों के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने में सफल हो रही है। देश में गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, बलात्कार, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, रुपए के अवमूल्यन की ओर किसी का ध्यान नहीं है। आगे 2 वर्ष चुनावी महत्व के हैं। देशवासियों को सचेत रहने की जरूरत है।
हरनाम सिंह