सरकार की नीतियां मांसाहार को बढ़ावा देती है
हरनाम सिंह,मंदसौर*
शाकाहार बनाम मांसाहार की बहस आए दिनों मीडिया की सुर्खियां बनती रही है। मांसाहार को भारतीय संस्कृति के विपरीत बताकर इसे धर्म विरोधी कृत्य भी प्रचारित किया जाता है। मांसाहार विरोधी सनातन धर्मीयों के अनुसार हिंदू धर्म अहिंसा की बात करता है, इस धर्म में किसी भी जीव की हत्या को पाप माना गया है। अपने भोजन के लिए किसी जीव को मारना निकृष्ट कार्य बताया गया है। इसी तर्क के आधार पर आए दिनों त्योहारों के अवसरों पर ही नहीं अन्य दिनों में भी मांसाहार की दुकानों को बंद रखने की मांग उठाई जाती रही है। जबकि शासन की योजनाएं मांसाहार को बढ़ावा देने वाली रही है। सरकार ऐसे पशुओं, जलचरों के उत्पादन को प्रोत्साहित करती है, जिनका उपयोग आहार के रूप में होता है। ऐसे में मांसाहार पर प्रतिबंध की मांग करने वालों को यह मांग सरकार से करना चाहिए। मीट की दुकानें बंद करवाना समस्या का समाधान नहीं है। यह भी प्रचारित किया जाता है कि देश में मांसाहार मुस्लिम आक्रांताओं या पश्चिमी उपनिवेशवादियों द्वारा लाई गई आहार प्रणाली है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि यह कितना सच है ? वास्तव में क्या मांसाहार धर्म विरोधी कार्य है ? अतीत में परम्परा से हमारी आहार प्रणाली क्या थी ?
*आयुर्वेद करता है समर्थन*
सनातन धर्म का मूल आधार वेदों को बताया जाता है। किसी भी विवाद की स्थिति में वेद और पुराणों को साक्ष्य के रूप में स्वीकारा जाता है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और जीवन शैली की सबसे प्रमाणिक आयुर्वेदिक साहित्य में न केवल औषधि के रूप में अपितु आहार के रूप में भी मांसाहार सेवन करने की बात स्पष्टतया बार-बार कही गई है। उल्लेखनीय है कि आयुर्वेद वेदों की ही शाखा है, इसीलिए यह कहना अनुचित न होगा कि मांसाहार वैदिक परंपरा से ली गई प्रवृत्ति है। क्योंकि आयुर्वेद ब्रह्मा, इंद्र, और धन्वंतरी जैसे देवताओं से जुड़ा हुआ है इसीलिए इसे धार्मिक मान्यता प्राप्त है।
*चरक संहिता में है उल्लेख*
आयुर्वेद कहता है कि मनुष्य अपनी शारीरिक जरूरत के अनुसार किसी भी जीव के मांस का उपयोग दवा या पथ्य के रूप में कर सकता है। जहां तक भोजन के लिए जीव हत्या का सवाल है आयुर्वेद इस पर स्पष्ट नहीं है। चरक संहिता के 27 वें अध्याय में व्यक्ति के लिए आहार के बारे में बताया गया है कि उसमें क्या शामिल होना चाहिए। दैनिक आहार में अनाज, दालों के बाद मांस को स्थान दिया गया है। इसके बाद ही साग, फल आदि को शामिल किया गया है। चरक संहिता के इसी अध्याय के श्लोक 87 में कहा गया है कि शरीर को मोटा करने या ताकतवर बनाने में कोई भी भोजन मांस से बढ़कर नहीं है।
चरक ऋषि अष्टांग हृदयम के अध्याय 6 श्लोक 172 में अलग-अलग तरह के मांस को खाने का शरीर और मन पर क्या असर होता है इस पर भी विस्तार से बताया गया है। संहिता में रोगों के इलाज के लिए पथ्य के रूप में किस जीव का मांस किस तरह से पका कर खाना चाहिए इसका भी जिक्र है। यह भी बताया गया है कि अधिक वजन वाले लोगों को मांसाहार से बचना चाहिए। ऐसे विस्तृत वर्गीकरण को देखकर तो लगता है की आयुर्वेद मनुष्य को छोड़कर किसी भी जीव को भोजन बना लेने की बात करता है।
*पाप नहीं है मांसाहार*
बहुचर्चित मनु स्मृति में भी मांसाहार का उल्लेख आता है। ग्रंथ के अध्याय 5 के श्लोक 30 में कहा गया है कि खाने योग्य जानवरों का मांस खाना पाप नहीं है। क्योंकि ब्रह्मा ने खाने वाले और खाने योग्य दोनों को उन्होंने ही बनाया है। मनु स्मृति में पितरों को तृप्त करने के लिए तिल, चावल के साथ मांसाहार को भी विस्तार से बताया गया है।
स्वामी विवेकानंद भी मांसाहार का समर्थन करते थे। रामकृष्ण मठ द्वारा प्रकाशित साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है जब एक शिष्य ने इसके बारे में उनसे पूछा था। इतिहासकार प्रोफेसर द्विजेंद्र नारायण झा ने अपनी पुस्तक ” द मिथ आफ होली कॉउ ” में बताया है कि अतीत से ही मांसाहार भारतीय आहार की आदतों में शामिल रहा है। बौद्ध और जैन धार्मिक ग्रंथों में भी इसके साक्ष्य मौजूद हैं।
व्याख्याकारों के अनुसार आयुर्वेद संतुलन की बात करता है। उसमें दूध और मांसाहार को अलग-अलग परिस्थितियों में सेवन करने की बात कही गई है। जीवन यापन के लिए अन्न को सर्वश्रेष्ठ आहार बताया गया है। वही जीवन के विकास के लिए दूध तथा ताकत के लिए मांस को उपयुक्त माना गया है।





